Sunday, April 5, 2015

लोकतंत्रः आकाश कुसुम

लोकतंत्रः आकाश कुसुम
नमस्कार!
हालचाल ठीक है. जबसे आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्य कारिणी की बैठक हुई तबसे भारत के लोकतांत्रिक संस्थाओं के कार्यकलाप सामने आते चले जा रहे हैं और मन में यह बात बैठती जा रही है कि भारतीय जनमानस में लोकतंत्र व्यवहार से बहुत दूर है. हम लोकतंत्र के मूल्यों को आत्मसात ही नहीं कर पाये हैं.

छोटी या बड़ी कोई भी लोकतांत्रिक संस्था प्रारम्भ से ही व्यक्तिवाद से ग्रस्त हो जाती है और हम अभिभूत हो चरणवन्दना में लग जाते हैं और तब तक लगे रहते हैं जबतक व्यक्तिगत हानि नहीं हो जाती है. छोटी संस्थाओं में सर्वमत से प्रस्ताव पारित होते रहते हैं क्योंकि एक व्यक्ति को छोड़कर अन्य को उससे प्रायः कोई मतलब ही नहीं होता है.

हमारी सबसे बड़ी संस्था में सांसद कितनी बार अपने विवेक के आधार पर अपना मत देता है. हमारे जन प्रतिनिधि को सभी बिलों के बारे में बोलने का अवसर भी नहीं मिलता है. सामान्यतः वह राजदल के लिये एक मत बनकर जाता है. निर्णय तो राजदल के सुप्रीमों तय किये रहते हैं.

प्रत्येक राजदल कुछ विशिष्ट सदस्यों को आजीवन अभिजात्य बना देता है. कुछ लोग नया दल बना लेते हैं आजीवन उसको चलाते हैं उसके बाद उनकी संततियां उसपर अधिकार प्राप्त कर ले ती हैं. जहां ऐसा नहीं होता वहां भी राजदल के निर्णय गुप्त मतदान द्वारा नहीं होते.

आम आदमी पार्टी के गठन के साथ यह विश्वास बन गया कि यह राजदल लोकतंत्र के हर कसौटी पर खरा उतरने का प्रयास करेगा किन्तु शीघ्र ही यह अरविन्द और दिल्ली के विधायकों द्वारा स्थापित कसौटी की ओर चलने लगा. आज अरविन्द केजरीवाल यह मान रहे हैं कि मात्र उन्हीं के कारण यह दल बन गया. अब उनको यह नहीं याद आ रहा है कि पता नहीं कितनों ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया.

समता, वन्धुता और वस्तुनिष्ठता के बिना लोकतंत्र नहीं हो सकता. जबतक ऐसा नहीं होता तबतक और चाहे जो कुछ हो लोकतंत्र नहीं हो सकता.

१४ अप्रैल को कुछ लोग लोकतंत्र के बुझे हुये दीप को पुनः जलाने जा रहे हैं. उन्हें सफलता मिले. उसमें आनंद कुमार और योगेन्द्र भी होंगे. उनसे निवेदन है कि समाजमिति विधि से कार्यसमिति का चयन करें. एक प्रयोग इस विधि का भी होना चाहिये.

नमस्कार.

Saturday, November 15, 2014

शहर से शिक्षा

शहर से शिक्षा

नमस्कार!

हालचाल ठीक है. जिसे गुलाबी जाड़ा कहते हैं अब बीत गया. अखिल भारतीय शिक्षा संघर्ष यात्रा -२०१४ पथ पर है. बाल दिवस बीत गया. फोकस मे नेहरू और मोदी आ गये हैं. आज  भारत मे लोकतंत्र को सशक्त बनाने, सभी भारतीयों के जीवन सतर को जीने लायक बनाने के लिये आवश्यकताओं को क्रम से रखने में सबसे पहले तो बालक ही आयेंगे. उन्हें स्वस्थ और शिक्षित बनाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है. लोकतंत्र में सरकार जनता के धन से व्यवस्था करने का कार्य करती है किन्तु सरकार की प्राथमिकता में राजदल को सत्ता में बनाये रखना पहली प्राथमिकता हो जाती है इसके लिये जनता के धन को  पानी जैसे बहा दिया जाता है. सत्ता सुख सदा बना रहे इसके लिये आगे के लिये आय के स्रोत बनाने के लिये तमाम तरह के कार्य किये जाते हैं. जनता एक सीमा तक इसे उचित मानने के लिये विवश भी है और विवशता में कुछ खुर्चन पाकर संतुष्ट हो जाती है.

