Thursday, December 1, 2011

खुदरा बाजार बनाम माल

नमस्कार!

हालचाल ठीक है ?

देश का हाल और कांग्रेस की चाल ठीक नहीं है. एफडीआई की चर्चा बड़े जोरों पर है. आज भारत  बंद है, कटोरे में पैसा दिखाकर आढतिया और खुदरा वाले भिखारी बन जाने के डर में हैं. कांग्रेस को छोड़कर सभी राजनैतिक दल इसके विरोध में हैं. टीवी और अखबार सभी इसपर परिचर्चा कर रहे हैं. कुछ इसे गुलामी का आरम्भ मान रहें हैं तो कुछ भारत के स्वर्णिम भविष्य का आरम्भ.

लोकतान्त्रिक भारत की अलोकतांत्रिक पार्टी कांग्रस ने अपने सांसदों और और सरकार के सहयोगी दलों बिना विचार विमर्श किये संसद के सत्र काल में निर्णय लेती है कि भारत में खुदरा व्यापार में भाग लेने हेतु विदेशी कंपनियां ५१% तक प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश कर सकती हैं. इससे भारत में खाद्य सामग्री की सुरक्षा होगी, सामान सस्ता मिलेगा और किसान लाभान्वित होंगे. कांग्रेस के इस कथन से कांग्रेसी भी सहमत नहीं हैं. किन्तु  वे कुछ बोल नहीं सकते. सांसद और विधायक अपने दल के मुखिया और खास लोगों की राय को गलत होने पर भी मानने को को बाध्य हैं क्योंकि किसी भी राज नैतिक दल में आन्तारिक लोकतंत्र है ही नहीं. दूसरी ओर संसद संचालन के तमाम नियम ऐसे हैं जिन्हें आज के समय में लोकतांत्रिक कत्तई नहीं कहा जा सकता है.

कोई भी विदेशी धन कमाने के लिए ही धन लगायेगा. विदेशी धन कमाकर विदेश ही  ले जाएगा. ४९% वाले भारतीय भी कमायेगें. व्यापार कमाने के लिए किया जाता है. किन्तु यहाँ तो व्यापार लूटने के लिए किया जा रहा है.  जो राजनैतिक दल आज इसके लिए संसद नहीं चलने दे रहे हैं. वे कभी उर्वरक की अनुपलब्धता  पर संसद ठप नही कर सकते. कुछ और प्रश्न हैं-
१. क्या भारत में खाद्य पदार्थ के संरक्षण की व्यवस्था अपने स्तर पर नहीं की जा सकती है ? आधुनिक गोदामों और शीत गृहों कि व्यवस्था क्यों नहीं हो पा रही हैं?
२. क्या अमूल जैसे सहकारी विपणन  केंद्र नहीं विकसित किये जा सकते हैं ?
३. यदि यह किसानों के लिए हितकारी योजना है तो इसे विस्तृत रूप से समझाकर पूरे देश में ही क्यों नहीं लागू किया जा रहा है?
४. यदि भारत को विदेशी मुद्रा के लिए ही यह कार्य मजबूरी में करना पड़ रहा है तो भी जनता को जानने का हक है.
५. यदि किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि के चलते ऐसा करना मजबूरी है तो भी जनता को जानने का हक है.
६. यदि एफडीआई मजबूरी ही है तो ४९% की ही अनुमति दी जाय.
७ . जब आधे से अधिक सांसद चाहते हैंकि एफडीआई न आवे तो इसे क्यों नहीं वापस कर लिया जा रहा है. अब तो साफ़ लग रहा है कि इसे लागू कराने के लिए सरकार अलोकतांत्रिक विधाओं का उपयोग करने जा रही है.

अब समय आ गया है कि भारत में थोक और खुदरा व्यापार की नीति स्पष्ट रूप से बन जाय जिससे सभी पक्षों का न्यायपूर्ण हित हो सके. इसके लिए सभी दलों को अपने ड्राफ्ट बिल तैयार कर लेने चाहिए जिससे सभी अपनी बात स्पष्ट रूप से कह सकें.

जबसे माल या सुपर बाजार  खुलने लगे हैं भारत के उच्च मध्यवर्ग के लोग माल को प्रतिष्ठा का विषय भी मान लिए हैं अतः इन्हें खुलना ही है.  इसलिए देश और प्रदेश के राजनेता शीघ्रातिशीघ्र सम्बंधित कानूनों में भी संशोधन करें जिससे जनता का लाभ हो सके. अब यह जरूरी हो गया है कि प्रत्येक कानून का पुनरीक्षण दस  वर्षों पर अवश्य ही हो जाय. आवश्यकता होने पर पहले भी  संशोधन किया जाय. संसद और विधान सभाओं के सत्र निर्धारित समय तक अवश्य चलाये जाय  यदि किसी भी कारण से सत्र में बाधा  आती है तो सत्रकाल स्वतः आगे बढ़ जाय.

Friday, November 4, 2011

विश्वविद्यालय की परीक्षा

नमस्कार !

क्या हालचाल है?

अभी थोड़ी देर पहले रवीश जी के ब्लॉग पर ( http://naisadak.blogspot.com/ ) दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू सेमेस्टर सिस्टम को भारत के लिए बेकार बताया गया है. इसपर पहले मैं अपना अनुभव बताता हूँ - मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में १९७०-१९७२ तक विज्ञान वर्ग में स्नातक की परीक्षा सेमेस्टर प्रणाली से दिया हूँ. इस प्रणाली में  प्रत्येक विषय के एक प्रश्नपत्र की पढ़ाई तथा उसकी परीक्षा होती है. पहले सेमेस्टरकी परीक्षा दिसंबर में होनी थी अधिकाधिक छात्र परीक्षा के लिए तैयारी कर रहे थे उसी समय कुछ छात्र जाड़े के नाम पर परीक्षा स्थगित कराने के अभियान  पर निकल गए और कहने लगे कि जनतांत्रिक अधिकार है परीक्षा टाली जाय. विज्ञान संकाय के डीन के पास छात्रावास के छात्र गए और परीक्षा टलवा दिए . हमलोग भी खुश हो गए कि चलो परीक्षा से गला छूटा. दूसरे सेमेस्टर की पढाई शुरू हो गई . यहाँ पर एक बात और उल्लेखनीय है कि प्रैक्टिकल की परीक्षा न होकर प्रतिदिन मूल्यांकन प्रणाली लागू थी.

जब दूसरे सेमेस्टर के परीक्षा की बारी आयी तो परीक्षा टलवाऊ समूह फिर सक्रिय हो गया और एक प्रश्नपत्र का बहिष्कार करा दिया. इसबार प्रशासन कठोर निर्णय पर उतारू हो गया और परीक्षा नही टली. वहाँ पर जो सेमेस्टर प्रणाली थी उसमे अगले सेमेस्टर  में पढ़ने और परीक्षा देने में कोई बाधा नही थी इसलिए सभी लोग एक प्रश्नपत्र में अनुपस्थित होने पर भी अगले सेमेस्टर में चले गए. परिणाम यह हुआ कि हमलोगों को एक प्रश्नपत्र के स्थान पर दो प्रश्नपत्रों को एक साथ तैयार करना पड़ा. बाद में पता चला कि परीक्षा टलवाउ नेता को अगले वर्ष छात्रसंघ का चुनाव लड़ना था. इसके लिए उन्होंने सबके कैरियर को दांव पर लगा दिया था.

