Sunday, December 29, 2013

वर्ग और संघर्ष

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
आआप की सरकार के शपथग्रहण कालीन  स्वतःस्फूर्त भीड के चलते आज फेसबुक पर साम्यवादी, वामपंथी, बहुजनवादी, अम्बेडकरवादी,कांग्रेसी, समाजवादी और भाजपाई मित्र अपने अपने विचार की कसौटी पर कस रहे हैं. अपने से सहानुभूति रखनेवालों को सचेत कर रहे हैं.
भारत में अधिकाधिक लोग किसी दल के सदस्य नहीं हैं, उन्हें एक अच्छी साफसुथरी सरकार चाहिये. मैं भी उन्हीं लोगों में से हूं. मुझे प्रतियोगिता की अपेक्षा  सहकारिता अच्छी लगती है, व्यक्तिनिष्ठता की अपेक्षा वस्तुनिष्ठता अच्छी लगती है. गांधी व  विनोबा का त्याग और समाजसेवा आकर्षित करता है.
मुझे अम्बेडकर अच्छे तो लगते हैं लेकिन एकांगी लगते हैं. मुझे मार्क्स भी आकर्षित करते हैं किन्तु बन्दूक की गोली अच्छी नहीं लगती. इस प्रकार राजनैतिक दृष्टि से एक भ्रमित व्यक्ति. इस तरह का भ्रम केवल मेरा नहीं है. बहुतों का है. यही सोचकर मैं अपनी बात आपसभी के समक्ष रख रहा हूं कि मुझे अपनेभ्रम को दूर करने के लिये कुछ सुझाव प्राप्त होगा.
जनता को दो आर्थिक वर्गों में बांटकर उनमें संघर्ष की बात की जाती है. क्या आर्थिक आधार पर दो भाग का विभाजन हो  तो सकता है आप कह सकते हैं कि भूस्वामी और भूमिहीन. क्या सभी भूस्वामी समान भूमि रखते हैं ? नहीं. फुट्पाथ से लेकर महल तक फैली हुई आवासीय सम्पत्ति को क्या दो ही वर्ग में बांटा जायेगा?
उदाहरण दिया जाता है कि रात और दिन. सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन और बाकी रात, कितु प्रकाश की मात्रा और गर्मी एक सातत्य पर मिलेगा. शून्य आय से लेकर सर्वाधिक आय के बीच एक सातत्य है.
पूंजीवाद में कहा जाता है कि मजदूरी मारकर ही धन कमाया जाता है. हर उत्पाद का उपभोक्ता भी तो ठगा जाता है. पूंजीवाद प्राथमिक उत्पादक, मजदूर, धन लगाने वाले शेयरहोल्डर और उपभोक्ता सभी शोषित की श्रेणी में हैं.
देश की सभी सम्पदा पर सरकार का पूर्ण स्वामित्व हो जाय. उत्पादन के साधन सरकार के पास हो जाय यह सब ठीक लगता है किन्तु सत्ता एक व्यक्ति में सीमित हो जाय तो ठीक नहीं लगता. कोई भी दल या व्यक्ति सर्वोच्च हो जाने पर नियंत्रण से बाहर हो जाता है.
भारत के संसद्वादी वामपंथी दल और अन्य वामपंथी दलों को वामपंथी विचारक एक साथ लाने में विफल हैं. सर्वोच्च आसन पर जाने और उसपर बने रहने की अदम्य लालसा सबमें एक समान दिखाई दे रही है. यही सबसे बडी बाधा है.
नमस्कार.

Monday, October 14, 2013

भारतीय उच्च शिक्षा

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. किन्तु भारतीय उच्च शिक्षा का हाल ठीक नहीं है. आज बीबीसी के रेहान फजल का ब्लाग देखा और उसे शेयर भी किया किन्तु लगता है कि कुछ और भी कहना चाहिये, इसलिये ब्लाग पर आ गया.
उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के लिये जबसे नाक (NAAC) का कार्य प्रारम्भ हुआ तबसे ही संदेह उपजने लगा. इस वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय पाठ्यक्रम के बाद संदेह विश्वास में बदलने लगा कि भारत के राजदल शिक्षा को भार मानते हैं और इसे बेचकर अकूत धन कमाना चाहते हैं.