नवम्बर २०१४ की "कादम्बिनी " सामने है...क्योंकि शहर एक सपना है यही प्रतिपाद्य है इस अंक का. जुलाई अगस्त में कई शहरों को देखने का अवसर मिला. गांव में जन्म हुआ. तब गांव में प्रसव कराने के लिये, हल चलाने वाले की पत्नी या मां आती थी. हल्दी, बीरो, दूध और मालिश के सहारे जच्चा बच्चा रहते थे. स्कूल जाने का समय आया तो गांव की जिला परिषद द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालय मिला. मिट्टी की दीवार का खपरैल विद्यालय लगभग गिर चुका था. किन्तु हर कक्षा के लिये एक अध्यापक थे. प्रधानाध्यापक पंडित राज किशोर तिवारी ठीक समय पर विद्यालय पहुंच जाते थे. पेंड़ों के नीचे कक्षायें चल जाती थीं एक पक्का कुआं  भी था. पीटी भी होती थी और शनिवार को बालसभा भी. इस लिहाज से मैं एक गंवार आदमी हूं. तमाम विद्वानों के अनुसार मुझे उसी गांव में बने रहना चाहिये था. मेरे पिताजी जिन्हें मैं बाबूजी कहता था नौकरी तो बाहर करते थे किन्तु गांव में ही रहना चाहते थे. यहां तक कि जब देवरिया में नई कालोनी बस रही थी तो मित्रों द्वारा जमीन लेने के सलाह को ठुकारा दिये और उन लोगों के जमीन लेने के निर्णय की आलोचना भी करते थे. किन्तु १९८१ में उन्होंने देवरिया नगरपालिका क्षेत्र में जमीन लेकर आवास बनवा लिया. इस प्रकार मैं नगरवासी बन गया.

देवरिया नगर भी कई गांवों से मिलकर बना है और लगातार विस्तृत होता जा रहा है. हर कस्बा, नगर और महानगर लगातार बढ़ रहा है. अनियोजित ढंग से बढ़ रहा है. नगर का बढ़ना विकास की परिभाषा में भी आता है. गांव में रहकर कौन गंवार बना रहना चाहेगा. यह अवश्य है कि अनियोजित विस्तार के कारण महानगर भी नरक बन चुके हैं इसके लिये सारा दोष दूसरे प्रदेशों से आये कामगारों को दिया जाता है.

मैं अपनी बात स्पष्ट करने के लिये गाजियाबाद के वसुन्धरा कालोनी को लेता हूं जहां अगस्त में एक सप्ताह रहने का अवसर मिला. सड़क, फुटपाथ, और नाली सार्वजनिक ही बन सकती है और उसे साफ करने का उपाय भी सार्वजनिक ही हो सकता है. इस कार्य को संपन्न करने के लिये नगरपालिका ही जिम्मेदार है और उसे यह जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिये. वसुन्धरा में मुझे यह देखने को नहीं मिला. जो लोग भी रहते हैं उनकी तमाम आवश्यकतायें होती है. उन आवश्यकताओं को पूरा करने वाले लोग कहां रहेंगे इसके बारे में योजनाकारों ने नहीं सोचा. घरेलू सहायिका, परिधानशिल्पी, परिधानसंरक्षी, आटोचालक, सुरक्षाकर्मी, वाहनचालक, जलसंसाधन संरक्षक, विद्युत संरक्षक, आदि आदि के लिये भी वास स्थान बनना चाहिये था , नहीं बना तो आधारभूत काम करनेवाले झुग्गियों में रहते हैं. वे उतना अपराध नहीं करते जितना ह्वाइट कालर क्राइम होता है. वे नाली में नहा लेते हैं, कूड़े में रह लेते हैं ताकि कालोनी वाले सुख से जी सकें.

