Thursday, January 16, 2014

आपकी आप

नमस्कार!
हालचाल तो बस ठंढक है. दिसम्बर में एक मीडिया चैनल के महान ऐंकर महोदय परेशान थे कि ठंढ को लकवा मार गया है क्या? फिर लोग दिल्ली के चुनाव से परेशान हो गये थे. तमाम लोग आआपा को ललकार रहे थे कि सरकार बनाओ. एक लंगडे राज्य में लंगडी सरकार बन गई है. आआप राजदल के गठन से ही बहुत से लोग इससे एक साफसुथरी लोकतांत्रिक दल के रूप में देखना चाहते थे. दिल्ली की आंशिक सफलता ने लोगों की कल्पना में जान डाल दिया.
केजरीवाल ने सभी अन्य दलों के ईमानदार लोगों को बुलाया. अन्ना के आन्दोलन के तमाम लोग जो देश के नुक्कडों पर जुटते थे उनमें से अधिकाधिक आआप में आ गये. अब तो मारामारी का समय है.
सरकारी गाडी और बंगला तथा मंत्रिपद साथी विधायकों में ईर्ष्या पैदा करती ही है.
तमाम समस्यायें उन कार्यकर्ताओं की होती हैं जो प्रचार करते हैं. चुनाव के बाद जिनके प्रत्याशी विधायक हो जाते हैं वे भी विजयी हो जाते हैं जिस कार्यकर्ता का प्रत्याशी हार जाता है उसे बहुत संतोष करना पडता है. जो राजदल सरकार में हो उसे अपने निर्वाचित तथा अनिर्वाचित दोनों तरह के प्रत्याशियों को समान महत्व देते हुये उनके माध्यम से उस क्षेत्र से सम्पर्क में रहना चाहिये.
आआपा ने अब राजनीति के तालाब के नीचे बैठे कीचड को डबरा बना दिया है. अब लगे रहने की बात है. अभी वास्तव में भ्रष्टाचार के समापन पर सबका मानस अलग-अलग है. इसके एक होने में समय लगेगा. दल के प्रवक्ता,और  शीर्ष सदस्य को अपनी बात सार्वजनिक कहने का कोई अधिकार नहीं होता.
आशा है शीघ्र ही आआप इस तात्कालिक समस्या का हल निकाल लेगी.
केजरीवाल और अन्य मंत्रिओं को प्रत्येक क्षेत्र के सक्रिय कार्यकर्ताओं से भी मिलते रहना होगा. अब समय आ गया है कि देश की सभी इकाइयां सामने आयें और खुलकर सदस्यता अभियान चलायें.
नमस्कार.