गोरखपुर विश्वविद्यालय में १९७४ के जेपी आन्दोलन के बाद सत्र अनियमित हो गए और आज तक नियमित नहीं हो पाए हैं. यहाँ पर विधि संकाय में सेमेस्टर प्रणाली है किन्तु यहाँ की सेमेस्टर प्रणाली में प्रतिवर्ष आगणन पद्धति  है अर्थात विधि प्रथम वर्ष पास किये बिना द्वितीय वर्ष में नहीं जा सकते. सेमेस्टर प्रणाली के होते हुए भी आज तक  विधि का सत्र भी नियमित नहीं है.

जब मैं लिख रहा हूँ कि गोरखपुर विश्वविद्यालय का सत्र नियमित नहीं है तो यह सुनकर बहुत सारे लोग नाराज हो सकते हैं. किन्तु यह वास्तविकता है कि यहाँ के परीक्षा परिणाम ४५ दिन में नहीं निकल पाते हैं. पहले तो दोष छात्रसंघों  का भी था किन्तु अब तो केवल विश्वविद्यालय प्रशासन ही जिम्मेदार है.

इस परिप्रेक्ष्य यह भी कहना समीचीन होगा कि पचहत्तर दिन के ग्रीश्मावाकास, पैंतालीस कार्य दिवसों की परीक्षा और असीमित अवकाशों और शोक अवकाशों के होते हुए एक सौ अस्सी पढाई के कार्य दिवस कैसे पूरे हो सकते हैं.
ऎसी स्थिति में पढाई की गुणवत्ता केवल इंफ्रास्ट्रचर से ही नहीं निर्धारित की जा सकती है.

यहाँ पर यहभी कहना समीचीन होगा कि शिक्षक संघों को शिक्षा की गुणवता और पाठ्यक्रम की सार्थकता पर भी ध्यान देना होगा नहीं तो परम्परागत विश्वविद्यालयों का अंत सुनिश्चित है.

Monday, October 3, 2011

गरीबी रेखा

नमस्कार !

क्या हालचाल है ?

अमीरी की रेखा का ज्ञान भारत को परेशान कर रहा है. महान भारत के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री अहलुवालिया जी ने तमाम लोगों को रातोंरात अमीर बना दिया. बहुत दिनों से मैं भी गरीबी रेखा की खोज में था मिल ही नहीं रही थी. कई लोग और कई सस्थाएं इस रेखा को जहां तहां खीच रहे थे. शुक्र है माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने योजना आयोग से रेखा की मांग कर दी. योजना आयोग की रेखा को देखकर, मध्यवर्ग जो विद्वान दीखने के लिए अखबार पढता है और टीवी पर समाचार पढ़ता है, बौखला गया. उसके पैर के नीचे की जमीन खिसक गयी. वह अपने को अमीर समझता था. अब फिर रिक्सावाला उसके स्टेटस में आ गया. अब घड़ी, साइकिल,टीवी, मोबाइल और गैस जो कभी उसने अपनी अमीरी दिखाने के लिए लिए थे  निरर्थक हो गए. भारत अब अमीर देश हो गया. मध्यवर्ग अचानक बौखला गया और योजना आयोग पर हल्ला बोल दिया.

योजना आयोग के कर्ता धर्ता अहलुवालिया जी विदेश से लौटे   महान भारत के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री से मिले और महान आईआईटीएन मंत्री माननीय जैराम रमेश जी के साथ प्रेसवार्ता  कर बताया कि लोग गलत कह रहे हैं . बत्तीस रूपये रोज पर बौखलाइये मत. लोगों को गणित ही नहीं आती. एक परिवार में पाँच लोग माने जाते हैं. बत्तीस में पाँच क गुणा कीजिए तो होगा एक सौ साठ.  एक दिन में एक सौ साठ, महीने में तीस दिन तो हो गए तो महीनें में हो गया चा.....र....ह....जा.....र....आठ....सौ...... अब बताइये महीने में चार हजार आठ सौ आमदनी वाला परिवार गरीब कैसे हुआ? जबसे मैनें उनका वक्तव्य सुना  है तब से जोड़ रहा हूँ. साल में तो ३६५ या ३६६ दिन होते हैं. ४८०० में १२ से गुणा करने पर आ रहा है ५७६०० . और ५७६०० में ३६५ से भाग देने पर आ रहा है १५७.८० . फिर १५७.८० में ५ से भाग देने पर आ रहा है ३१.५६  तो इस प्रकार तीन साल के लिए गरीबी रेखा ३१.५६ दिन ही हुई. ३६६ वाले साल में फिर गणित गडबड हो जा रहा है. तो भाई मेरे समझ के बाहर के इस गणित को समझाइये.

इतना ही नहीं जब हर तीन महीने में औद्योगिक महगाई सूचकांक बदल जाता है, हर छह महीने में सरकारी कर्मचारियों का सूचकांक बदल जाता है तो गरीबी रेखा भी ऊपर उठेगी या अगले दस सालों के लिए स्थिर  रहेगी . क्योंकि अहलुवालिया जी ने कहा कि हमने तो रेखा को बदला है वो भी तेंदुलकर जी की राय पर.  फिर कोई कमेटी बनेगी और रेखा बनाएगी तब तक तो यही रेखा रहेगी यही नियम चला आ रहा है.

जयराम जी बोले कि जाति गणना के साथ ग़रीबों की भी गणना हो जायेगी तब पुनः रेखा खींची जायगी. अब इस समय जो गणना हो रही है वह तो पुराने फार्मूले पर ही चल रही है. फिलहाल हल्ला गुल्ला बंद हो जाय. बाक़ी बाद में  रेखा खींचना तो मंत्रालय को ही है खीच दी जायगी.

मेरे समझ आ रहा कि जब हमलोग ग्लोबल गाँव में ही रह रहें हैं तो  एक गाँव में गरीबी रेखा तो एक ही होनी चाहिए. मुहल्लेवार अलग अलग तो नहीं होनी चाहिए .

फिर मिलेंगें.
नमस्कार.

Sunday, October 2, 2011

गांधी और भारत

नमस्कार !

आज २ अक्टूबर २०११ है. मोहनदास करमचंद गांधी, गांधी जी, महात्मा गांधी, राष्ट्रपिता गांधी या बापू  का जन्म दिन है. गांधी को बचपन में टोपी से जाना. बाद में खादी से जाना. हाईस्कूल में संछिप्त आत्मकथा से जाना.लेकिन मैं  क्या गाँधी को जान पाया ? नहीं. सत्याग्रह, असहयोग और  अनशन की बातें सुनी. राष्ट्रीय सेवा योजना में काम करते समय कुछ लोगों को बताया, सुना उसे  आचार में लाना कठिन है लेकिन प्रयास करता रहा. विशेषकर अहिंसा का मार्ग अच्छा लगता रहा. अब भी अच्छा लगता है. साम्यवाद की भी बहुत सी बातें अच्छी लगतीं हैं. गोली और बंदूक की बात अच्छी नहीं लगती है.