स्मार्ट सिटी चर्चा में है. धनी लोग उसमें रहेंगे सब कुछ स्मार्ट होगा लेकिन रहेगा तो आदमी ही. उसे सेवक चाहिये, अत्यधिक उत्पादित कचरा को किनारे लगाने वाले लोग चाहिये.

शहर में लोग व्यस्त हैं क्योंकि कार्यस्थल पर पहुंचने के लिये चार घंटे से अधिक समय चाहिये. हर कार्यालय, और उत्पाद्शाला तथा कार्यशाला आदि में कार्य करनेवाले यदि अपने कार्यस्थल के बिल्कुल समीप रहें तो आवागमन और जाम की समस्या से मुक्ति मिल सकती है. राजदल के लोग चुनाव के समय हर आवश्यक नियम को अपने सत्तासुख के लिये समाप्त करने का काम छोड़ दें तो हर नगर और गांव तमाम समस्याओं से मुक्त हो जायेगा. किसी कानून को बदलने के लिये लोगों को जीवन का बलिदान करना पड़ता है, तब भी नहीं बदलता किन्तु वोटबैंक के लिये सब खतम.

इन कालोनियों मे शिक्षा और शिक्षालय के लिये कोई सुविचारित और नियोजित व्यवस्था नहीं है. पक्के मकानों में रहनेवाले प्रतियोगिता में अपनी जेबे ढीली करते रहते हैं. प्राथमिक विद्यालयों की सूचना पुस्तिकायें  पांच सौ , हजार की  मिलती हैं किन्तु उनसे यह पता नहीं चलता कि वहां के शिक्षक वास्तव में प्रशिक्षित हैं या नहीं. पचास हजार से लाख रूपये वार्षिक खर्च कर माता पिता रोज होमवर्क कराने को बाध्य हो जाते हैं या ट्यूशन का सहारा ले लेते हैं. बच्चे वाहनों से विद्यालय जाते हैं और आते हैं. पूरब वाले पश्चिम और पश्चिम वाले पूरब जाते हैं.

यदि सभी के लिये एक समान पाठ्यक्रम, शिक्षालय ,शिक्षक की व्यवस्था हो तो नौनिहाल बस्ते के बोझ से दबने से और अभिभावक शुल्क के बोझ से दबने से बच जायेंगे. सरकार शिक्षा उपकर वसूल लेती है किन्तु शिक्षा क्षेत्र की सम्पूर्ण जिम्मेदारी लेने से बच जाती है. भारत के नब्बे प्रतिशत लोग इस शिक्षा को असहायता में झेल रहे हैं क्योंकि वे जिन्हें अपना प्रतिनिधि समझते हैं वे किसी राजदल के नेता के आगे नतमस्तक हैं और वह नेता पूंजी पतियों की बात मानने को मजबूर है. हमारे जैसे लोग हवा का रुख देखकर अपना रुख बदलते रहत हैं. इसका कुफल हमारे नौनिहाल भुगत रहे हैं.

इसलिये हमें केजी से पीजी तक के लिये निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था को  को हर गांव, कस्बा, नगर तथा महानगर तक प्रसारित करना होगा. इसके लिये अखिल भारतीय शिक्षा संघर्ष यात्रा-२०१४ से जुड़िये और विमर्श कीजिये तथा वह करने का प्रयास कीजिये जिससे हर सपने को आसमान मिले.

सुझाव दीजिये.
नमस्कार.


Friday, July 25, 2014

भावताव

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.

इधर भाई लोग इसराइल के गुणगान में व्यस्त हैं, इसराइल को टमाटर बम बनाना चाहिये. भारत जैसे देश में टमाटर वर्षा कर देनी चाहिये.
 
आजकल  आम की  नहीं  टमाटर की चर्चा हो रही हैं. यह तो पता नहीं कि मीडिया के लोग जहां के मूल निवासी हैं वहां सालोंसाल टमाटर फलता है या मौसमी फल है.

