नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
मकर संक्रांति ठीक-ठाक बीत गयी. चुनाव का बिगुल बज गया है. टिकट के लिये टिकटार्थी अपना बायोडाटा और समर्थक जुटाने में लगे हैं. सबलोग ऐसे दल से टिकट चाह रहे हैं जिसके चमत्कार से जीत जायें. हर पार्टी की रैली हो रही है. सभी जनसमर्थन के लिये दौड रहे हैं.
लोगों के बीच रहना लोगों के दुख से दुखी होकर उसके निराकरण का प्रयास करना इसके लिये सम्मानित होते रहने की भूख मात्र हो तो जिस किसी राजदल से मन बने उसकी सदस्यता लेकर राजनीति में रहना उचित है. कोई राष्ट्रीय समस्या हो तथा उअसके समाधान के लिये किसी राजदल का सहयोग करना भी उचित है. धन के लोभ और पद के मोह में राजदलों में जाने वाले कूदते रहते हैं. जनहित की बात कहते हुये, जनता को ही ठगने का काम करतए रहते हैं.
राजदलों में काम करनेवाले लोगों की आजीविका का संकट एक गम्भीर संकट है. यही संकट उन्हें भ्रष्टाचार में खींचती है. ईमानदान बने रहने के लिये पहले अपने से लडना पडता है, फिर अपनों से लडना पडता है, फिर चाहने वालों से लडना पडता है. उच्च सिद्धान्त के अनुपालन की राह में पत्थर अपने लोग ही बनते हैं. जीविका के साधन के अभाव में राज-दल के कार्यकर्ता को संकट का सामना करना पडता है ऐसे समय उसके साथ ऐसे लोग हो जाते हैं जिनका उद्देश्य येन-्केन -प्रकारेण अपना स्वार्थ महत्वपूर्ण होता है..
चुनाव के समय प्रत्याशी और राजद्लों को बहुत से लोग चाहिये. अभी भारत में अपनी विचारधारा वाले दल के लिये सामन्य जन न तो धन खर्च करना चाहता है न समय. ऐसी परिस्थिति में अवसरवादी लोग सामने आते हैं जो आगे चलकर पार्टी के लिये सरदर्द ही साबित होते हैं. तमाम बेरोजगार नौकरी की लालच में अथक श्रम करते हैं. उनके प्रत्याशी विधायक या सांसद चुनाव जीत जाते हैं तो उनकी आशा हो जाती है कि उन्हें कही न कही नौकरी मिल ही ्जायेगी, वे भी जल्दी ही अपने नेता को मंत्री के रूप में देखना चाहते हैं.
लोकतंत्र में आस्था और विश्वास रखने वाले लोगों को इस समस्या पर विचार करना चाहिये. अब यह जरूरी हो गया है कि हरेक लोकतान्त्रिक संस्था को ्मजबूत बनाया जाय. राजदल इसका आधार है इसलिये सभी राजदलों का पंजीकरण, और उसके संगठनात्मक चुनाव भी निर्वाचन आयोग की देखरेख में ही होने चाहिये. उसे सूचना अधिकार कानून में ले आना आवश्यक है तथा उसे मिले प्रत्येक पैसे का हिसाब होना चाहिये. देश के सबसे महत्वपूर्ण कार्य इन्हें सौप दिया जाता है और ये किसी के प्रति जिम्मेदार नही होते हैं. किसी को भी पत्र लिखना हर तरह की सिफारिश करना इनका सबसे बडा काम हो गया है. इस प्रकार के सभी पत्रो की जांच हो जाय तो पता चलेगा कि हर भ्रष्टाचारी के रक्षक के रूप में कोई राजदलकर्मी साथ है.
राजदल के कार्यकर्ता की जीविका का साधन का सवाल हल नहीं होगा तो भ्रष्टाचार समाप्त ही नहीं होगा.
फिर मिलेंगे.
नमस्कार.