Wednesday, January 15, 2014

राजनीति और जीविका

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
मकर संक्रांति ठीक-ठाक बीत गयी. चुनाव का बिगुल बज गया है. टिकट के लिये टिकटार्थी अपना बायोडाटा और समर्थक जुटाने में लगे हैं. सबलोग ऐसे दल से टिकट चाह रहे हैं जिसके चमत्कार से जीत जायें. हर पार्टी की रैली हो रही है. सभी जनसमर्थन के लिये दौड रहे हैं.
लोगों के बीच रहना लोगों के दुख से दुखी होकर उसके निराकरण का प्रयास करना इसके लिये सम्मानित होते रहने की भूख मात्र हो तो जिस किसी राजदल से मन बने उसकी सदस्यता लेकर राजनीति में रहना उचित है. कोई राष्ट्रीय समस्या हो तथा उअसके समाधान के लिये किसी राजदल का सहयोग करना भी उचित है. धन के लोभ और पद के मोह में राजदलों में जाने वाले कूदते रहते हैं. जनहित की बात कहते हुये, जनता को ही ठगने का काम करतए रहते हैं.
राजदलों में काम करनेवाले लोगों की आजीविका का संकट एक गम्भीर संकट है. यही संकट उन्हें भ्रष्टाचार में खींचती है. ईमानदान बने रहने के लिये पहले अपने से लडना पडता है, फिर अपनों से लडना पडता है, फिर चाहने वालों से लडना पडता है. उच्च सिद्धान्त के अनुपालन की राह में पत्थर अपने लोग ही बनते हैं. जीविका के साधन के अभाव में राज-दल के कार्यकर्ता को संकट का सामना करना पडता है ऐसे समय उसके साथ ऐसे लोग हो जाते हैं जिनका उद्देश्य येन-्केन -प्रकारेण अपना स्वार्थ महत्वपूर्ण होता है..
चुनाव के समय प्रत्याशी और राजद्लों को बहुत से लोग चाहिये. अभी भारत में अपनी विचारधारा वाले दल के लिये सामन्य जन न तो धन खर्च  करना चाहता है  न समय. ऐसी परिस्थिति में अवसरवादी लोग सामने आते हैं जो आगे चलकर पार्टी के लिये सरदर्द ही साबित होते हैं. तमाम बेरोजगार नौकरी की लालच में अथक श्रम करते हैं. उनके प्रत्याशी विधायक या सांसद चुनाव जीत जाते हैं तो उनकी आशा हो जाती है कि उन्हें कही न कही नौकरी मिल ही ्जायेगी, वे भी जल्दी ही अपने नेता को मंत्री के रूप में देखना चाहते हैं.
लोकतंत्र में आस्था और विश्वास रखने वाले लोगों को इस समस्या पर विचार करना चाहिये. अब यह जरूरी हो गया है कि हरेक लोकतान्त्रिक संस्था को ्मजबूत बनाया जाय. राजदल इसका आधार है इसलिये सभी राजदलों का पंजीकरण, और उसके संगठनात्मक चुनाव भी निर्वाचन आयोग की देखरेख में ही होने चाहिये. उसे सूचना अधिकार कानून में ले आना आवश्यक है तथा उसे मिले प्रत्येक पैसे का हिसाब होना चाहिये. देश के सबसे महत्वपूर्ण कार्य इन्हें सौप दिया जाता है और ये किसी के प्रति जिम्मेदार नही होते हैं. किसी को भी पत्र लिखना हर तरह की सिफारिश करना इनका सबसे बडा काम हो गया है. इस प्रकार के सभी पत्रो की जांच हो जाय तो पता चलेगा कि हर भ्रष्टाचारी के रक्षक के रूप में कोई राजदलकर्मी साथ है.
राजदल के कार्यकर्ता की जीविका का साधन का सवाल हल नहीं होगा तो भ्रष्टाचार समाप्त ही नहीं होगा.
फिर मिलेंगे.
नमस्कार.

Wednesday, January 8, 2014

शर्म-शर्म

नमस्कार!
हालचाल बहुत खराब है.
भीषण ठंढक है.
यनडीटीवी पर प्राइम टाइम में दिल्ली में दिल्लीवालों के लिये आरक्षण पर बहस चल रही है. अत्यन्त निराशाजनक स्थिति मे टीवी देखना बंद कर दिया. लेकिन सोने भी नहीं जा सका. अब अपनी बात लिख रहा हूं .शायद शान्ति मिल जाय.
कांग्रेस, भाजपा और आआपा तीनों दलों की शिक्षा की नीति का क्या कहना तीनों क्षेत्रीय आरक्षण की वकालत कर रहे हैं. अभी भी समय है तोनों दल भारत की जनता से माफी मांग लें.
दिल्ली से पढकर निकले सारे राजनेता, और अधिकारी जो दिल्ली में हैं उन्हें भी देश से माफी मांगनी चाहिये. यूजीसी के सभी अधिकारी जो ८०% लीकेज वली योजनाओं पर धन व्यय करते हैं उन्हे माफी मांगनी चाहिये.
देश के सभी सांसदों को देश से माफी मांगनी चाहिये.
दिल्ली राज्य  में १५ वर्षों से शासन कर रही कांग्रेस दिल्ली से १२वीं पास छात्रों को उच्च शिक्षा देने में असमर्थ रही है. केन्द्र में शासन कर चुकी भाजपा और कांग्रेस  को यह आवश्यक नहीं लगा कि दिल्ली की उच्च शिक्षा की  हालत में सुधार करें.
देश के तमाम राज्यों को विकास के नाम पर गलियाते पत्रकार, विद्वान और स्तम्भकार इस सत्य और तथ्य को नकारते रहे. दिल्ली और जनेवि के जुझारू नेता कुछ नहीं कर पाये.
एशियाड और कामनवेल्थ खेलों में पानी जैसा पैसा बहाने वालों शिक्षा के लिये क्या कर र्हे थे. देश के नेता शिक्षा के जो आंकडे बताते हैं वे किस बूते पर बताते हैं.
सबसे अधिक तरस आआपा के नीतिकारों और योगेन्द्र यादव पर आ रहा है. आप दिल्ली वालों को आरक्षण की बात कांग्रेस और भाजपा की तौर पर दिया. आआपा कह सकती थी कि दिल्ली से १२वीं  पास हर छात्र को उच्च शिक्षा की व्यवस्था कर दी जायेगी.
आआपा तो ६.५% शिक्षा पर व्यय करने के सपने को पूरा करे.
दिल्ली के सभी आवासीय बडे बंगलों को विद्यालय बना दीजिये. कुछ ही बंगलों में बहुमंजिली इमारतें बनाकर सबको शिफ्ट कर दीजिये.
नमस्कार.