२०११ की कुछ घटनाएँ गाँधीवाद की प्रासंगिकता पर उठते प्रश्नों की बाढ़ को रोक रहीं है. किन्तु कांग्रेस सरकार जो अपने को गाँधी का राजनैतिक उत्तराधिकारी मानती है, गांधी को अप्रासंगिक बनाने पर तुली हुई है. कांग्रेस सरकार को सत्य और अहिंसा से कोई सरोकार नहीं है. अगर सरकार अपने को बापू का उत्तराधिकारी मानती है तो उसे भ्रष्टाचार और काले धन का मोह छोडना पड़ेगा.  गाँधी जी भी वकील थे.  चिदंबरम, सिब्बल और सलमान खुर्शीद भी वकील ही हैं. कौन सच्चा वकील है ? राजनीति में सच्चे वकीलों की जरूरत हैं ,ऐसे वकीलों की जो न्याय की रक्षा कर सकें न कि धन कमाने के लिए वकालत करें.

अन्ना हजारे के आंदोलन ने भारत में गाँधी को पुनः प्रासंगिक बना दिया है. पूरे भारत में एक आंदोलन बिना किसी राजनैतिक दल के सक्रिय सहयोग के अहिंसा के साथ बारह दिनों तक चलता रहा. गांधी टोपी जो गाली बन गयी थी अन्ना और अहिंसा तथा निष्ठा के स्पर्श से पुनः पूज्य हो गयी.

गाँधी का पुनर्जन्म हो चुका है. बचपन में कुपोषण से लेकर महामारियों तक का भारी खतरा होता है. भारत में तो यह खतरा  कई गुना होता है. कांग्रेस से ही नए गाँधीवाद को भारी खतरा है. टोपी के साथ तिरंगा भी जनप्रिय हो गया है. भारत में राष्ट्रवाद भी बढ़ा है. आइये कामना करें कि सत्य और अहिंसा में हम सबसे आगे हों. समानता और बंधुता में आगे हों. समता और न्याय में आगे हों.

Tuesday, July 5, 2011

लोकपाल

नमस्कार!
हालचाल ठीक है न!

लोकपाल बिल के लिए सरकार ने सर्वदलीय बैठक किया.बैठक के प्रस्ताव से स्पष्ट हो गया कि दलीय लोकतंत्र में दलगत स्वार्थ प्रमुख है.

अन्ना हजारे की टीमने सभी दलों से मिलकर सशक्त लोकपाल की अपील की थी किन्तु निराशा हाथ लगाने पर अन्ना ने आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया. जन सहयोग देखकर सरकार ने एक समिति बना दी. सत्ता पक्ष ने लचर बिल से प्रारम्भ किया, उनकी सोच यह थी कि अन्ना  टीम की कुछ बातें मानकर एक बिल सामने ला दिया जायगा. और काम बन जायगा. अन्ना टीम के न मानने पर लोकपाल बिल के दो प्रारूप सामने आगये. सरकार को दलों का रुख देखकर लगा कि वेलोग भी वही सोच रहे हाँ जो कांग्रेस सोच रही है तो उन्हें भी बुला लिया जाय. और सर्वदलीय बैठक हो गयी.

स्पष्ट है कि सभी दलों को दोनों प्रारूपों का ज्ञान था. अन्ना हजारे ने सभी दलों से मिलकर सशक्त लोकपाल के प्रारूप को समझा भी दिया था किन्तु बैठक निर्णय अति असंतोषजनक था. जनता के सामने दल कुछ कहते हैं और बैठक में कुछ. अपनी छवि बनाने के लिए सभी सशक्त लोकपाल का नारा लगा रहे हैं किन्तु अवसर आने पर तकनीकी बहाने बना रहे हैं. यह सक्रिय राजनीति नहीं है. सभी जानते हैं कि आगामी सत्र में बिल स्थाई समिति और मंत्रिमंडल से होता हुआ संसद में आएगा.

यदि हमारे राजनैतिक दल सक्रिय होते तो बिल के प्रावधानों पर स्पष्ट रूप से बात करते और बिल को सशक्त बनाने के लिए अपनी स्पष्ट राय दिए होते. अब नेता गण अलग बयानों में तरह तरह की बात कर रहे हैं.

कमजोर लोकपाल बनाने के लिए संविधान की दुहाई दी जा रही है यदि किसी धारा के कारण संविधान संबंधी समस्या है तो सर्वोच्च न्यायालय से सलाह ले लेनी चाहिए. इस समय तक जो भी विचार आरहे हैं उससे लगता है कि संविधान का उलंघन नही होरहा है. लोगों में मतभेद है.

सर्वदलीय बैठक से यह भी लग रहा है कि दलों को कोई लोकपाल बिल पास कराने की कोई जल्दी नही है.


Friday, June 10, 2011

भारतीय जनतंत्र

नमस्कार!
मैं उस भारतीय जनतंत्र  का वासी हूँ जिस देश के राजतंत्र में भी जनता की आवाज का महत्व था. कहा जाता है कि एक राजा ने अपनी उस रानी का परित्याग कर दिया था जिसे वह प्राणों से भी अधिक चाहता था. उसी देश के एक कलाकार को देश छोड़कर जाना पड़ता है. उसी देश  की जनता को अपनी बात रखने के लिए बोलने की जगह भी नहीं मिलती है. उस देश के विधायक,सांसद अब कहने लगे हैं कि उनके सिवा बोलने वाला कौन है ? उस देश की जनता को अब मानवाधिकार के लिए लड़ना पड़ता है. उसी देश में जनता अपनी बात कहने के लिए जब जुटती है तो  उसे आधी रात को खदेड़ दिया जाता है. किन्तु जब वे जनता को जुटाते हैं तो उन्हें सर पर बिठाते हैं. जनता अब राजनैतिक दलों की गुलाम बन कर रह गयी है. जो  राजनेता के पक्ष में है उसे छोड़कर बाक़ी सब बेकार हैं .  

इस देश की सबसे बड़ी राजसत्ता नेहरू वंश के साथ है. नेहरू की समाजवाद तथा उनके सपनों का भी अंत हो चुका है. एक इमानदार राजीव मार डाले गए. अब नेहरू वंश की सोनिया जी वोट जुटाती हैं तथा कांग्रेसी राज करते हैं और भ्रष्टाचार करते हैं. इस वंश से सीख लेकर तमाम लोगों ने राजनैतिक दल बनाकर अपने को तथा अपनों को राजसिंहासन पर सुशोभित किया है.कुछ ऐसे राजनैतिक दल हैं जो व्यक्तिवादी हैं उनमें कुछ व्यक्ति ही दल हैं वे ही सिद्धांत हैं. वे ही सबकुछ हैं. सारी संगठन की गतिविधियाँ उनकी इशारों पे बनतीं बिगदतीं हैं. इनके दिखाने के दांत और खाने के दांत अलग अलग हैं . धीरे धीरे लोग इनके बारे में भी जानने लगे हैं. 

जब भी जनता कुछ जागरूक होने लगती है इनकी परेशानी बढ़ने लगती है. इन जननायकों की इक्छा रहती है कि पच्चीस वर्ष से जिदगी भर सत्तासीन बने रहें. कुछ पिछलग्गू कार्यकर्ता इनके साथ लगे रहें जो पोस्टिंग ट्रांसफर उद्योग में सहयोग करें तथा धनार्जन कास्रोत बने रहें.