उच्चशिक्षा की गुणवत्ता की बात महामहिम राष्ट्रपति  श्री प्रणव मुखर्जी भी कर रहे हैं. इस देश के नागरिक जानते हैं कि वे कितनी बार वित्तमंत्री रह चुके हैं. उच्चशिक्षा के स्तर की जानकारी उन्हें तब भी थी. 1966 के कोठारी आयोग द्वारा सबके लिये स्नातक स्तर की निःशुल्क शिक्षा की बात की गयी थी. उसी शिक्षा को अब बेचने की बात चल रही है , वह भी तब जब आयकर, सेवाकर के साथ शिक्षा उपकर लिया जाता है. कांग्रेस को छोड दें तो भाजपा भारतीय परम्परा की बात तो बहुत करती है किन्तु शिक्षा का धंधा करती है इसलिये निःशुल्क शिक्षा से उसे परहेज है. वह अपने सरस्वती शिक्षा मंदिरों को निजी विश्वविद्यालय में बदलने का सपना देखती है.

उच्च शिक्षा की दुर्दशा का प्रमुख कारण इस मद में बजट प्रावधान को कम करना रहा है. प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करने की जगह प्रौढ शिक्षा और आंगन बाडी जैसी योजनायें संचालित की जाती हैं जिसका नब्बे प्रतिशत धन हवा में उड जाता है. पहली पंचवर्षीय योजना से ही शिक्षा को प्राथमिकता नहीं मिली. आज भी गावों और शहरों के प्राथमिक पाठशाला मूलभूत संसाधनों के अभाव में हैं. शाला-शिक्षक-पुस्तक के अभाव में दर्जाफनौवल कर दिया जाता है. माध्यमिक शिक्षा की स्थिति उससे भी बदतर है. उच्चशिक्षा की स्थिति सबसे खराब है. आज के चिन्तक केवल उच्च शिक्षा  की गुणवत्ता पर अचानक हायतौबा मचा रहे हैं तो क्यों?

सरकार अब से भी चाहे तो  चरणबद्ध रूप से काम करने पर 2025  तक हम मानक स्तर पर पहुंच सकते हैं. इसके लिये हमें यह जानना होगा कि हमारी तब तक की युवा शक्ति को कहां भेजना है? सबके लिये मानक प्राथमिक शिक्षा की  ( कक्षा आठ तक  ) निःशुल्क व्यवस्था करनी होगी. इसके लिये मानक विद्यालय भवन, शिक्षक, पाठ्यपुस्तक चाहिये. शिक्षकों की आवश्कता की पूर्ति हेतु प्रत्येक तहसील स्तर पर प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्र चाहिये. साथ ही स्नातक स्तर पर एक प्राथमिक शिक्षा का डिग्री पाठ्यक्रम चलाना चाहिये जिसके तीसरे  वर्ष में अध्यापन अनुभव होना चाहिये. यह काम हमें युद्ध स्तर पर 2016 तक पूरा करना होगा.

माध्यमिक विद्यालयों को  चार वर्ष का (नौवीं से बारहवीं कक्षा तक)  का पाठ्यक्रम चलाना चाहिये. सभी माध्यमिक विद्यालयों में  सभी स्ट्रीम की शिक्षा मिलनी चाहिये. इसके विद्यालय  भवन,  शिक्षक, पाठ्यक्रम चाहिये. इन सभी कार्यों के लिये प्राइवेट एजेंसियां नहीं चाहिये. सरकार को करनी होगी . इसके लिये संविधान में उल्लिखित वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता को ध्यान में रखना होगा. शिक्षा को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाना होगा. 2020 तक इस काम को पूरा करना होगा.

उच्चशिक्षा के केन्द्र महाविद्यालय और विश्वविद्यालय  को राजनीति से मुक्त करने के लिये कुलपतियों की नियुक्ति से सरकार को अपने से अलग कर लेना चाहिये. इस समय कुलपति  से लेकर चपरासी तक सभी पदों पर बोली लग जा रही है. जहां बोली नहीं है वहां वेतन नहीं है. दो हजार, आठ हजार, दस हजार प्रति माह पर नेट या पीयचडी शिक्षक भारत में ही मिलेंगे, और आप गुणवत्ता कि बात करेंगे.

समसामयिक जीवन के लिये किस क्षेत्र में किस तरह के कितने लोगों आवश्यकता है इसकी जानकारी करनी होगी. तदनुरूप पाठ्यक्रम और सभी सम्बन्धित साजोसामान की व्यवस्था सरकार को करनी पडेगी. यदि 1500  विश्वविद्यालय चाहिये तो भारत की जनता तो इतना कर(Tax) देती है कि 3000 विश्वविद्यालय चल सकें. जो लोग रोज यह कहते हैं कि कठोर निर्णय लेने पडेंगे उन लोगों ने कालेधन की उत्पत्ति रोकने , बाहर गये काले धन को वापस लाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिये कौन से कठोर निर्णय लिये हैं.

