नमस्कार!
हालचाल ठीक है ?
देश का हाल और कांग्रेस की चाल ठीक नहीं है. एफडीआई की चर्चा बड़े जोरों पर है. आज भारत बंद है, कटोरे में पैसा दिखाकर आढतिया और खुदरा वाले भिखारी बन जाने के डर में हैं. कांग्रेस को छोड़कर सभी राजनैतिक दल इसके विरोध में हैं. टीवी और अखबार सभी इसपर परिचर्चा कर रहे हैं. कुछ इसे गुलामी का आरम्भ मान रहें हैं तो कुछ भारत के स्वर्णिम भविष्य का आरम्भ.
लोकतान्त्रिक भारत की अलोकतांत्रिक पार्टी कांग्रस ने अपने सांसदों और और सरकार के सहयोगी दलों बिना विचार विमर्श किये संसद के सत्र काल में निर्णय लेती है कि भारत में खुदरा व्यापार में भाग लेने हेतु विदेशी कंपनियां ५१% तक प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश कर सकती हैं. इससे भारत में खाद्य सामग्री की सुरक्षा होगी, सामान सस्ता मिलेगा और किसान लाभान्वित होंगे. कांग्रेस के इस कथन से कांग्रेसी भी सहमत नहीं हैं. किन्तु वे कुछ बोल नहीं सकते. सांसद और विधायक अपने दल के मुखिया और खास लोगों की राय को गलत होने पर भी मानने को को बाध्य हैं क्योंकि किसी भी राज नैतिक दल में आन्तारिक लोकतंत्र है ही नहीं. दूसरी ओर संसद संचालन के तमाम नियम ऐसे हैं जिन्हें आज के समय में लोकतांत्रिक कत्तई नहीं कहा जा सकता है.
कोई भी विदेशी धन कमाने के लिए ही धन लगायेगा. विदेशी धन कमाकर विदेश ही ले जाएगा. ४९% वाले भारतीय भी कमायेगें. व्यापार कमाने के लिए किया जाता है. किन्तु यहाँ तो व्यापार लूटने के लिए किया जा रहा है. जो राजनैतिक दल आज इसके लिए संसद नहीं चलने दे रहे हैं. वे कभी उर्वरक की अनुपलब्धता पर संसद ठप नही कर सकते. कुछ और प्रश्न हैं-
१. क्या भारत में खाद्य पदार्थ के संरक्षण की व्यवस्था अपने स्तर पर नहीं की जा सकती है ? आधुनिक गोदामों और शीत गृहों कि व्यवस्था क्यों नहीं हो पा रही हैं?
२. क्या अमूल जैसे सहकारी विपणन केंद्र नहीं विकसित किये जा सकते हैं ?
३. यदि यह किसानों के लिए हितकारी योजना है तो इसे विस्तृत रूप से समझाकर पूरे देश में ही क्यों नहीं लागू किया जा रहा है?
४. यदि भारत को विदेशी मुद्रा के लिए ही यह कार्य मजबूरी में करना पड़ रहा है तो भी जनता को जानने का हक है.
५. यदि किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि के चलते ऐसा करना मजबूरी है तो भी जनता को जानने का हक है.
६. यदि एफडीआई मजबूरी ही है तो ४९% की ही अनुमति दी जाय.
७ . जब आधे से अधिक सांसद चाहते हैंकि एफडीआई न आवे तो इसे क्यों नहीं वापस कर लिया जा रहा है. अब तो साफ़ लग रहा है कि इसे लागू कराने के लिए सरकार अलोकतांत्रिक विधाओं का उपयोग करने जा रही है.
अब समय आ गया है कि भारत में थोक और खुदरा व्यापार की नीति स्पष्ट रूप से बन जाय जिससे सभी पक्षों का न्यायपूर्ण हित हो सके. इसके लिए सभी दलों को अपने ड्राफ्ट बिल तैयार कर लेने चाहिए जिससे सभी अपनी बात स्पष्ट रूप से कह सकें.
जबसे माल या सुपर बाजार खुलने लगे हैं भारत के उच्च मध्यवर्ग के लोग माल को प्रतिष्ठा का विषय भी मान लिए हैं अतः इन्हें खुलना ही है. इसलिए देश और प्रदेश के राजनेता शीघ्रातिशीघ्र सम्बंधित कानूनों में भी संशोधन करें जिससे जनता का लाभ हो सके. अब यह जरूरी हो गया है कि प्रत्येक कानून का पुनरीक्षण दस वर्षों पर अवश्य ही हो जाय. आवश्यकता होने पर पहले भी संशोधन किया जाय. संसद और विधान सभाओं के सत्र निर्धारित समय तक अवश्य चलाये जाय यदि किसी भी कारण से सत्र में बाधा आती है तो सत्रकाल स्वतः आगे बढ़ जाय.