Monday, January 6, 2014

आयकर से टोलटैक्स तक

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
चुनाव के जमाने में कर की चर्चा भी हो ही जाती है. भारत में पत्रकार जगत में 'करदाता' शब्द प्रचलित है. जब हम करदाता कहते हैं तो भारत के कुछ लोग गौरवान्वित महसूस करते है. कर तो भारत का प्रत्येक नागरिक देता है. कर पर चर्चा योगव्यवसायी बाबा रामदेव ने शुरु किया है. बाबा अब हजार रूपये की नोट नहीं बन्द करायेंगे न ही कालाधन को भारत में मंगवायेगे. (अब बाबा भी क्रीम पाउडर बनाने बे्चने लगे हैं तो बात का विषय भी बदल गया है. इनके उत्पादों की दुकानों से भी पक्की रसीद नहीं मिलती. दन्तकांति के लगातार उपयोग से मेरे दांत हिलने लगे हैं. )
मुद्दा तो बिल्कुल ठीक है कि भारत की कर प्रणाली दोषपूर्ण है. इस प्रणाली में हम केन्द्र सरकार, प्रान्त सरकार, नगर , गांव सबको अलग अलग टैक्स देते हैं. जब सुविधाओं की बात आती है तो सब अपना पल्ला झाड लेते हैं.
अप्रत्यक्ष कर उत्पादकर्ता और विपणन कर्ता वसूल करते है. जितनी इच्छा होती है उतनी सरकार को देते हैं बाकी सब रख लेते हैं. आईयमयफ भारत सरकार को सरकारी खर्च कम करने को कहता है तो ये सरकारी विभागों में नियुक्तियों रोककर खर्च बचाने का दिखावा करते हैं, खूब फिजूल्खर्ची करते हैं और अप्रत्यक्ष करों का मात्र दस प्रतिशत ही संग्रह करते हैं.
भारत के नागरिक को जन्म से लेकर मृत्यु तक और उसके बाद भी कितना कर दे देना पडता है उसका हिसाब करना कठिन है.
एक जमाने में दियासलाई पर भी दिये गये कर की रसीद  मिल जाती थी. अब राजदल उत्पादकों, विपणनकर्ताओं और ठीकेदारों से चुनाव चंदा और गिफ्ट ले लेते हैं और उन्हें करचोरी की छूट दे देते हैं.
आम अखबारी जनता और मीडिया आयकर, पेट्रो पदार्थों के दाम,रेल किराया पर खूब चर्चा करते है. रेल किराया बढाने के विवाद पर ममता जी ने मंत्री को हटवा दिया. सेवाकर बढाने पर चुप रहीं. सेवाकर का दायरा बढता जा रहा है जनता झेलती जा रही है.
जब बिक्री कर आया तो कहा गया कि जिसकी बिक्री अधिक है वे लोग सरकार को कुछ कर दे दें. बाद मे सरकार ने इसे ग्राहकों से वसूलने की छूट दे दी.अब जनता कर देती है, उसका एक हिस्सा सरकार पाती है बाकी टैक्स कलेक्टर. अब इसका नाम वैट हो गया है, पहले तो व्यापारियों ने इसका विरोध किया बाद में राजी हो गये. जब सरकार को वैट वसूलना है तो सरकार को हर छोटी या बडी दुकान को अपनी ओर से छपवा कर रसीद देनी चाहिये. साथ मे आधुनिक डिजिटल तकनीक का एक उपकरण देना चाहिये. रसीद पर पूर्ण विवरण होना चाहिये तथा भुगतान किए गये धन की स्लिप डिजिटल मशीन द्वारा भी मिलनी चाहिये यह मशीन हर बिक्री की की सूचना वैट विभाग को दे देगी.
जो सडक या पुल सरकार बनवाती है वह नागरिकों के धन से बनती है. टोल के नाम पर जनता से खूब वसूली होती है. जिसका दस प्रतिशत हिस्सा भी सरकारी कोष में नहीं जाता. इससे केवल ठीकेदार ही कमाते हैं यह उन्ही के लाभ के लिये वसूला भी जाता है. टोल टैक्स की वसूली तत्काल ही बन्द होनी चाहिये.