जितने भी गुणवता निर्धारण करने वाले संस्थान  हैं उन सभी की गुण्वत्ता संदिग्ध है. नाक का क्या मानक है ?उसे पहले देश और प्रदेश के मानव संसाधन विकास मंत्रालय का मूल्यांकन करना चाहिये. निदेशालयों का मूल्यांकन करना चाहिये. महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में तिथि निर्धारित कर पहुंच जाना चाहिये. अभी तक नाक के वेबसाइट का हिन्दी संसकरण काम नहीं करता है.

हमारे माननीय  संसद में बैठकर संसद की गुणवत्ता जब तक नहीं बनायेगे तबतक भारत के किसी संस्था में गुण्वत्ता नहीं आयेगी. शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर उसे बेचने की तैयारी चल रही है. इससे जनता को सावधान होना होगा.

नमस्कार.

Sunday, October 13, 2013

विजयादशमी

विजयादशमी

नमस्कार!
हालचाल ठीक ही है. आज विजयादशमी, आश्विन, शुक्लपक्ष, विक्रमीय संवत २०७०,  चौदह अक्टूबर २०१३  है. हर्ष का पर्व है. भारतीय परम्परानुसार क्षत्रिय लोग शस्त्रपूजन करते हैं. दशहरा का मेला और छुट्टी. एक हंसी खुशी का त्यौहार , दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन की तिथि. यह सब कुछ आज अधर में लटका हुआ है. एक भयंकर तूफान पायलिन/फेलिन उडीसा से उत्तर पश्चिम की ओर बढते हुये कमजोर पडता जा रहा है. उसके प्रभाव से देवरिया में कल से ही बरसात हो रही है. कल रात से अबतक लगातार मध्यम गति से मध्यम हवा के साथ वर्षा ने उत्सव और और समारोह पर वास्तव में पानी फेर दिया है. सरकार की चैतन्यता से तूफान से सम्भावित जनहानि को बचा लिया गया है. किन्तु मध्यप्रदेश में दतिया के पास देवीदर्शन के समय प्रशासन की चूक से भयंकर भगदड में ९० लोग मर गये सैकडों घायल हो गये. तूफान प्रभावित क्षेत्र को छोडदिया जाय तो लोग बरसात के बाद आनन्दोत्सव में व्यस्त हैं.

राम भारत में भक्ति, अध्यात्म, समाज और राजनीति सबको अत्यधिक प्रभावित करने वाला व्यक्तित्व है. भारत में राम से निरपेक्ष रहना कठिन है. कभी राम के साथ कभी राम के विरोध में. इस समय जब मैं यह ब्लाग टंकित कर रहा हूं साथ साथ जगजीत सिंह का राम भजन सुन रहा हूं. कथा के अनुसार राम का अवतार एक काल विशेष में एक कार्य विशेष  के लिये हुआ था. वह कार्य सम्पन्न कर राम ने जलसमाधि ले लिया.

अब राम के नाम पर केवल राजनीति चल रही है. वह राजनीति भक्ति की हो या शक्ति की. लोग अपनी बुद्धि के अनुरूप राम की व्याख्या में लगे हैं. इसके अतिरिक्त  शैव, वैष्णव, शाक्त,  तांत्रिक, मान्त्रिक, वामाचारी, अघोरी आदि न जाने कितने लोग लोगों को लुभाकर उनकी श्रद्धा के कारण अपने नाम और धाम को चमका रहे हैं. मनुष्य के जन्म के साथ ही तरह तरह की समस्यायें शुरु हो जाती हैं, इन सभी समस्याओं का निराकरण किसी स्पष्ट वैज्ञानिक विधि से सम्भव नहीं हो पाता. जिन समस्याओं का निराकरण सपष्ट है उसके लिये कोई राम के पास नहीं जाता. लेकिन असमाधानशील समस्याओं ्के निवारण के लिये लोग अवैज्ञानिक विधियों का सहयोग लेते हैं इसमें लगभग सभी आ जाते हैं.

राम रामलीला के बहाने बचपन में जो आनन्द दे जाते हैं वह आजीवन रस देता रहता है. और दशहरा मनाया जाता रहेगा. जब हम किसी भी खेल में जीत होने पर इतने मगन हो जाते हैं तो एक समय के राष्ट्र के जीत पर लोगों ने खुशी मनायी और वह चल रही है. आधुनिक लोग तो सचिन को भी भगवान बना चुके हैं. जो बचपन में आत्मसात हो जाता है उसे बाद के ज्ञान और तर्क द्वारा भले ही मानस से निकालने का प्रयास किया जाय वह पुनः स्थापित हो जाता है. साम्स्कृतिक परिवर्तन और जीवन की आवश्यकता के कारण बहुत सी विचित्र बातें दिखाई देने लगती हैं. यह व्यक्ति के मूल्य का प्रश्न है.