अखबारों में भारत के भ्रष्टाचार की खबरें छपा करती हैं. दस प्रतिशत कमीशन कुछ नजराना कुछ शुकराना देना भारत के लोगों को भी भाता है अब जबराना चलने लगा है. इसी बीच स्वामी रामदेव घूम घूम कर जनता को जगाने लगे कि केवल बाहर गया काला धन आ जाय तो भारत का भाग्य बदल जाय. नौजवान पैसा देकर भी नौकरी नहीं पा रहे हैं पैसा डूब जा रहा है. नौकरी करने वाले अपने जीपीय्फ़ से क़र्ज़ भी घूस देकर पा रहे हैं ट्रांसफर तो बहुत पुराना घुसहा रोग है. इसी दौर में अन्ना हजारे एंड कम्पनी लोकपाल बिल संबंधी मांग लेकर कनात प्लेस पर बैठ जाते है. इंटरनेट का सहयोग लेते हैं और उनके समर्थकों की संख्या बढ़ने लगती है. सरकार उनकी बात मान लेती है. किन्तु बात मन में नहीं उतरती है. सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार मिटाना चाहती ही नहीं है. कुछ समय बाद  स्वामी रामदेव का अनशन शुरू होता है सर्कार उनकी बात भी मन लेती है किन्तु मन से नहीं चाहती. क्योंकि कांग्रेसियों की बातों में ही परस्पर मतभेद है. फिर जनतंत्र की धज्जियां उड़ा दी जाती हैं.

भ्रष्टाचार में आगे रहनेवाला यह जनतंत्र शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार के अवसर में काफी पिछड़ा हुआ है. जनतांत्रिक मूल्य तो तब आयेंगे जब कोई राजनैतिक दल वास्तव में जनतांत्रिक मूल्य को स्वीकार कर पायेगा. वैसे तो रामलीला के मैदान में जनतंत्र का मुह काला कर दिया गया है. भ्रष्टाचार और भ्रष्ट दोनों ही खुश हैं.





Monday, May 30, 2011

जनता का दायित्व

नमस्कार!

दैनिक समाचार पत्र "हिन्दुस्तान" ने दो टूक कहा है की जनता को सेवायें प्राप्त करने के लिए व्यय करना चाहिए. वास्तव में सरकार जो भी व्यय कर रही है जनता ही देतीहै  प्रत्यक्ष कर के रूप में अप्रत्यक्ष कर के रूप में. केन्द्रीय कर के रूप में प्रांतीय कर के रूप में और तमाम ढंग हैं कर वसूली के. तमाम तरह के कर देने  पर भी जनता को सुविधा देने की बात आती है तो तरह तरह के बहाने बनाए जाते हैं. कर के रूप में बटोरी गई धन राशि को बेदर्दी से बरबाद किया जा रहा है. एक बरबादी का उदाहरण कामनवेल्थ खेल भी है  जो हमारी गुलामी का ढिंढोरा पीटता है तथा राजतन्त्र का प्रचार करते है. 

कर उगाही का अधिकार मात्र केंद्र को होना चाहिए तथा  सभी नागरिक सेवा संस्थाओं को उसका  अंश मिलना चाहिए जिससे की हर नागरिक को एक समान सुविधा प्राप्त हो सके. आज की स्थिति में तमाम कर बिचौलिए खा जाते हैं. वैट के नाम जितना कर जनता की जेब से जाता है उसका कितना अंश सरकारी कोष में पहुंचता है इसका न कोई हिसाब है न चर्चा. निश्चय ही जनता का बहुत सारा पैसा जनता की जेब से कर के नाम पर ले लिया जाता है किन्तु वह सरकारी कोष में नहीं पहुचता है. इतना सारा धन कर के रूप में देने के बाद शिक्षा, चिकित्सा एवं सड़क जलनिकास पानी के नाम पर कार्यदायी संस्थाएं धन का रोना रोती हैं.  सभी जानते हैं  इन संस्थाओं में भ्रष्टाचार समाप्त हो जाय तो दशा कितनी सुधर सकती है. कुछ लोग कह सकते हैं  कि निःशुल्क सुविधा होने पर दुरुपयोग होगा. किन्तु सभी जानते हैं की बिजली पानी के मीटर कैसे चलते हैं और रुकते हैं. बकायेदारों में भी कौन होते हैं उसका खुलासा होप्ता ही रहता है. 

इन सस्थाओं के पास जब शिकायत की जाती है तो ये जनता के कर्तव्य की बात करने लगतीं हैं. किन्तु जनता को वह सब कुछ नही मिल पा रहा है जितना कर के रूप में दे रही है. कुछ लोगों को भ्रम है की कुछ ही करदाता हैं. किन्तु वास्तव में गर्भस्थ शिशु के लिए खरीदी जाने वाली दवा में से भी कर ले लिया जाता है. कर लेने के लिए तो सबके दायरे तय हैं किन्तु सुविधा के नाम पर सभी एक दूसरे को दिखाने लगते हैं. तब हम देश के नही किसी गाँव  या शहर के नागरिक हो जाते हैं.



Sunday, April 10, 2011

अण्णा का अनशन

नमस्कार!
अण्णा हजारे का अनशन समाप्त हो गया. अण्णा सरकार से जो आश्वासन चाहते थे मिल गया. अब परिचर्चा हो रही है. सफलता की असफलता की. अण्णा भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए एक सशक्त लोकपाल की मांग कर रहे  हैं. जिसके लिए विधेयक  बनाने की सशक्त समिति का गठन अण्णा की शर्त के अनुसार होना है. भारत के तमाम राजनैतिक दल इसकी चर्चा तो करते हैं किन्तु कानून ऐसा चाहते हैं जो उनकी मुट्ठी में रहे और उनका कभी भी कोई अहित नहो सके चाहे वे जो करते रहें. कोई सार्थक परिणाम न मिलाने पर अण्णा आमरण अनशन  पर बैठ जाते हैं. उन्हें इतना समर्थन मिलाने लगता है कि सरकार उअनकी शर्तें मान लेती है. वह प्रत्येक व्यक्ति हर्षित हो जाता है जिसने केवल मानसिक समर्थन मात्र दिया है.    

एक नारा लगता है " अभी तो ये अंगड़ाई है आगे बड़ी लड़ाई है." वास्तव में भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए ये अंगड़ाई ही है. इस सफलता के कारणों का विश्लेषण हो रहा है. काल, परिस्थिति, व्यक्ति, संसाधन सभी का ऐसा तालमेल हुआ कि यह लड़ाई सफल हो गई. वर्षा, शीत, और गरमी तीनो दृष्टि से उपयुक्त समय, देश विदेश में भ्रष्टाचार विरोधी और लोकतंत्र समर्थक वातावरण, देश में चुनाव की स्थिति. अण्णा जैसा व्यक्तित्व, अरविंद केजरीवाल, किरण वेदी स्वामी अग्निवेश जैसे सहयोगी. देश के प्रत्येक व्यक्ति के अंतःकरण को छूता हुआ मुद्दा. मीडिया को तो समर्थन करना करना ही था. समर्थन न करने वाले, आलोचना करने वाले इस समय संदेह के घेरे में हैं. अण्णा के अनशन से किसी को कोई तकलीफ नहीं हुई, उन्हों ने किसी का रास्ता नहीं रोका, सहयोग के लिए भी कोई भारी भूमिका नही बनाई. उनके किये गए कार्यों ने ही उनका प्रचार कर दिया. और वो हो गया. मोबाइल और इंटरनेट ने भी योगदान किया. 