आयकर  की चक्की में मध्यवर्ग को पीसा जात है. आयकर दाता से दंड के नाम पर कर लिया जाता है तथा उसे कोई सुविधा भी नहीं दी जाती. आयकर के दायरे में आते ही उससे सुविधायें हटाई जाने लगती हैं. आयकर विभाग अपने इस दुधारी गाय को लाठी मारने के सिवा कुछ नहीं करता. उसे आयकर की सूचना तक नहीं देता. आयकर की सीमा बहुत नीचे से शुरु हो जाती है तथा १०,२०, और ३० प्रतिशत तक ही रहती है.
आयकर की सीमा  को फुटकर उपभोक्ता सूचकांक से जोड दिया जाना चहिये.
पचास लाख की सीमा तक २५% आय को बीमा, पीयफ आदि के लिये छूट दिया जाना चाहिये.
प्रत्येक आयकरदाता का समूह बीमा किया जाना चहिये, करदाता द्वारा दिये गये धन का एक प्रतिशत इस हेतु व्यय किया  जाना चाहिये और असामयिक मृत्यु की दशा में तथा अति गम्भीर रोगों की चिकित्सा में दिया जाना चाहिये.
इसे अत्यन्त सरल किया जाना चाहिये और किसी भी संस्था  को छूट किसी भी दशा में नहीं दिया जाना चाहिये.
बाकी फिर कभी.
नमस्कार.

आम आदमी और चुनाव के मुद्दे

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
२०१४ के संसदीय आम चुनाव का प्रचार जोरों पर है. मीडिया और चौपाल सभी जगह एक ही चर्चा कौन जीतेगा. किस राजदल को कौन सी रणनीति अपनानी चाहिये.
भारत के नागरिक को, भोजन, वस्त्र, आवास,शिक्षा, चिकित्सा,न्याय,सुरक्षा कैसे मिल सकेगी? कौन इसे देने की बात कर रहा है? केजरीवाल, मोदी, राहुल, मायावती, मुलायम या कोई और.
भाजपा ने कर्म्चारियों के पेंशन योजना को बिना सोचे समझे समाप्त कर दिया अभी तक उसका पूरा पूरा  समाधान नहीं हो पाया है. मोदी के विकास के माडल में पूंजीवाद ही चलेगा. भले ही उनकी माताजी घरेलू नौकरानी थी वे मजदूरों की बात नही करेंगे आज उनके प्रिय कारपोरेट घराने हैं.वे चाय जब बेचते थे तब बेचते थे अब उनके मन में गरीबों को और गरीब बनाने का सूत्र है.
वे सबको समान और गुणवत्ता पुर्ण शिक्षा देने की बात नहीं कर सकते. ्गुजरात के सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय मानक नहीं हैं. वहां के हर नागरिक को हर स्तर की अत्याधुनिक चिकित्सा की सुविधा नहीं है. वहां पर भी न्याय शीघ्रता से नहीं मिलता है.