भोजपुरी में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन को दुर्गा भसान कहते हैं. आज दुर्गा भसान का दिन भी है वर्षा हो रही है. आज स्थगित ही होगा लोग इसे अब पूर्णिमा तक ले जा सकते हैं.

इन सारी गतिविधियों के सक्रिय भागीदार, समर्थक, निरपेक्ष, विरोधी, निन्दक,  सभी को अपना लक्ष्य मिल जाय और किसी के मन में कोई ग्रंथि न रहे, सभी मानसिक रूप से स्वस्थ रहें यही त्यौहार की उपयोगिता है.

नमस्कार.

Saturday, October 12, 2013

जनता, राजदल और सरकार

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. शहर में ढोल नगाडे बज रहे हैं. महाष्टमी की तिथि . लोग व्रत हैं. हवन करेंगे. कुछ लोग को यह खर्च बिल्कुल बेकार लगता है. धर्म अफीम की तरह नशा है. सत्ता भी नशा है. प्रतिशोध की भावना भी नशा है. जो जन्म से इन बातों को देखते रहे हैं उनके स्वभाव में इनके प्रति प्रतिरोध नहीं है. अधिकांश जनता तो ऐसी ही है. कन्फ्यूजन में पडी हुई. डरी सहमी हुई. आलस्य में डूबी हुई. पिछले सौ वर्ष में कोई एक व्यक्ति है जिसकी बात से सभी सहमत हों. शायद नहीं. पहले भद्रलोक ( ज्ञानी, विज्ञानी ,धर्मी ,धर्मी, वादी , विवादी) रास्ता तय कर ले. जनता को भी राह मिल जाये. भारत के लिये क्या ठीक है , संविधान में तो "समाजवाद" का उल्लेख कर दिया गया और बताया ही नहीं गया कि यह क्या बला है. मुलायम समाजवाद और बहुजन अम्बेडकरवाद तो इतना धन देता है कि आयकर और सीबीआई समझ ही नहीं पाते कि यह क्या है. कचहरी मे जाते हैं और आते है.

जनता अपनी कुंठा, विषाद, चिंता आदि को हवन में जला देती हैं. पुरोहितवाद अशिक्षा की देन है, शिक्षा के प्रसार होने पर पुरोहितवाद धीरे धीरे खत्म हो सकता है यदि भ्रष्टाचार समाप्त हो जाये. भ्रष्टाचार भाग्य के रूप में स्थापित होता जा रहा है. जनता भ्रष्टाचार जनित परिस्थिति को भाग्य मान लेती है. हर व्यक्ति अपना काम कराने के लिये सोर्स, सिफारिस घूस का सहयोग ले लेता है और भगवान को प्रसाद चढा देता है तथा मित्रों बन्धु बान्धवों की नजर न लगे इसलिये उन्हें कुछ प्रसाद भोजन करा देता है. नजर से बचने के लिये चरणपूजन भी  करता है. नेता चाहे किसी भी दल का हो चरण पूजन करवाता है. जनता भी करती रहती है.

सभी राजदल धर्म को अपना साधन बनाने की कोशिश में लगे हैं. नवरात्रि का व्रत अनिवार्य तो नहीं है. किन्तु हर धर्म या विचारधारा या वाद को जन्म से मृत्यु पर्यन्त प्रमुख गतिविधियों के लिये विधि या कर्मकांड निर्धारित ही करने पडेंगे. जनता को जब तक नया और पूर्ण विकल्प जब तक नहीं मिलेगा तब तक पुराने कर्मकांड चलते ही रहेंगे. मूर्तियां तो बनती रहेंगी. विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, यीशु. मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा. गांधी , नेहरू, अम्बेडकर, ्कांसीराम,मायावती, मार्क्स,लेनिन आदि हर देश में हर वेष में. अच्छा लगे तो राम लीला, रावणलीला, दुर्गापूजा, असुर पूजा करते रहिये.

अब तो टीवी तरह तरह की लीला और बीच में विज्ञापन , हरतरह की पत्रिकाओं में सम्पादकों के धर्म और आडम्बर के विरुद्ध लेख और साथ में यौन जीवन के लिये दवा, टानिक जनता देख रही है और उसे भी आजमा  रही है. सभी पुरोहितों की कमाई से अधिक कमाई यौन टानिकों के माध्यम से होती है जिसे हमारे क्रांतिकारी सम्पादक अपनी विश्वसनीयता बांट देते हैं.