यह बात अलग है कि जमाना ग्लोबल है तो हर समय हर चीज मिलती है. दिल्ली वालों को आदत है कि सब कुछ हर समय खायें तो टमाटर इस समय सौ रूपये किलो हो जा रहा तो टीवी का समाचर हो जा रहा है.

सब्जियां मंहगी और सस्ती होती रहती हैं. जब जो सब्जी महंगी  हो उसे खरीदना बंद कर दीजिये. दूध के भाव से टमाटर का भाव मिला लीजिये.

कल एक देहात के बाजार में आलू चौबीस रुपये किलो तथा परवल बीस रुपये किलो मिल रहा था. कभी कभी सेब से मंहगी प्याज मिलती है.

जब किसी सब्जी का भाव बढ़्ता है तो वह वीआईपी बन जाती है. उसे खाने का अधिक मन करता है. और टमातर में तो लाइकोपेन मिलता है. लाइकोपेन वाली गोली दस रुपये मेम एक मिलती है.

सब्जियों के थोक बाजार से खुदरा बाजार मेम जाने और उनके मंहगा हो जाए पर रोज समाचार सुनने को मिल जाते हैं. दवाओं के भाव के समाचार कोई नहीं दिखाता.

इसी पर याद आया रोटी घटना यह पता नहीं कि वहां थाली कितने की मिलती है. भोजन का भाव तो रोज बदलनेवाला है. जिसके कच्चे माल का भाव रोज बदलता है उससे बने सामग्री का भाव साल भर तक एक कैसे हो सकता है.

कुछ लोग कहते हैं कि बिना प्याज के सब्जी कैसे बनेगी कुछ लोग प्याज खाते ही नहीं.

बड़े बड़े शैफ लोग रोज नाना प्रकार के व्यंजन बनाने को बताते हैं उन्हें प्याज टमाटर रहित व्यंजन विधि बताना चाहिये.

जरा पब्लिक स्कूलों के कापी किताब और ड्रेस की ओर भी नजर घुमा लीजिये मीडिया सर. काटजू साहब के बहाने से ही सही हरिशंकर परसाई के नाम पर कचहरी की सैर भी कर लिजिये.
नमस्कार.




Saturday, July 19, 2014

भाषा और भारत

नमस्कार!

हालचाल ठीक है . सावन भी आज मूड में है. पुनर्वसु नक्षत्र का अंतिम दिन है, सुबह से बरसात के दौर चल रहे हैं. बिजली और वर्षा दोनों  का आना जाना लगा हुआ है. सीसैट ने भाषा और अनुवाद दोनों को विवाद के घेरे में ला दिया है. कई  दिनों के बाद सीसैट ( Civil Services Aptitude Test ) का अर्थ जान पाया. अंग्रेजी की एक बड़ी उपयोगिता छोटे नामों को प्रचलित कर देने में है. यह रोमन लिपि का कमाल है. इस कमाल के कारण धोखे भी खूब होते हैं. भारत सिविल शब्द खूब प्रचलित है. पहले हर जिले में सिविल सर्जन और सिविल लाइन होते थे. अब सिविल सर्जन तो नहीं होते किन्तु सिविल लाइन्स और सिविल सर्विसेज का प्रचलन खूब है. भाषा का ऐसा जोड़ तोड़ होता है कि एक बार खेल के मैदान में खेल-ज्योति या मशाल का नाम जब टार्च बोला गया तो मैं आधुनिक टार्च को ही दिमाग में ला सका. आज भी टार्च माने टार्च ही सामने आता है मशाल नही.

भारत में वस्तुनिष्ठता को नास्तिकता से जोड़ दिया गया, इसलिये भारत के बहुत से वैज्ञानिक और विज्ञान विषयों के आचार्य नास्तिकता से बचने के लिये वस्तुनिष्ठता से दूर ही रहना चाहते हैं. वसुधैव कुटुम्बकम का नारा तो देते हैं किन्तु भारत के ही सब लोगों को समानता का  अवसर नहीं देना चाहते हैं.

