नमस्कार!
हालचाल तो बस ठंढक है. दिसम्बर में एक मीडिया चैनल के महान ऐंकर महोदय परेशान थे कि ठंढ को लकवा मार गया है क्या? फिर लोग दिल्ली के चुनाव से परेशान हो गये थे. तमाम लोग आआपा को ललकार रहे थे कि सरकार बनाओ. एक लंगडे राज्य में लंगडी सरकार बन गई है. आआप राजदल के गठन से ही बहुत से लोग इससे एक साफसुथरी लोकतांत्रिक दल के रूप में देखना चाहते थे. दिल्ली की आंशिक सफलता ने लोगों की कल्पना में जान डाल दिया.
केजरीवाल ने सभी अन्य दलों के ईमानदार लोगों को बुलाया. अन्ना के आन्दोलन के तमाम लोग जो देश के नुक्कडों पर जुटते थे उनमें से अधिकाधिक आआप में आ गये. अब तो मारामारी का समय है.
सरकारी गाडी और बंगला तथा मंत्रिपद साथी विधायकों में ईर्ष्या पैदा करती ही है.
तमाम समस्यायें उन कार्यकर्ताओं की होती हैं जो प्रचार करते हैं. चुनाव के बाद जिनके प्रत्याशी विधायक हो जाते हैं वे भी विजयी हो जाते हैं जिस कार्यकर्ता का प्रत्याशी हार जाता है उसे बहुत संतोष करना पडता है. जो राजदल सरकार में हो उसे अपने निर्वाचित तथा अनिर्वाचित दोनों तरह के प्रत्याशियों को समान महत्व देते हुये उनके माध्यम से उस क्षेत्र से सम्पर्क में रहना चाहिये.
आआपा ने अब राजनीति के तालाब के नीचे बैठे कीचड को डबरा बना दिया है. अब लगे रहने की बात है. अभी वास्तव में भ्रष्टाचार के समापन पर सबका मानस अलग-अलग है. इसके एक होने में समय लगेगा. दल के प्रवक्ता,और शीर्ष सदस्य को अपनी बात सार्वजनिक कहने का कोई अधिकार नहीं होता.
आशा है शीघ्र ही आआप इस तात्कालिक समस्या का हल निकाल लेगी.
केजरीवाल और अन्य मंत्रिओं को प्रत्येक क्षेत्र के सक्रिय कार्यकर्ताओं से भी मिलते रहना होगा. अब समय आ गया है कि देश की सभी इकाइयां सामने आयें और खुलकर सदस्यता अभियान चलायें.
नमस्कार.
हालचाल तो बस ठंढक है. दिसम्बर में एक मीडिया चैनल के महान ऐंकर महोदय परेशान थे कि ठंढ को लकवा मार गया है क्या? फिर लोग दिल्ली के चुनाव से परेशान हो गये थे. तमाम लोग आआपा को ललकार रहे थे कि सरकार बनाओ. एक लंगडे राज्य में लंगडी सरकार बन गई है. आआप राजदल के गठन से ही बहुत से लोग इससे एक साफसुथरी लोकतांत्रिक दल के रूप में देखना चाहते थे. दिल्ली की आंशिक सफलता ने लोगों की कल्पना में जान डाल दिया.
केजरीवाल ने सभी अन्य दलों के ईमानदार लोगों को बुलाया. अन्ना के आन्दोलन के तमाम लोग जो देश के नुक्कडों पर जुटते थे उनमें से अधिकाधिक आआप में आ गये. अब तो मारामारी का समय है.
सरकारी गाडी और बंगला तथा मंत्रिपद साथी विधायकों में ईर्ष्या पैदा करती ही है.
तमाम समस्यायें उन कार्यकर्ताओं की होती हैं जो प्रचार करते हैं. चुनाव के बाद जिनके प्रत्याशी विधायक हो जाते हैं वे भी विजयी हो जाते हैं जिस कार्यकर्ता का प्रत्याशी हार जाता है उसे बहुत संतोष करना पडता है. जो राजदल सरकार में हो उसे अपने निर्वाचित तथा अनिर्वाचित दोनों तरह के प्रत्याशियों को समान महत्व देते हुये उनके माध्यम से उस क्षेत्र से सम्पर्क में रहना चाहिये.
आआपा ने अब राजनीति के तालाब के नीचे बैठे कीचड को डबरा बना दिया है. अब लगे रहने की बात है. अभी वास्तव में भ्रष्टाचार के समापन पर सबका मानस अलग-अलग है. इसके एक होने में समय लगेगा. दल के प्रवक्ता,और शीर्ष सदस्य को अपनी बात सार्वजनिक कहने का कोई अधिकार नहीं होता.
आशा है शीघ्र ही आआप इस तात्कालिक समस्या का हल निकाल लेगी.
केजरीवाल और अन्य मंत्रिओं को प्रत्येक क्षेत्र के सक्रिय कार्यकर्ताओं से भी मिलते रहना होगा. अब समय आ गया है कि देश की सभी इकाइयां सामने आयें और खुलकर सदस्यता अभियान चलायें.
नमस्कार.
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