पुराने जमाने में वोट देने के लिये पोलिंग बूथ पर कब्जा कर लेना आम बात थी. आज कल का सभ्य इन्टर्नेटिया समाज बूथ्कैप्चरिंग मेम माहिर हो गया है. एक ही आदमी जितना चाहे उतना वोट दे सकता है. इस फर्जी मतदान के आधार पर जिसे चाहे उसे महान बना दीजिये. जनता क्या करे. पढे लिखे बुद्धिजीवी समाज के इन्टरनेटिया फर्जी मतदान को कैसे रोके?

हमारे राजदल पंजीकृत होते हैं, चुनाव आयोग पंजीकरण करता है. नेता तय करते हैं कि दल क्या करेंगे. किसी में भी आंतरिक लोकतंत्र नहीं है. ईनके धन का कोई हिसाब नहीं. जो चाहे सो करें. मंत्री जी सरकार के खर्चे पर सरकार का वेतन लेते हुये मनमानी बोलते रहते हैं. लोकसेवक यदि सरकार से वेतन पाता है तो उसकी आचार संहिता है. जो नेता सरकार से वेतन लेता है वह कुछ भी बोलने के लिये स्वतंत्र नही होना चहिये.

आइये आशा करें कि हमारे पथप्रदर्शक निष्पक्षता पूर्वक ऐसा व्यवहार करेंगे जो अनुकरणीय होगा. चैनल और मीडिया के लोग अपने आचार पर भी विचार करेंगे. जनता जो कनफ्यूजन में निर्णय के लिये दूसरों का मुंह देख रही है उसे उचित मार्ग मिलेगा. वह ठगा नहीं जायेगा छला नहीं जायेगा.

हमें अन्याय से लडने की शक्ति चाहिये , शक्ति चाहिये, शक्ति चाहिये.

नमस्कार.

Friday, October 11, 2013

"प्रसीद मातर्जगतोखिलस्य"

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. त्यौहार का मौसम है. नवरात्रि से छठ तक भक्तिमय वातावरण है. गत दो दिन से महातूफान की चेतावनी चल रही एक भयंकर प्रलयंकर तूफान आज १२/१०/१३ की रात कभी भी भारत की धरती को छूने वाला है. आज नवरात्रि की अष्टमी तिथि है जिसे महाअष्टमी भी कहते हैं. हमलोग बचपन से इस व्रत को करते आ रहे हैं. मेरे बचपन में इस व्रत का प्रचलन बहुत कम था. इस क्षेत्र में व्यवसायी (वैश्य) लोग दुर्गा पाठ कराते थे. पहले इस पाठ को बडे गोपनीय ढंग से कराया जाता था. कुछ लोग मूर्ति स्थापित कराते थे. धीरे धीरे इसका प्रसार होता चला गया . मानव उत्सव धर्मी है. उसे उत्सव मनाना ही है चाहे जिस रूप में मनाये.

भारत की स्वतंत्रता के बाद संविधान बनाया गया. संविधान में भारत के सभी नागरिकों को समान अधिकार दे दिये गये. राजनैतिक समानता मिल गयी. भारत में इस कारण पुराने भद्रजनों के साथ साथ नये भद्रजन जुडते चले गये. नये भद्र जन भी पुराने भद्रजनों की लीक पर चलने लगे.

वर्ण और जाति व्यवस्था का वैधानिक रूप समाप्त हो गया. आधुनिक  वैज्ञानिक जीवन  पद्धति का विकास होने लगा. समाजवाद की साम्यवाद की चर्चा आम होने लगी. राजा और राज व्यवस्था समाप्त हो गयी. प्रिवीपर्स की समाप्ति के साथ साथ राजा नाम भी समाप्त हो गया. सांसद और विधायक अपने को राजा कहने/मानने  लगे. जो एक बार राजनैतिक पैठ बनाया वह आजीवन पद और सुविधाओं को अपने पास करने के लिये नाना प्रकार के अनैतिक उपाय में जुट गया. इस क्रम में वर्ण और जाति को पुनः जीवित किया गया और राजभद्र लोगों ने इसके बहाने लोगों में आन्तरिक द्वेष फैलाने में पूर्णतः सफल हो गये. सम्प्रदाय के नाम पर बंटे भारत में समूह बनाकर राजभद्र लोग पद प्रतिष्ठा और धन की मनभर लूट की और कर रहे हैं. सबके पास नामी और बेनामी तथा विदेशी बैंको में अकूत सम्पत्ति भरी हुई है.

अपने धन और पद की रक्षा के लिये रोज नये हथकंडे अपनाये जाते हैं. पिछले दो या तीन वर्षों में मूल निवासी और महिषासुर पूजन की चर्चा शुरु हो गयी है. आज इस संदर्भ राजीव रंजन प्रसाद का एक अच्छा लेख पढ्ने को मिला.