सिविल सेवा परीक्षा की वस्तुनिष्ठता शुरु से ही संदिग्ध रही है. विषयों का चयन फैशन की तरह बदलता रहा है. आचार्य गण अपने विषय को प्रचलित करने के लिये सर्ल प्रश्न और अधिक अंक  देने का प्रयास करते रहे हैं. आचार्यों की ""वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता"" के चलते यह परीक्षा विवादित रही है.

अभ्यर्थी विवाद और न्यायालय के चक्कर में पड़ना नहीं चाहते रहे. विषेशज्ञ गण अपनी कसौटी के समान दूसरे की कसौटी को मानते नहीं. फलतः तमाम अभ्यर्थी टूट्ते रहे. जो जीता वही सिकन्दर इसके कारण न चुने जाने वाले अयोग्य माने जाते रहे. जो शोधकार्य और प्रदत्त तथा प्रदत्त विश्लेषण प्रकाश में लाये जाते हैं उन्हें अलग से किसी ने जांचने की कोशिश नहीं की, अगर की भी तो वे चर्चित नहीं हुये.

भारत में इन्टरमीडियेट अर्थात १०+२ की परीक्षा प्रत्येक प्रदेश की परिषदें, और कुछ  परिषदें  संचालित कराती हैं. सबका अपना अपना राग है,  अलग राग प्रायः वस्तुनिष्ठता को समाप्त करने के लिये ही होते हैं.

भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन के महानायक अंग्रेजी जानने वाले लोग ही थे. लेकिन लोग तो अंग्रेजी जानते नहीं थे. अतः नेताओं ने जनता से तो हिन्दी और भारतीय भाषाओं में सम्पर्क साधा किन्तु सरकारी कमकाज अंग्रेजी की ओर गया. मुसलमान शासकों के कारण कचहरी की भाषा उर्दू हुई.

मैं जब हाईस्कूल १०वीं कक्षा में था तो उत्तर भरत में हिन्दी आन्दोलन चला था. १२ वीं तक पढाई का माध्यम हिन्दी रहा, उसके बाद माध्यम अंग्रेजी हो गया. हिन्दी माध्यम से पढकर गये छात्र अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें पढ़ लेते थे. अंग्रेजी में परीक्षा दे देते थे किन्तु आपसी बात तो हिन्दी में ही कर पाते थे. बहुत कम लोग बातचीत अंग्रेजी में करते थे.

व्यक्ति की बुद्धि, ज्ञान, विवेक मात्र किसी विदेशी भाषा के आधार पर नहीं जाना जा सकता. विश्व में अंग्रेजी बोलने वाले 5.43% तथा हिन्दी वाले 4.70% बंगाली वाले 3.11% हैं.
http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_languages_by_number_of_native_speakers

एक दूसरे श्रोत के अनुसार मानक हिन्दी जानने वालों की संख्या अंग्रेजी वालों से अधिक है.
Hindi

मानक हिन्दी - Mānak Hindī

Modern Standard Hindi is a standardised variety of the Hindustani language.

It is one of the official languages in India (as Hindi, Urdu) and in Pakistan(as Urdu).
 
hin366 000 000487 000 000
English

has been widely dispersed around the world, it is official language in 83 countries/regions (ISO), spoken in 105 other countries (E).

Curiosity: English language does not have official status in Australia, theUnited Kingdom, and the United States.
http://www.nationsonline.org/oneworld/most_spoken_languages.htm

आजकल भारतीय भाषा वाले सीसैट में संशोधन चाहते  है. तमाम विद्वान यह मानते हैं कि अंग्रेजी जाने बिना मोक्ष ही नहीं मिलेगा तो भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की प्री परीक्षा केवल भारतीय भाषा में होने दीजिये. चयन के बाद प्रशिक्षण में प्रशासनिक अंग्रेजी का लिखित और मौखिक अभ्यास और प्रशिक्षण देकर मोक्ष लायक अंग्रेजी सिखा दीजिये.