हालचाल ठीक है.
मकर संक्रांति ठीक-ठाक बीत गयी. चुनाव का बिगुल बज गया है. टिकट के लिये टिकटार्थी अपना बायोडाटा और समर्थक जुटाने में लगे हैं. सबलोग ऐसे दल से टिकट चाह रहे हैं जिसके चमत्कार से जीत जायें. हर पार्टी की रैली हो रही है. सभी जनसमर्थन के लिये दौड रहे हैं.
लोगों के बीच रहना लोगों के दुख से दुखी होकर उसके निराकरण का प्रयास करना इसके लिये सम्मानित होते रहने की भूख मात्र हो तो जिस किसी राजदल से मन बने उसकी सदस्यता लेकर राजनीति में रहना उचित है. कोई राष्ट्रीय समस्या हो तथा उअसके समाधान के लिये किसी राजदल का सहयोग करना भी उचित है. धन के लोभ और पद के मोह में राजदलों में जाने वाले कूदते रहते हैं. जनहित की बात कहते हुये, जनता को ही ठगने का काम करतए रहते हैं.
राजदलों में काम करनेवाले लोगों की आजीविका का संकट एक गम्भीर संकट है. यही संकट उन्हें भ्रष्टाचार में खींचती है. ईमानदान बने रहने के लिये पहले अपने से लडना पडता है, फिर अपनों से लडना पडता है, फिर चाहने वालों से लडना पडता है. उच्च सिद्धान्त के अनुपालन की राह में पत्थर अपने लोग ही बनते हैं. जीविका के साधन के अभाव में राज-दल के कार्यकर्ता को संकट का सामना करना पडता है ऐसे समय उसके साथ ऐसे लोग हो जाते हैं जिनका उद्देश्य येन-्केन -प्रकारेण अपना स्वार्थ महत्वपूर्ण होता है..
चुनाव के समय प्रत्याशी और राजद्लों को बहुत से लोग चाहिये. अभी भारत में अपनी विचारधारा वाले दल के लिये सामन्य जन न तो धन खर्च करना चाहता है न समय. ऐसी परिस्थिति में अवसरवादी लोग सामने आते हैं जो आगे चलकर पार्टी के लिये सरदर्द ही साबित होते हैं. तमाम बेरोजगार नौकरी की लालच में अथक श्रम करते हैं. उनके प्रत्याशी विधायक या सांसद चुनाव जीत जाते हैं तो उनकी आशा हो जाती है कि उन्हें कही न कही नौकरी मिल ही ्जायेगी, वे भी जल्दी ही अपने नेता को मंत्री के रूप में देखना चाहते हैं.
लोकतंत्र में आस्था और विश्वास रखने वाले लोगों को इस समस्या पर विचार करना चाहिये. अब यह जरूरी हो गया है कि हरेक लोकतान्त्रिक संस्था को ्मजबूत बनाया जाय. राजदल इसका आधार है इसलिये सभी राजदलों का पंजीकरण, और उसके संगठनात्मक चुनाव भी निर्वाचन आयोग की देखरेख में ही होने चाहिये. उसे सूचना अधिकार कानून में ले आना आवश्यक है तथा उसे मिले प्रत्येक पैसे का हिसाब होना चाहिये. देश के सबसे महत्वपूर्ण कार्य इन्हें सौप दिया जाता है और ये किसी के प्रति जिम्मेदार नही होते हैं. किसी को भी पत्र लिखना हर तरह की सिफारिश करना इनका सबसे बडा काम हो गया है. इस प्रकार के सभी पत्रो की जांच हो जाय तो पता चलेगा कि हर भ्रष्टाचारी के रक्षक के रूप में कोई राजदलकर्मी साथ है.
राजदल के कार्यकर्ता की जीविका का साधन का सवाल हल नहीं होगा तो भ्रष्टाचार समाप्त ही नहीं होगा.
फिर मिलेंगे.
नमस्कार.
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