समकालीन स्थिति में केजी से लेकर पीजी तक शिक्षा की स्थिति बदहाल है न स्कूल हैं न शिक्षक हैं न आधुनिक पाठ्यक्रम है. इस बदहाली को तभी समाप्त किया जा सकता है जब सभी इसकी लडाई लडे. जब सभी के लिये व्यवस्था हो जायेगी तो जाति, वर्ग, लिंग, सम्प्रदाय की बात समाप्त हो जायेगी. चिकित्सा सबकी आवश्यकता है. इसकी चपेट में आते ही अच्छे अच्छों की हालत खराब हो जाती है. भारत में सबके लिये निःशुल्क चिकित्सा व्यवस्था की लडाई सभी की लडाई है. सभी एक हो जायेगे तो दवा मे लूट समाप्त हो जायेगी.

धार्मिक/ मिथकीय आधारों पर मनाये जाने वाले समारोहों को राजनैतिक न बनाकर भारत की मूल समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये. "प्रसीद मातर्जगतोखिलस्य" हे मां सम्पूर्ण विश्व पर कृपा करें.
नमस्कार.

Wednesday, October 2, 2013

महात्मा मोहन दास गांधी

महात्मा मोहन दास गांधी
नमस्कार!
हालचाल ठीक है. आज दो अक्टूबर है. भारत का  राष्ट्रीय पर्व है. भारत के लोग गांधी से पिंड छुडाना चाहते हैं लेकिन सरकार ने उन्हें नोट में छापकर घर घर पहूंचा दिया है. आन्दोलन करना हो तो भारत में गांधी का मार्ग लेना पडेगा किन्तु साथ में भीड भी रखना होगा. अगर भीड हटी तो इरोम जैसे गान्घीगीरी करते रहिये कोई फर्क नहीं पडेगा, राहुल गांघी की एक आवाज पर सिट्टी पिट्टी गुम.

गांधी के लिये मेरे मन में आदर रहा है, अभी भी आदर है, ऐसा राजनेता जो समाजसेवा के लिये राजनीति करता है. औसत भारतीय जैसा रहने और खाने व पहनने की आदत डाल लेता है. सत्य पर कायम रहने की कोशिश करता है. लोग आदर से महात्मा कहते हैं अभी भी तमाम आन्दोलन कर्मी गान्धी को अनुकरण करने का प्रयास करते हैं. भारत के लोग भगत सिंह को भी बहुत आदर देते हैं लेकिन उनके अनुसरणकर्ताओं की कमी है. सुभाष के नाम पर भी गांधी को बहुत अधिक बुरा भला कहा जाता है. ऐसा तो सम्भव नहीं है कि किसी भी राजनेता की हर बात सर्वकालिक  हो, समय के साथ साथ परिवर्तन जरूरी होता है.

स्वदेशी और चरखा गांधी के बडे हथियार सिद्ध हुये थे. कुटीर उद्योग की भि वकालत की गयी थी. उस समय की आवश्यकता भी थी. स्वदेशी का विकल्प क्या है? हमारा दैनिक जीवन जितना ही अधिक स्वदेशी पर निर्भर अर्थात आत्मनिर्भर होगा हमारी उन्नति  होगी. जापान और चीन हमारी सम्स्कृति के नजदीक हैं. हम उनसे काफी पीछे हैं, लगभग हर क्षेत्र में पीछे हैं. जापान का जनसंख्या घनत्व हमारी अपेक्षा बहुत अधिक है किन्तु हम जनसंख्या के नाम पर भ्रष्टाचार और घोटाले करते रहे. गांधी के नाम पर वोट लेने के लिये भाजपा नीत शासनकाल में भी भारत की नोट से गांघी नहीं हटाये गये. नोट पर तो मात्र भारत का राष्ट्रीय चिन्ह और रिजर्व बैंक का चिन्ह होना चाहिये. लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति का आदर होना चाहिये. अभी भी स्वदेशी की प्रासंगिकता उतनी ही है. हमें पूरे विश्व पर नजर रखते हुये तकनीक के हर क्षेत्र में स्वदेशी को बढावा देना चाहिये. हम जितना ही आत्म निर्भर होंगे मुद्रासंकट से उतना ही मुक्त रहेंगे.

गांधी एक वकील थे, वकालत उन्हें रास नहीं आयी.  क्यों ? (आसाराम के वकील). आज जो भी वकील राजनीति में आ रहे हैं वकालत को छोडकर नहीं आ रहे हैं. उन्हें धन और राजसुख चाहिये, इसके लिये वे सत्ता को सत्य से दूर करने का हर उपाय शासन को बताते हैं ऐसी स्थिति में क्या जनता से उम्मीद की जा सकती है कि वह कानून और संविधान का सम्मान करे.