हजारों लोग अनशन करते हैं.किन्तु सफल नही होते इस अनशन में ऐसा क्या था कि चार दिन में ही बात बन गयी. तमाम संभावनाएं इस समय सुर्ख़ियों में हैं. तमाम लोग खुश हैं. कुछ दुखी हैं. कुछ ईर्ष्या से मर रहें हैं. कुछ इसलिए दुखी हैं कि उनके आन्दोलन को ऎसी सफलता क्यों नहीं मिली. किसी को मीडिया की साजिश लगती है. गांधी से मतभेद रखने वाले दुखी हैं की गांधी के  खाते में एक और सफलता जुड़ गई.

चलिए एक आन्दोलन को एक कदम रखने का स्थान मिल गया है. इसके साथ जो हर्षित  हैं उनकी जिम्मेदारी और बढ़ गई है. उन्हें आग को जलाए रखने का अथक प्रयास करते रहना होगा. यह एक सांस्कृतिक आन्दोलन है. भारत में भ्रष्टाचार संस्कृति बन चुका है. जिसके  कारण हर व्यक्ति इससे प्रभावित है.कहावत कही जाती है बहती गंगा में हाथ धो लेना चाहिए.

   

Saturday, March 26, 2011

सड़क पर सहायता.

नमस्कार!

आज सबेरे सबेरे महाविद्यालय जा रहा था . सड़क के किनारे सहजन के पत्र विहीन पेंड को देख कर उसके छायाचित्र के लिए मुड़ गया. फोटो लेकर मुख्य मार्ग से ज्यौहीं आगे बढ़ा, साईकिल का चेन उतर गया. साईकिल से उतर कर एक किनारे होकर चेन को ठीक करने का प्रयास प्रारम्भ किया . एक छोटा लड़का जो स्कूल बस की प्रतीक्षा  कर रहा था धीरे से मेरे पास आकर मदद कर चेन ठीक कर दिया. चेन लगाने के बाद उसने अपने हाथ की और देखा हाथ में कालिख नहीं लग पाई थी. कई दिनों से मैं सोच रहा था कि चेन में ग्रीस लगवा लेना चाहिए किन्तु यह विचार परिणाम तक नहीं पहुँच पाया. आज मैं खुश हुआ कि चलो ग्रीस न लगवाने के कारण उस लड़के के हाथ में कालिख नही लग पाई. मैं उस लड़के को धन्यवाद देकर आगे बढ़ गया और सोचने लगा उस लड़के ने मेरी मदद की अपेक्षा के बिना भी मदद के लिए आगे क्यों आया? मैं तो सड़क के बाईं   पटरी से दाईं  ओर इसलिए चला गया था कि वहां  थोड़ी  अधिक जगह थी. उधर जाने से वह लड़का यह समझ बैठा कि मुझे उसकी मदद चाहिए, या मेरी उम्र को देखकर उसे लगा कि मदद कर देनी चाहिए. या उस लडके को मदद करना अच्छा लगता है. या अभी यह शहर अभी उतना मतलबी नहीं हो पाया है ओर उसकी संवेदनशीलता अभी बची हुई है.    

यह सब सोच ही रहा था कि मेरे मानस में संदीप मिश्र के दुर्घटना का विवरण घूमने लगा. तब भी मेरे मन में यह बात आई थी कि इसे मैं अपने ब्लॉग पर लिखूँगा. यद्यपि मेरा ब्लॉग अभी  पठनीय भी नहीं हुआ है न ही इसके पढ़ने वाले हैं.

संदीप मिश्रा अपनी मोटरसाइकिल से नैनी में अपने सहकर्मी के साथ कहीं जा रहे थे. बीच शहर में उनकी मोटर साइकिल  दुर्घटनाग्रस्त हो गई. वो ओर उनका सहकर्मी दोनों घायल होकर गिर गए. मिश्र के घुटने के ऊपर तथा नीचे की दोनों हड्डियां टूट चुकी थी वे उठाने में असमर्थ थे लेकिन होश में थे. उन्होंने सहायता की गुहार लगानी शुरू की किन्तु कोई भी उनकी ओर नहीं आ रहा था. उन्होंने मार्मिक रूप से भी सहायता की अपील शुरू की. कहना शुरू किया कि मेरे बच्चे अनाथ हो जायेंगे, मेरी जान बचा लीजिये भाई साहब, लेकिन कोई वाहन वाला मदद के लिए नहीं रुका.  किसी भी व्यक्ति ने सौ  नंबर पर भी फोन नहीं किया. जब वे निराश होने लगे तब जाकर एक पदयात्री इनकी मदद के लिए आया. उसने इन लोगों से कहा कि आप में से कोई मोटर साईकिल चला सकता है  इनके सहकर्मी के हाँ कहने पर उस व्यक्ति ने संदीप को टांगकर उठाया ओर मोटरसाइकिल पर बैठा कर पास के अस्पताल में पहुंचाया.

आखिर संदीप को सहायता क्यों नहीं मिल पा रही थी, शायद दुर्घटना और खून देखकर चाहते हुए भी कोई आगे नहीं आ पा रहा था. शायद सामने वाला सोचता होगा कि यदि रास्ते ही मर मरा गया तो पुलिस का चक्कर चल जाएगा. सामान्य व्यक्ति पुलिस से दूर ही रहना चाहता है. लोग तमाम किस्से बताने लगते हैं कि कब पुलिस ने सहयोग करने पर कितना चक्कर लगाना पड़ा. एक उदाहरण तो ऐसा भी आया जिसमें सहायक व्यक्ति पर क़त्ल  का इल्जाम लगा तथा लगभग बीस वर्षों के बाद मुक्ति मिल पाई. 

क्या हमारा सभ्य समाज पुलिस से भय मुक्त होकर सहायता करने में आगे बढ़ सकेगा?
   

Friday, March 25, 2011

महंगाई भत्ता पर सम्पादकीय

नमस्कार! 
कोई दैनिक अखबार किसी आम बात पर सम्पादकीय लिखे तो वह जरूर कोई ख़ास बात है.भारत सरकार के सरकारी कर्मचारियों को हर एक जुलाई और एक जनवरी को पिछले छः माह में बढे थोक सूचकांक के आधार पर महंगाई भत्ते की एक किश्त देय हो जाती है. सरकारी व्यवसायिक प्रतिष्ठानों और सरकारी बैंकों के कर्मचारियों को यह राहत हर तीसरे महीने ही प्राप्त हो जाती है. प्रत्येक दस वर्षों पर वेतन आयोग गठित होता है तथा प्रायः दस वर्षों में बढी हुई मंहगाई के आधार पर वेतन मान निर्धारित होते हैं. 