आज भारत की जनता मूल्भूत मुद्दों पर राय जानना चाहती है.वह रोजी-रोटी, भोजन-छाजन या रोटी, कपडा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा, न्याय  ौर सुरक्षा की चिन्ता में है. इन समस्याओं का समाधान किस दल के पास है? उसका खाका बताये और जाकर जनता की सेवा करे. सता और कुर्सी केलिये ठीका पर कब्जा के लिये मुखौटा बदल कर विधायिका के रास्ते सता पर कब्जा की नीयत छीड दे.
नमस्कार!


सरकारी आवास की सीमा

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
आम आदमी पार्टी ने हर आम व खास आदमी की पहचान बदल दी है. दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री के परम्परागत आवास को छोडकर  पांच कमरेवाले मकान को रहने के लिये् चुना तथा साथ वाले पांच कमरेवाले आवास को आवासीय कार्यालय बनाने के लिये . उनके इस निर्णय ने हलचल मचा दी है. अरविद के परिवार में छह सदस्य हैं. वे बताते हैं कि  उनका इस समय का घर भी चार कमरे का है. यनडीटीवी के पत्रकार ने सम्भवतः टिप्पडी की थी कि बडे मकान वालों को मुख्यमंत्री का यह निवास बडा लगता है. आम आदमी पार्टी के घोषडा पत्र में है कि वे बंगला और मंहगी गाडी नही लेंगे. एक नामी पत्रकार ने लिखा है कि पहलेवाली मुख्यमंत्री जी का बंगला भी टीवी पर दिखाया जाना चाहिये. इस समय सादगी और केजरीवाल के बंगले पर राष्ट्रीय बहस चल रही है.

इस बहस  ने मेरी स्मृति में बसी बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दशक में ्चर्चित बहस को सामने ला दिया जिसमें राष्ट्रपति भवन, सरकारी तामझाम, तोपों की सलामी आदि पर चर्चा हुआ करती थी. लोकतंत्र की स्थापना के बाद लोगों के दिमाग में  सिंहासन,  राज , सत्ता तख्त आदि अभी तक बसे हुये हैं. इसे समाप्त करने के महात्मा गांधी के सलाह को कोई महत्व न देते हुये दिल्ली में उनकी समाधि बनाकर उस पर इतना व्यय किया जाता है कि बाकी सभी लोगों  पर हुये  व्यय को न्यायपूर्ण सिद्ध किया जा सके.

जब यह बहस चल रही है तो यह तय जाना चाहिये कि भारत के राजनैतिक और प्रशासनिक लोकसेवकों को किस स्तर का कितने क्षेत्रफल का आवास दिया जाना चाहिये. भारत में प्रत्येक स्थान पर इसी मानक का उपयोग किया जाना चाहिये. ऐसा करने पर प्रत्येक स्थान पर भरपूर मात्रा में सरकारी जमीन खाली होगी, जिस पर तमाम कार्यालय, विद्यालय और कर्मचारियों के आवास बनाये जा सकते हैं. जितना बडा शहर हो भवन की ऊंचाई उतनी ही बढाई जाय.इस बात पर  बहुत से लोग यह प्रश्न उठायेंगे कि वर्तमान भवनों का क्या किया जायेगा. सभी जानते हैं कि इनमे से अधिकांश भवन अपनी आयु पूरा कर चुके हैं. जो  काम लायक हैं वे भी साम्राज्यवाद की मानसिकता को ही बनाते हैं. अभी कुछ दिनों पूर्व संसद भवन की आयु को लेकर प्रश्न उथे थे, आज के सरकारी लोगों को इन्हें नष्ट करने का मन नहीं करता. ये लोग अग्रेजों के बनाये भवनों और कानूनों इतर नहीं जाना चाहते हैं.