राजनेता अधिकारियों को निलंबित, स्थानान्तरित,  मौखिक प्रताडना आदि से दबाव बनाकर लगातार अवैधानिक कार्य कराते हैं इसका प्रमाण खोजकर न्यायालय में सिद्ध करना अत्यन्त कठिन है किन्तु जिस प्रकार यह काम किया जाता है उसका संदेश तो जनता में जाता ही है. गांधी के देश में राजपद पर रहते हुये गांधी के चित्र के नीचे ही यह काम हो तो गांधी की प्रासंगिकता को ही समाप्त करता है."लगे रहो मुन्नाभाई" का किरदार निभानेवाला अपनी गलती स्वीकार कर जेल जाने को तैयार नहीं होता. जब किरदार निभाने वाले के चरित्र में परिवर्तन नहीं हो पाता तो यह फिल्म मात्र मनोरंजन ही तो कर पायेगी.

मुझे लगता है कि कांग्रेस ने ही अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये गान्धी को निरंतर अप्रासंगिक बनाने का काम करती रही है. जब किसी व्यक्ति को अप्रासंगिक बनाना हो तो उसकी मूर्ति बना लिया जाय. उसपर माला चढाया जाय, उसकी पूजा की जाय, उसके विचार कालवाह्य हो जायेंगे. गांधी स्मारक स्थल पर जितनी गैस जला दी जाती है उससे गांधी के जीवन भर के त्याग की   तपस्या नष्ट हो जाती है.

लुटियन दिल्ली को बिल्कुल नष्ट कर राजशाही और अंग्रेजों के बनाये राजप्रतीकों नष्ट कर जनता के प्रतिनिधियों के लिये और जनता को अपनी बात कहने का स्थान बनाना चाहिये. स्वदेशी का प्रारम्भ यही से होना चाहिये.

बाकी बहुत कुछ है फिर कभी..
इस बकवास में कुछ सार्थक हो तो बताइयेगा.
नमस्कार!

Tuesday, August 27, 2013

नमस्कार!
हालचाल ठीक है,
खाद्य सुरक्षा बिल और उसकी आवश्यकता पर बडे बडे माननीय, अर्थशास्त्री, चिन्तक, सिविल सोसाइटी के लोग अपनी बात कह चुके. बिल लोक सभा से पास हो गया. राज्यसभा से पास हो जायेगा. कानून भी बन जायेगा. यह भारत के सभी नागरिकों के लिये हो जाता तो क्या बुरा हो जाता. कालाबाजारी बन्द हो जाती. इससे सम्बन्धित भ्रष्टाचार बन्द हो जाता.

प्रत्येक व्यक्ति के लिये खाने भर का गेंहू और चावल एक भाव से पूरे देश में मिल जाय तो अर्थव्यवस्था बिल्कुल  नहीं हिलेगी. किसान से लाभकारी मूल्य पर केन्द्र सरकार जितना किसान बेंचना चाहे उतना खरीद ले हर विकास खण्ड पर अत्याधुनिक सेलो बनाकर सुरक्षित कर ले. उसे साफ करके गुणवत्ता के मानकों को नियत कर सभी के लिये खाने भर का गेंहू और चावल उपलब्ध करा दे.

अर्थशास्त्री जी बोलेंगे कि पैसा कहां से आयेगा? ७०% आबादी के लिये जहां से आयेगा वहीं से सबके लिये आयेगा. श्रीमान अर्थशास्त्री जी भारत की जनसंख्या की आमदनी को चाहे जितने वर्गों बांटिये लेकिन कुछ सातत्य तो रहेगा. हमारे संविधान में समाजवाद  जोडा गया है उसका  उपयोग , भोजन, वस्त्र, शिक्षा और चिकित्सा में होना चाहिये.

राम जी को वर्ष में तीन लाख वेतन मिलता है, वर्ष भर में पचास हजार जीपीयफ.बीमा आदि धारा ८० का लाभ ले लेते हैं. उनको पांच हजार टैक्स भी दे देना पडता है, घर में उनको छोडकर पांच अन्य सदस्य हैं. इस प्रकार उन्हे प्रति व्यक्ति लगभग तीन हजार प्रति माह खर्च के लिये मिल जाता है. इतनी ही आमदनी वाले श्याम जी के घर कुल तीन प्राणी हैं. उन्हें छह हजार प्रति व्यक्ति मिल जाता है. परनामी जी भी साल भर में तीन लाख कमा लेते हैं किन्तु वे यह कमाई ठेले से करते हैं. वह बीपीयल कार्ड धारक हैं .चरनामी जी तीनलाख वेतन से और तीन लाख ऊपर से कमा लेते हैं. वह एक लाख की बचत दिखाकर आय्कर से भी बच जाते है. इसप्रकार नाना प्रकार के लोग हैं, इन्हें आयकरदाता वर्ग, मध्यवर्ग और गरीबी रेखा के नीचे के वर्ग में बांट्कर केवल वोट का जुगाड किया जा रहा है.