यह प्रक्रिया सरकार को करनी होती है किन्तु सरकार इसे नियोजित ढंग से कभी नहीं करती तथा यह एक वस्तुनिष्ठ प्रक्रिया न होकर एक राजनैतिक प्रक्रिया बन गई है तथा महंगाई को बढाने में खूब योगदान करती है. प्रांतीय सरकारे तथा मीडिया इसे ऎसी घटना के रूप में प्रकाशित करते हैं जैसे कोई नई घटना हो रही है. सरकार्रें पिछले आयोग के सुझावों को जबतक लागू कर पाती है तब तक नए आयोग के गठन का समय आ जाता है. कर्मचारी संघों की मांग शरू हो जाती तब आयोग  गठित होता है आयोग की सिफारिशें आते आते इतना देर हो जाता है की बकाया वेतन भुगतान की नौबत आ जाती है. इस प्रकार एरियर  भुगतान और नई आर्थिक समस्या निरंतर जारी रहती है.

अगले वेतनं आयोग के सुझाव एक जनवरी २०१६ से लागू हो जाने चाहिए. यदि हमारी सरकार २०१४ में ही सातवाँ आयोग बना दे तथा अक्टूबर २०१५ तक सुझाव आ जाय तो एक जनवरी २०१६ से नए वेतन मान में भुगतान होने लगेगा तब  किसी एरियन के भुगतान की समस्या भी नहीं आयेगी. इसी प्रकार सरकारें प्रत्येक १५जनवरी तथा १५ जुलाई को  महंगाई  भत्ते की घोषणा कर दे तो वेतन के एरियर की समस्या समाप्त हो जायगी. 

ऎसी स्थिति में सम्पादक महोदय की टिप्पणी असंगत प्रतीत होती है. अब दूसरी बात पर आते हैं. कर्मचारियों के काम काज के सुधार की बात. सबसे पहले हमारे माननीय सांसद जो सरकार से वेतन और भत्ता तो पाते हैं किन्तु संसद में उनकी उपस्थिति पर कुछ लिखना आवश्यक नहीं हैं सभी जानते हैं. यही हाल माननीय मंत्रियों का है. ये लोग जब तक अपनी कार्य संस्कृति में सुधार नहीं लायेगे तबतक कर्मचारी कैसे सुधरेंगे. http://epaper.hindustandainik.com/PUBLICATIONS/HT/HT/2011/03/23/ArticleHtmls/I%C2%B8F%C3%8A%C2%A8FFdS%C2%B9F%C3%BB%C3%94-I%C3%BB-SFW%C2%B0F-23032011012001.shtml?Mode=1  

Wednesday, March 9, 2011

आरक्षण

नमस्कार!

आरक्षण आन्दोलन चल रहा है. नौकरियों में जातिगत आरक्षण. विधायिका में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए पहले से ही आरक्षण उपलब्ध है. शिक्षा में भी आरक्षण उपलब्ध है.पंचायती राज में भी आरक्षण उपलब्ध है. कुछ दिनों पहले राजस्थान और अब उत्तर प्रदेश और हरियाणा इसकी चपेट में है. 

एक ओर हम जाति को मनुवादी/ब्राह्मणवादी व्यवस्था की देन कहते हैं. दूसरी ओर जातिवाद चलाकर मत प्राप्त करने का उपक्रम करते हैं. जाति आधारित आरक्षण के लिए जाति इकाई है. ऎसी स्थिति में हरएक जाति की औसत आय की वास्तविक गणना जरूरी है. जिसकी जानकारी करना लगभग असंभव है. जो लोग नौकरी करते हैं उनकी आय आप जान सकते हैं. लेकिन जिन नौकरिओं में ऊपर की आमदनी है उसे कैसे जानेंगे. जिनके पास जमीन है उसे आप जन सकते हैं. इसके बाद तमाम व्यवसाय हैं जिनकी आमदनी जानना आज के दिन असंभव है.  ऎसी स्थिति में उपलब्ध सूचना को सही मानकर काम चलाना मजबूरी है. १९३५ के बाद जनगणना में जाति का उल्लेख नही हो रहा है किन्तु जाति आधार पर आरक्षण दिया जा रहा है. मतदाता सूची में जाति का उल्लेख नहीं किया जा रहा है. 

जातिगत आरक्षण के लिए जातिवार सदस्यों की गणना और उनकी आर्थिक स्थिति की जानकारी अति आवश्यक है. उसके बाद एक स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ मानदंड की घोषणा करके प्रत्येक जाति की स्थिति को सार्वजनिक करते हुए आरक्षण होना चाहिए जिससे प्रायः आरक्षण की मांग से बचा जा सके. हाईस्कूल और उसके समकक्ष पाठ्यक्रमों में इस पूरी नीति का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए जिससे हर छात्र इस सम्बन्ध में जानकारी पा सके. हर एक जाति के समस्त लोगों केलिए आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना चाहिए. इसके लिए हमें पूरे आरक्षण के कोटा को पुनः निर्धारित करना पडेगा. 

तमाम अलग अलग वर्गों के लिए अलग अलग आयोग गठित किये गए. लेकिन आवश्यकता एक ऐसे आयोग की है जो यह बता सके कि  हमकों सा कदम उठाये जिससे समता की स्थिति आ सके. कुछ वर्षों पूर्व तक उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु आरक्षित वर्ग से आवेदन ही नहीं प्राप्त होते थे. जो लोग आज की तिथि में विभिन्न सेवा संस्थाओं में आरक्षित वर्ग की संख्या  कम दिखाई दे रही है उन्हें यह भी देखना चाहिए कि आवेदक कितने थे. 

कुछ वर्षों पूर्व विधि की पढाई करने वाली छात्राओं की अत्यंत कमी थी आज स्थिति बदल गयी है. यह मैं उदाहरण के लिए कह रहा हूँ. आज की तिथि में छोटे कस्बों की छात्राए भी उन तमाम क्षेत्रों में पढाई  कर रहीं हैं जिनमे उनकी संख्या नगण्य थी . इसी प्रकार आरक्षित वर्ग के तमाम छात्र जो वास्तव में पढ़ना और आगे बढ़ना चाहते हैं पढ़ रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं. 

भारत में आरक्षण से अधिक आधिक आवश्यक है समुचित शिक्षा की व्यवस्था. अनिवार्य शिक्षा अधिनियम  ठीक से लागू होना चाहिए और जनसँख्या के अनुपात में व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए. जनसंख्या के अनुपात में हर सेवायें प्रदान करनी की व्यवस्था करने पर इस तरह की समस्या अपने आप दूर हो जायगी.  
नमस्कार!

हिन्दी बदलेगी तो चलेगी

नमस्कार!

धीरे धीरे हिन्दी आगे बढ़ रही है. हिन्दी भाषा के साथ तकनीकी संकट खड़ा है. साहित्य में कोई संकट नहीं है बस संकट है तो व्यक्तित्व और अहंकार  का. हिन्दी भाषा और साहित्य को छोड़कर विज्ञान अथवा मानविकी या सामाजिक विज्ञान की उच्चशिक्षा हिंदी में प्राप्त करना अभी भी कठिन है. उच्च स्तरीय सन्दर्भ ग्रंथों का अभाव है. जो भी उच्च स्तरीय लेखक हैं सभी अंग्रेजी पसंद करते हैं क्योंकि शोध सन्दर्भ अंग्रेजी में होने के कारण अंग्रेजी में लिखना सरल लगता है तथा उसे अधिक पाठक मिलते हैं. 