आजकल के फैशन के अनुरूप प्रत्येक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में अंग्रेजी को एक विषय के रूप में पढ़ाने की व्यवस्था होनी चाहिये जिसमें आधा ध्यान बोलने पर भी दिया जाना चाहिये.

Tuesday, June 10, 2014

प्यासी ट्रेन

नमस्कार!
हालचाल गरम है.
राजनीति में हारे हुये राजद्लों के नेता जो सुपरनेता के चमत्कार से जीतने की सोच रहे थे अब हारने पर अपनी करनी पर कम नेता की करनी पर अधिक गुस्सा कर रहे हैं. इन दलों की हाल चाल गरम है.

मुझे गर्मी बहुत सताती है फिर भी प्रर्यावरण वालों की बात सोचकर रोज अखबार देखता हूं कि अब लिखा रहे कि गर्मी का नया रिकार्ड बना, लेकिन अभी तक नहीं दिखाई दिया.

पुराने मत से मृगशिर नक्षत्र चल रहा है. २३ जून तक दिन बडा होता चला जायेगा तो गर्मी अब नहीं पडेगी तो कब ? देवरिया मेम पुरवा चल रही है, लोकप्रचलित है कि पुरवा हवा भीतर से गर्म होती है. आठ बजे से ही पुरवा में बसी नमी भाप बन जाती है और गर्मी के साथ साथ हवा की कमी का  अनुभव भी होने लगता है. प्यास बुझती ही नहीं, गर्मी में पानी की कमी एक स्ट्रोक के रूप प्राण भी ले लेती है.

अभी पानी की अनुपल्ब्धता के कारण एक खिलाडी की मौत से कुछ अतीत के जलकष्ट प्रकट हो गये. १९६२-६३ में जून में रात में गोरखपुर से लाररोड आना था. पहले तो टिकट पाना ही मुश्किल रहा. बाबूजी के एक परिचित जो वहीं कार्यरत थे टिकट दिलवा दिये. गाडी में बैठने के बाद मुझे प्यास लगी, अब ट्रेन चलने को थी. तब बगल में बैठे एक  भोजपुरी के कवि ने अपना लोटा दिया और किसी ने लोटा भरकर पानी ला दिया. उन्होंने लोटा या गिलास लेकर ही यात्रा करने की सलाह भी दी.

एकबार इसी तरह के मौसम में इलाहाबाद की यात्रा में जा रहा था तब टू टियर वाले डिब्बे भी चलते थे, जिसमें ऊपर वाली बर्थ सोने के लिये तथा नीचेवाली बैठने के लिये होती थी. डिब्बे में बहुत भीड भी थी. किसी के पास लोटा था. उसने किसी प्रकार दूर नल से पानी मंगा लिया. पानी पी ही रहा था कि एक छोटा बच्चा पानी के लिये चिल्लाने लगा. लोगों के अनुरोध पर उस व्यक्ति ने पानी का लोटा दे दिया. लोटा पाते ही बच्चे का पिता जल्दी-जल्दी पानी पीने लगा. सभी लोग गुस्साये. उस व्यक्ति ने नजर नीची कर के लोटा बच्चे कि ओर बढा दिया.

एक यात्रा बैजनाथ धाम की हुई. यात्रा ठीक ठाक चल रही थी. बोतल वाले पानी का जमाना आ गया था कई बोतल पानी लेकर बैठा था. साथ में भी लोग थे. अब यात्रा पूरी होने वाली थी. सब लोग पानी पीकर अपना बोतल भी फेक चुके थे. अगले स्टेशन पर गाडी रुक गई. घंटे भर के बाद गला सूखने लगा. बगल वाले मित्र से पानी मांगा, उनके पास भी नहीं था. पानी वाले भी नहीं थे. हमारी बोगी  प्लैट्फार्म से काफी दूर थी. किन्तु दूर एक स्टाफ क्वार्टर के सामने इन्डिया मार्क पम्प था दिखाई दिया. बगल वाले मित्र ने अपना और मेरा बोतल लेकर दौडकर पानी भरकर लाया.