हालचाल ठीक है ?
देश का हाल और कांग्रेस की चाल ठीक नहीं है. एफडीआई की चर्चा बड़े जोरों पर है. आज भारत बंद है, कटोरे में पैसा दिखाकर आढतिया और खुदरा वाले भिखारी बन जाने के डर में हैं. कांग्रेस को छोड़कर सभी राजनैतिक दल इसके विरोध में हैं. टीवी और अखबार सभी इसपर परिचर्चा कर रहे हैं. कुछ इसे गुलामी का आरम्भ मान रहें हैं तो कुछ भारत के स्वर्णिम भविष्य का आरम्भ.
लोकतान्त्रिक भारत की अलोकतांत्रिक पार्टी कांग्रस ने अपने सांसदों और और सरकार के सहयोगी दलों बिना विचार विमर्श किये संसद के सत्र काल में निर्णय लेती है कि भारत में खुदरा व्यापार में भाग लेने हेतु विदेशी कंपनियां ५१% तक प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश कर सकती हैं. इससे भारत में खाद्य सामग्री की सुरक्षा होगी, सामान सस्ता मिलेगा और किसान लाभान्वित होंगे. कांग्रेस के इस कथन से कांग्रेसी भी सहमत नहीं हैं. किन्तु वे कुछ बोल नहीं सकते. सांसद और विधायक अपने दल के मुखिया और खास लोगों की राय को गलत होने पर भी मानने को को बाध्य हैं क्योंकि किसी भी राज नैतिक दल में आन्तारिक लोकतंत्र है ही नहीं. दूसरी ओर संसद संचालन के तमाम नियम ऐसे हैं जिन्हें आज के समय में लोकतांत्रिक कत्तई नहीं कहा जा सकता है.
कोई भी विदेशी धन कमाने के लिए ही धन लगायेगा. विदेशी धन कमाकर विदेश ही ले जाएगा. ४९% वाले भारतीय भी कमायेगें. व्यापार कमाने के लिए किया जाता है. किन्तु यहाँ तो व्यापार लूटने के लिए किया जा रहा है. जो राजनैतिक दल आज इसके लिए संसद नहीं चलने दे रहे हैं. वे कभी उर्वरक की अनुपलब्धता पर संसद ठप नही कर सकते. कुछ और प्रश्न हैं-
१. क्या भारत में खाद्य पदार्थ के संरक्षण की व्यवस्था अपने स्तर पर नहीं की जा सकती है ? आधुनिक गोदामों और शीत गृहों कि व्यवस्था क्यों नहीं हो पा रही हैं?
२. क्या अमूल जैसे सहकारी विपणन केंद्र नहीं विकसित किये जा सकते हैं ?
३. यदि यह किसानों के लिए हितकारी योजना है तो इसे विस्तृत रूप से समझाकर पूरे देश में ही क्यों नहीं लागू किया जा रहा है?
४. यदि भारत को विदेशी मुद्रा के लिए ही यह कार्य मजबूरी में करना पड़ रहा है तो भी जनता को जानने का हक है.
५. यदि किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि के चलते ऐसा करना मजबूरी है तो भी जनता को जानने का हक है.
६. यदि एफडीआई मजबूरी ही है तो ४९% की ही अनुमति दी जाय.
७ . जब आधे से अधिक सांसद चाहते हैंकि एफडीआई न आवे तो इसे क्यों नहीं वापस कर लिया जा रहा है. अब तो साफ़ लग रहा है कि इसे लागू कराने के लिए सरकार अलोकतांत्रिक विधाओं का उपयोग करने जा रही है.
अब समय आ गया है कि भारत में थोक और खुदरा व्यापार की नीति स्पष्ट रूप से बन जाय जिससे सभी पक्षों का न्यायपूर्ण हित हो सके. इसके लिए सभी दलों को अपने ड्राफ्ट बिल तैयार कर लेने चाहिए जिससे सभी अपनी बात स्पष्ट रूप से कह सकें.
जबसे माल या सुपर बाजार खुलने लगे हैं भारत के उच्च मध्यवर्ग के लोग माल को प्रतिष्ठा का विषय भी मान लिए हैं अतः इन्हें खुलना ही है. इसलिए देश और प्रदेश के राजनेता शीघ्रातिशीघ्र सम्बंधित कानूनों में भी संशोधन करें जिससे जनता का लाभ हो सके. अब यह जरूरी हो गया है कि प्रत्येक कानून का पुनरीक्षण दस वर्षों पर अवश्य ही हो जाय. आवश्यकता होने पर पहले भी संशोधन किया जाय. संसद और विधान सभाओं के सत्र निर्धारित समय तक अवश्य चलाये जाय यदि किसी भी कारण से सत्र में बाधा आती है तो सत्रकाल स्वतः आगे बढ़ जाय.