हिन्दी के अखबारों की संख्या और प्रतियां दोनों में बृद्धि होरही है जब  कि दूरदर्शन का प्रवेश  गाँवों  तक हो चुका है. बहुत सारी पत्रिकाएं और उपन्यास लिखे जा रहे हैं और बिक रहें हैं. हिन्दी के जाने माने आधुनिक साहित्यकारों की रचनाएँ सस्ते कागज़ पर अच्छी छपाई में अभी भी अनुपलब्ध हैं. जो उपलब्ध हैं वे पढ़े जा रहे हैं. क्या यह स्थिति आयेगी कि हम कह सकेंगे कि अपनी हिन्दी सुधारनी है तो आपको "अमुक " अखबार को नियमित पढ़ना चाहिए. 

हिन्दी भाषी क्षेत्रों के विद्यार्थी वर्तनी दोष बाहुल्य हिन्दी लिखते हैं. हिन्दी से बिंदी गायब है. ऐसे में क्या क्या बदलना है. क्या क्या बदल जायगा कुछ कहा नहीं जासकता है. संवाद तो हो जा रहा है किन्तु उस संवाद में हम मर्म तक पहुँच पा रहे हैं या नहीं कहा नहीं जा सकता. इसलिए समरूपता जरूरी है अर्थात व्याकरण पर ध्यान रखना चाहिए. सभी समाचार पत्र हिंदी के सुधार हेतु भी थोड़ा स्थान देना शुरू करें तो हिन्दी के सरलीकरण और हिन्दी के विकास में बहुत सहयोग मिलेगा. और अच्छी हिन्दी का विकास होगा. 

इस समय हिंगलिश का बोलबाला है. हिन्दी समाचार वाचक तथा दूरदर्शन के समाचार प्रसारक और संवाददाता हिंगलिश के प्रयोग पर पूरा जोर दे रहे हैं. वे लोग जिस प्रकार की हिन्दी चाहेंगे, हिन्दी उधर जाने को मजबूर है. विज्ञापनों में हिंगलिश का प्रयोग धुंआधार हो रहा है उनकी प्राथिमिक उद्देश्य अपने उत्पाद को बेंचना है, हिन्दी अगर बिगड़े तो बिगड़े. हिन्दी फिल्म और दूरदर्शन के प्रसारणों में हिन्दी को बिगाड़ने का काम खूब तेजी से हो रहा है आंचलिक बोलियों का तड़का लगाया जा रहा है. अधिक तड़के वाली दाल नियमित खाने से  स्वास्थ्य बिगड़ ही जाता है, हिन्दी की हालत ऎसी ही हो गयी है. 

व्यापार जगत को अंग्रेजी में नाम रखने का चस्का है. पहले हिन्दी फिल्मों में कलाकार नामावली अंग्रेजी में ही होती थी धीरे धीरे हिंदी का प्रचालन हुआ अब भी हिन्दी भाषी क्षेत्रो में भी अंग्रेजी के पोस्टर चिपकाये जाते हैं. उपभोक्ता सामग्रियों के नाम बड़े बड़े अंग्रेजी के अक्षरों में लिखे जाते हैं. उन्हें हिन्दी नहीं भाती है. एलोपैथी अंग्रेजी और होमियोपैथी दवा के डाक्टर /चिकित्सक अंग्रेजी में ही अपना नुस्खा लिखते हैं जिसे पढ़ना अति कठिन होता है. अब कुछ कम्पनियां हिंदी के छोटे छोटे अक्षरों में हिंदी में नाम लिख रहीं हैं. चिकित्सक और दवा निर्माता वास्तव में जनता को दवा निरक्षर रखना चाहते हैं. आप यदी केवल हिन्दी जानते हैं तो इस क्षेत्र में निरक्षर ही हैं . यहाँ हिन्दी बदलेगी या भारत को बदलना पडेगा. 

जब टंकण यन्त्र आया तो हिन्दी के अनुसार उसे अनुकूलित करने का जो भी प्रयास हुआ. वह हिन्दी के अधिक यन्त्र के साथ अनुकूलित हुआ. किसी तरह से धीरे धीरे टंकण यन्त्र चला तब तक संगणक जी अर्थात कंप्यूटर महाराज का आगमन हुआ,  कहते हैं की इस क्षेत्र में भारत सबसे आगे है किन्तु क्या अभी तक  हिन्दी में किसी कंप्यूटर  भाषा का विकास हुआ है शायद नहीं. अभी इस आलेख को मैं गूगल ट्रांसलिटरेशन की कृपा से लिख रहा हूँ. इसमें कितनी बाधाएं हैं सभी उपयोगकर्ता जानते हैं. रेमिंगटन को नेट स्वीकार नहीं करता है. इनस्क्रिप्ट नाम तो  टेढा है ही काम भी टेढ़ा है. अगर आप बिलकुल अंग्रेजी नही जानते तो शायद कंप्यूटर का उपयोग नहीं कर सकते हैं. इसलिए थोड़ी सी अंग्रेजी पढ़ा करें. 

   

Tuesday, March 8, 2011

विश्व महिला दिवस

विश्व महिला दिवस
नमस्कार!
आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है.इसे विश्व महिला दिवस क्यों नहीं कहते हैं? इसकी राजनीति क्या है? विश्व की सभी महिलाओं को सामान अधिकार  मिले समान  प्रतिष्ठा मिले. इसके लिए जो भी संघर्ष कर रहे हैं उन सभी को प्रणाम. भारत के पंचायती राज की व्यवस्था में आरक्षण के सहारे ही सही वे आगे आरहीं हैं . यही राजनैतिक दल अपने संगठन और विधायिका में आरक्षण देने को तैयार नहीं हैं. यहाँ तक की वामपंथी दलों की कार्यकारिणी में में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व आधा नही है. उस दल में भी नही है जो  कहते हैं की जहां नारियों की पूजा की जाती है वहां देवता निवास करते हैं. उन दलों में भी नही है जो नारी को दलित मानते हैं.

क्रांतिकारी मीडिया के विज्ञापनों पर कलम वाली तलवार वाले भी कुछ नहीं कहते हैं. माइक बम  वाले भी कुछ नही कहते हैं. मीडिया के सहारे नारी को जिस फैशन की अंधी गली में  धकेलने की कोशिश होरही है. महिलाएं उसे समझें आज के दिन यही कामना है.

कलाके हर विधा के लोग महिलाओं की प्रतिष्ठा बढाने का ही प्रयास करेंगे. आशा की जा सकती है. नेट संसार भी समान अधिकार और प्रतिष्ठा के लिए सतत सचेष्ट रहेगा. साभिवादन.   

Sunday, January 16, 2011

आक्रामकता

आक्रामकता
नमस्कार!
अपने शशिशेखर जी हिन्दुस्तान वाले सम्पादक जी गुस्से पर गुस्सा हैं या चिंतित हैं. गुस्से के कारण लोग अब आक्रामक  होते जा रहे हैं. यह आक्रामकता पूरे विश्व में देखी जा रही है. लोग पहले भी इसपर चिंता व्यक्त कर चुके हैं ,  इसके कारण और निवारण पर भी विचार कर चुके हैं.  जब पत्रकार कलम छोड़कर जूता उठाले तो क्या कहा जाएगा. कलम की ताकत ख़तम हो गयी या जनतंत्र में कलम कीताकत कमजोर हो गयी है. या हमारे अन्दर कुछ बात है जिसके कारण हम आक्रामक हो जाते हैं. 