लगभग दस साल पह्ले पहली जून को घर से दोपहर में बाजार चला गया मिठाई लेने. मन में आया कि एक रसगुल्ला खाकर पानी पीकर तब चलूं. त्भी मन में बात आई अरे दस मिनट में तो घर पहुंच ही जाऊंगा.  घर तो पहुंच गया किन्तु आकर चारपाई पर लेट गया, पूरा शरीर जल रहा था. लू लग चुकी थी. पसीना बंद हो गया था. आज भी अधिक गर्मी होने पर पसीना बंद हो जाता है और शरीर में जलन होने लगती है.

अंग्रेज हमारे देश  से चले गये किन्तु नेता और अधिकारी जनता को अभी भी मानव नहीं समझते और न उसे पूरा अधिकार देना चाहते हैं. अपने लिये जनता के धन से हर प्रकार की सुविधा लेते हैं किन्तु जनता को सामान्य सुविधा भी नहीं देते. अधिकारी, नेता और ठीकेदार के झगडे में प्लेटफार्म तथा ट्रेनों में चलने वाले लाइसेन्सी वेन्डर गायब हो चुके है. इन्हें ट्रेन के अनुसार लाइसेन्स देना चाहिये, इन्हें रेल की कमाई का हिस्सा भी नहीं बनाना चाहिये. पुलिस, टीटी आदि को इनसे धन उगाही और सामान की उगाही भी नहीं करनी चाहिये. बस इसपर ध्यान देना चाहिए कि गुणवत्ता वाली सामग्री मिले. शायद इस प्रकार की घटना फिर न घटे.

नमस्कार.



Wednesday, May 28, 2014

दो प्रधानमंत्री

नमस्कार!
हाल चाल ठीक है. रोहिणी नक्षत्र की वर्षा ने किसानों मे भी खुशी बांटा और शहरी बाबुओं को भी राहत दिया. रोहिनियां आम अब अधिक मीठे लगेंगे. बाकी आम भी  जल्दी पकेंगे और मीठे भी लगेंगे. लगन का मौसम है ,पकवानों का जोर है. खानेवाले जुटे हुये हैं.
इसी तरह के मौसम में २७ मई, १९६४ को गांव के पडोस में तिलक समारोह था. लाउडस्पीकर पर गाना चल रहा था. बच्चे से बूढे तक जुटे थे. किसी ने आकर बताया आकाशवाणी से समाचार आ रहा है कि पंडित जी नहीं रहे.
लाउडस्पीकर बन्द हो गया. सन्नाटे में तिलक सम्पन्न हो गया. वह शाम पंडित जी की चर्चा मे बीता. लोगों को लग रहा था कि उनका कोई सगा नहीं रहा.
तब तक प्रथम पंचवर्षीय योजना के तहत ट्यूबवेल मेरे गांव में भी लग गया था, उसकी लम्बी नहरों से सिंचाई की सुविधा भी हो गई थी. उस समय साम्यवादी दल भी गांव में दाखिल हो गया था. नैनीताल मे जमीन पाये लोग रोज नेहरु-गांधी की गाथा भी गा रहे थे. लोकगीतों मे गान्धी, नेहरु व कांग्रेस की चर्चा होती थी. विवाह समारोह में प्रहसन-गाली- गीत में  भी गान्धी, नेहरू व कांग्रेस की चर्चा थी .
ऐसे परिवेश में पले बढे सम्वेदनशील लोगों के मानस पटल पर एक व्यक्तित्व अपनी जगह बना लिया. आधुनिक भारत को तेजी से विकसित राष्ट्रों की तरह बनाने का नेहरू का सपना चीनी आक्रमण से टूट गया और दिल भी. देश तो चलता ही रहेगा. लेकिन उसकी गुणवत्ता भूतकाल की नींव और वर्तमान के कर्म पर निर्भर होती है. आज नेहरू- नीति प्रश्नवाचक है किन्तु उनका भारत के निर्माण का सपना नहीं.