नई दिल्ली की सरकारी इमारतें जितनी जमीन घेरती हैं उतनी जमीन में आज की तकनीक से भवन और आवास बनाये जाय तो तमाम समस्याओं का समाधान मिल सकता है. सबसे बडी आवश्यकता है कि जनता मैदान की जहां जनता अपनी बात कह सके उसे जंतर मंतर पर सीमित कर दिया गया है. दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के पूरे क्षेत्र में आधुनिक तकनीक से नियोजित बहुमंजिले भवन बना दिये जांय. पूरा लुटियन क्षेत्र बहुमंजिले भवनों का बना दिया जाय तो अनेकानेक समस्याओं का समाधान निकल आयेगा.

नमस्कार.


Saturday, January 4, 2014

आप ही आप

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बन गयी. आम आदमी खुश है. आआप  के रथ को रोकने के कुछ तिकडमी प्रयास किये गये. रथ को २०% पहले रोक भी लिया गया. अभी आम आदमी भीड का हिस्सा ही बना रहना चाहता. अपने मत को हारते देखने से पहले ही रास्ता बदल लेता है. इसका मुख्य कारण निर्णय लेने के लिये आवश्यक मुद्दों का अभाव. बहुमत के अभाव में ही सही भाजपा, कांग्रेस और मीडिया ने हुरपेट कर केजरीवाल को फंदे में लेना चाहा किन्तु उन्होंने जनता से पू्छने का आइडिया लेकर इन तीनों के मंसूबे पर पानी फेरकर सरकार बनाकर बहुमत भी सिद्ध कर दिया.
अब कोठी और कार का कलह उपजा है. प्रशासनिक लोकसेवक भारत में अपना प्रभुत्व बनाने के लिये मंत्रीगण को तमाम सुख सुविधायें उपलब्ध करा देते हैं, प्रलोभन, के तमाम स्वरूपों का उपयोग कर इन्हें जनता से दूर और आरामदेह जिन्दगी जीने का आदती बनाकर अपना काम करा लिया जाता है. करोडों, अरबों के कारोबार में आदर्शों के नशे हिरन हो जाते हैं. इन लोगों पर सभी प्रकार के साम, दान, दण्ड और भेद के हथियार उपयोग में लाये जायेंगे. जनता से संवाद करते रहने और सचेत रहने से तथा निरंतर सुधार करने की आदत रहेगी तो निखार ही आयेगा.
जनसेवा का कार्य वानप्रस्थ आश्रम या सन्यास आश्रम से ही चल सकता है. अर्थात जो भी जनसेवा करना चाहेगा उसे परिवार और परिजन के सुख से वंचित होना पडेगा. विधायक हो मंत्री सबको एक समान ही आवास की आवश्यकता है. आवास को आफिस मत बनाइये. कार्यालय का काम कार्यालय में ही कीजिये. जनता से  कार्यालय या  सचिवालय में ही मिलिये. लेकिन मिलिये अवश्य. प्रेस से भी मिलिये. ऐसी तकनीक बनाइये कि जनता को अपनी बात कहने के लिये आपके पास जाने  की जरूरत ही कम पडे. ईमेल से आवेदन मंगाइये और समस्या का निपटारा कीजिये.
भारत की जनता में त्याग को बडा माना गया है अभी भी उसका महत्व है. आआपा के प्रत्येक सदस्य अब राडार पर है. इसपर आपको सचेत रहना पडेगा. इस समय जो भी दशा चल रही है
भारत के स्वतंत्र होने के बाद से ही चर्चा चलती रही कि साम्राज्यवाद के अवशेषों का समापन कर दिया जाय किंतु हर बार जनता धोखा खा जाती है. बहुत दिनों  तक बहस चली कि राष्ट्रपति भवन से लेकर समस्त तामझाम में लोकतंत्र की आत्मा मर जाती है. एक बार बडा फैसला लेकर लुटियन दिल्ली को तहस नहस कर सभी सांसदों, विधायकों मंत्रियों केलिये बने हुये भवनों कोध्वस्त करना ही होगा.
देश के बहुत से लोग सांस थामे आआप की सफलता चाह्ते हैं तथा यह भी चाह्ते हैं कि मंत्रीगण इत्नी सादगी से रहें कि कोई भी जल्दी मंत्री न बनना चाहे.
नमस्कार.