हमारी संस्कृति हमें व्यवहार करने के तरीके सिखाती है और यदि हम अधिक आक्रामक हो रहे हैं तो हमें अपने सांस्कृतिक परिवेश की ओर झाँक कर देखना चाहिए.  जिन्होंने झांका है वे पाए हैं कि विभिन्न संस्कृतियों में आक्रामक व्यवहार की मात्रा अलग अलग देखने को मिलती है.  

आक्रामकता देखने और अनुकरण करने से बढ़ती है. सिनेमा, टीवी, अखबार और मंचीय कार्यक्रम भी आक्रामकता को बढाते हैं अतः मीडिया के लोंगों को भी सोचना होगा कि हम जो दिखा रहे हैं वह कैसे दिखाये कि सूचना तो दे दें किन्तु उसके निषेधात्मक प्रभाव को रोक लें. हमारे माननीय जिस तरह का व्यवहार कर रहे हैं उससे क्या प्रभाव पड़ेगा स्पष्ट है. 

नशा ,  पीड़ा कष्ट भी हमारे आक्रामकता को बढाते हैं. किन्तु इन सबसे अधिक प्रभावशाली कारक है निराशा या कुंठा.   दूरदर्शन और विज्ञापन के साजो सामान लोगों की आवश्यकता बढाते जा रहे हैं प्रकारांतर से कुंठा ही बढ़ा रहे हैं. 

भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा से नौकरियाँ बिक रही हैं, हर काम में सुविधा शुल्क लग रहा है. बेरोजगार नौजवान सडकों पर हैं. असमानता बढ़ती जा रही है. रोज चौराहों पर घूस, चोरबाजारी, अन्याय और भ्रष्टाचार की चर्चा हो रही है. कौन सरकारी नौकरी कितने में बिकी, कौन काम कितने में हुआ, किस अधिकारी का तबादला कितने पैसे पर हुआ. ये पब्लिक तो सब जानती है पर हाकिम न जानने का बहाना कर रहे हैं. 

यह पूरा आक्रोश किस व्यक्ति के व्यवहार से प्रकट हो जाय कहा नहीं जा सकता. 

Sunday, January 9, 2011

सम्पादक के नाम पत्र

सम्पादक के नाम पत्र 
नमस्कार!
अतीत की यादें. चवन्नी का जाना. याद आता है एक गाना- "नए छः पैसों का पुराना एक आना बाबा बदला ज़माना". ज़माना रोज आगे बढ़ता है हम बढ़े न बढ़े. आपका  अखबार "हिन्दुस्तान" अब देवरिया सस्करण भी छापने लगा है. तीन और साढ़े तीन  रूपये वाले अखबार भी खूब बिक रहे है. शिक्षित लोगों की संख्या बढ़ रही है अखबारों की खपत भी बढ़ रही है गलाकाटू प्रतिस्पर्धा  भी बढ़ रही है. नई नई बातें हो रहीं हैं.

खाद्य सामग्रियों का मूल्य बढ़ रहा है किन्तु किसान को लाभ नहीं मिल रहा है. वैसे हमारे प्रधानमंत्री जी किसानों पर ध्यान कम ही रखते हैं.पूरा कृषि क्षेत्र उपेक्षित है. कृषि मंत्री जी क्रिकेट वाले हैं. वेतन आयोग देर से गठित होते हैं. उनकी अनुशंषा देर से लागू होती है. एक बार बढ़ा वेतन मिलता है फिर बकाया धन राशि. महगाई बढाने का बहाना मिल जाता है. केंद्र का महगाई भत्ता बढ़ता है फिर प्रांत का, महगाई बढाने का फिर बहाना. केंद्र और प्रान्त सरकारें हर हाल में एक साथ ही वेतन बढाने घोषणा करें और लागू करें तो महगाई बढाने के अवसर कम हो जायेंगे.

महगांयी डायन  है तो भ्रष्टाचार पिशाच. दोनों साथ मिलकर जनता का खून चूस रहे हैं. सब अपने अपने भ्रष्टाचार में लगे हैं. जब मेंड़ ही खेत खाने लगे तो खेत का क्या होगा. जिनसे अपेक्षा है कि भ्रष्टाचार रोकेंगे वे उसमें सम्मिलित हैं. प्रतियोगिता चल रही है कि कौन बड़ा. शायद कुछ हो जाए बिहार जैसा. 

अखबार के पन्ने राजनीति, और खेल पर जितना स्थान देते हैं उतना शिक्षा पर नहीं. विज्ञान कांग्रेस  की कितनी खबर छपी? शोध की सूचना मात्र शोधार्थी की सूचना रहती है. सिब्बल साहब शोध के लिए चिंतित हैं. शोध कर चुके नेट पास हजार, पांच  सौ, दो हजार और पांच हजार रूपये महीने पर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाते हैं. उ. प्र. में सात विषयों के साथ महाविद्यालय खुल जाते हैं. सरकार के खर्च का हिसाब तो सिब्बल साहब ने ही दे दिया है. 

पचौरी साहब को भी  प्याज सता रही है. सरकारें बिगाड़ने  बनाने वाली प्याज का रुतबा साहित्य में भी बढ़ गया है. 

आपके "हिन्दुस्तान " में सम्पादक के नाम पत्र ईमेल से क्यों नही लिए जाते यदि हाँ तो पता क्यों नहीं छपता. 

देवरिया संसकरण में तीसरे पेज पर मौसम का साप्ताहिक चित्र रोज गलत छपता है. 
आशा है इस लोकल अखबार में ग्लोबल खबरें मिलती रहेंगी.  

सादर 
जयप्रकाश पाठक 
देवरिया.

Saturday, January 1, 2011

PUSHP

Posted by Picasa

स्वागत-2011

स्वागत-२०११
नमस्कार!

आज का सूर्योदय कुछ ख़ास था. रात को बदली छाई रही, नव वर्ष २०११ का  स्वागत  हल्की फुहार के साथ हुआ. धीरे धीरे भारत में भी  यह त्यौहार  का रूप लेता  जा रहा है. बधाइयां, मिठाइयां, पटाखे, नाच, गान,धूम धड़ाका चल रहा है. बूढ़े, जवान, बच्चे सभी एक दूसरे को बधाई दे रहे हैं. हो गया त्यौहार. कैलेण्डर बदल गए. डायरियां बदल गई. उपहार दिए लिए जा रहे हैं. नये साल के नए सपने नए प्रस्ताव नई नई बातें. साल कुछ दे जाता है कुछ ले जाता है.

कोई भी त्यौहार एक नया उत्साह दे जाता है, यह त्यौहार जाड़े के साथ आता है. जाड़े में हिदुओं के कई त्यौहार आते हैं जो नहान के त्यौहार होते हैं. यही त्यौहार जिसमें भारतीयों को अपने जैसे काम करने में खूब मजा आता है. मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और तमाम श्रद्धास्थल लोगों से भर जा रहे हैं.

स्वागत २०११