२९ मई,  १९८७ चौधरी चरण सिंह की पुण्यतिथि है, मेरे होश में चरण सिंह घोर नेहरू विरोधी थे. कांग्रेस के कुलवाद के भी विरोधी थे. उन्हें सख्त प्रशासक माना जाता था. जब वे मुख्यमंत्री हुये तो कार्यालय १० बजे माने १०बजे खुलने लगे. सरकारी कर्मचारी समयपालन करने लगे. जनता की एक शिकायत पर प्रशासन दौडता था. मेरे गांव के एक व्यक्ति ने पोस्ट्कार्ड पर शिकायत भेज दी थी. देवरिया से अधिकारी बरसात में भींगते, कीचड में चलकर गांव पहुंचे. हम बच्चों पर बहुत गहरा प्रभाव पडा. किन्तु वार्धक्य आते आते उनका भी मन कुर्सीमय और परिवारवादी हो गया. उन्हें अपने दल भारतीय क्रान्तिदल का कोई कार्यकर्ता योग्य नहीं लगा और इस प्रकार एक और कुनबा दल बन गया.

दोनों को श्रद्धांजलि.
नमस्कार.

अरविन्द की जेल यात्रा

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने नितिन गडकरी मानहानि केस में जेल जाना स्वीकार किया. उनका कहना था कि वे न्यायालय की सूचना पर उपस्थित हो गए हैं, और आगे भी आते रहेंगे, यह लिखकर दे दे रहे हैं, लेकिन विधि के अनुसार या माननीय न्यायमूर्ति के विवेक के अनुसार उनका कहना त्रुटिपूर्ण था. उन्हें जेल भेज दिया गया. न्यायमूर्ति ने उन्हें उच्च न्यायालय में जाने को सलाह दिया. उच्च न्यायालय ने उन्हें पहले जेल से बाहर आने कि कार्यवाही कर लेने की सलाह दी उन्होंने वैसा ही किया.

काका हाथरसी ने कहा है कि "सांई ये न बिरुद्धिये....." यद्यपि इसमें पत्रकारों और मीडिया का नाम नहीं है किन्तु अरविन्द ने इनका विरोध कर दिया. उनका विरोध कर दिया जो मंत्री बनाते बिगाडते हैं. यह सबसे बडा बंधुआ मजूर वाला क्षेत्र है. कुछ लोगों को खूब पगार मिलती है बाकी को लालीपाप. कस्बे से लेकर राजधानी तक मीडियाकर क्या क्या करते हैं ये सब  जानते हैं. एक शब्द है साक्षीभाव अर्थात परिघटना को राग द्वेश और संवेग से मुक्त होकर देखना. मीडियाकर को इसीभाव से समाचार लिखना चाहिये. एक शब्द है मीडिया प्रबन्धन. इसे भी मीडिया वाले ही जानते हैं, लोग भी जानते हैं.  भारत में लोग "बूझि मनहिं मन रहिये" "सामने कह कर तो देखे" के चलते किसी को कुछ कहना ठीक नहीं समझते हैं और कोर्ट कचहरी से भी डरते हैं.

भाई मीडियाकर लोग, अम्बेडकरवादी लोग, वामपंथी लोग, अन्नावादी लोग और प्रतिद्वन्द्वी राजदल वाले सभी अरविंद के जेल जाने का परिहास ही करते दिख रहे हैं.

केजरीवाल के जेल जाने से लोग इतने नाराज क्यों हैं. भारत की जेलों तमाम ऐसे लोग बन्द हैं जिन्हें वहां नहीं होना चाहिये. वे जमानत की न्यायिक प्रक्रिया के कारण जेल मे हैं. कचहरी के खर्च के लिये धन न जुटाने के कारण जेल मे हैं.

अभी कुछ दिनों पहले मीडिया में हंगामा हुआ था जब एक पुत्र ने वर्षों की मेहनत के बाद अपनी माता को जेल से रिहा कराया था.

जब देश के न्यायाधीश, शिक्षक, और पत्रकार/मीडियाकर आत्मनिरीक्षण न कर विवेक के स्थान पर अधिवक्ता की तरह पक्षपातपूर्ण तर्क का सहारा लेंगे तो देश का नैतिक पतन होगा.

नमस्कार.