बन्धुओं, आप सभी लोग, सबके लिये एक भाव पर अन्न, के.जी. से पीजी तक एक समान सबको शिक्षा तथा सबके लिये एक समान चिकित्सा सुविधा की मांग कीजिये चाहे आप जिस दल को पसन्द करते हों.
ध्न्यवाद.

Wednesday, August 14, 2013

१४ अगस्त २०१३

१४ अगस्त २०१३

नमस्कार!

हालचाल ठीक है. कल "पन्द्रह अगस्त" है. भारत की जनता के लिये एक महत्वपूर्ण दिन. पुराण कथा में जिस प्रकार गंगा जी भगीरथ के अथक तपस्या से  स्वर्ग से अवतरित हुई. उसी प्रकार जनता की प्रसन्नता का दिवस है. गंगा जी शिव की जटा में उलझ गई. भगीरथ पुनः तपस्या में जुटे तब गंगा जी पृथ्वी पर आकर भगीरथ के पीछे-पीछे गंगासागर तक जाकर समुद्र में मिलीं.

भारत के लोग पन्द्रह अगस्त १९४७ के बाद अपनी तपस्या छोड दिये और हमारी स्वतंत्रता तमाम विचारधाराओं  के बहाने कुछ लोगों के हाथों में चली गई. उन्होनें अपनी सुविधानुसार संविधान बनाया. अब उसकी मनमानी व्याख्या करते हैं, अपने लिये संशोधन भी कर लेते है.

जनता मुंह ताकती रह जाती है. वे संविधान को सर्वोपरि नहीं मानते. संसद को भी नहीं मानते. अपने को मानते हैं. किन्तु इन सभी की आत्मा कुछ घरानों और व्यक्तियों में सिमट गयी है.

उनके वक्तव्य आम जनता को सुनने पड्ते हैं, झूठ लगने पर भी मानने पडते हैं. अपनी आवश्यकताओं के लिये इन पर निर्भर होना पडता है. इसलिये ये जनता को तमाम खेमों में बांट चुके हैं. लोग आपस में दंगा करने पर उतारू हैं. बहुत होता है तो इनमें से कुछ को गाली देकर जनता अपनी भडास भी निकाल लेती है.

आशा करें कि हम अपने मतभेदों को भुलाकर पुनः एक साथ तपस्या करेंगे और हमारी स्वतंत्रता निर्मल धारा के रूप में बहने लगेगी. हम पुनः अपनी आजादी को उल्लास के साथ आत्मसात कर सकेंगे.

जय जनता! जय जगत!!

Friday, August 9, 2013

हमारी शिक्षा -१

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.

शिक्षा किसी के चुनाव के घोषणा-पत्र का प्रमुख अंग नही बन पाता. सबको शिक्षा किन्तु कैसी शिक्षा? प्रत्येक वर्ग के अभिजन समुदाय के बच्चे अच्छे स्कूल में पढ सकें इसकी  व्यवस्था शिक्षा के अधिकार कानून में कर दी गयी है.

प्राथमिक शिक्षा की चिन्ता छोडकर अब केवल मिड डे मील की बात चलती है. ग्राम पंचायत के सभापति को छोडकर अन्य सदस्य तथा अभिभावक के चुने हुये सदस्यों को एक एक माह मिड डे मील की व्यवस्था की जिम्मेदारी दी जानी चाहिये. अभिभावकों में से ही निरीक्षक भी रखे जाने चाहिये शिक्षकों को इससे पूर्णतः मुक्त कर दिया जाना चाहिये.

छात्र-शिक्षक अनुपात को २५  ः १ करना चाहिये, प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम छ्ह कमरे कक्षा के लिये, इसके अतिरिक्त अध्यापक कक्ष, भंडार कक्ष, रसोईघर, पर्याप्त संख्या में शौचालय होने चाहिये. विद्यालय की सफाई की व्यवस्था होनी चाहिये. स्वतंत्रता के पूर्व मिट्टी के बने भवनों मे कमरों की संख्या अधिक होती थी. किन्तु बाद में तीन कमरों के भवन बनने लगे. उसके बाद छोटे छोटे कबूतरखानें जैसे  कमरे बनाने की भरमार हो गई.

प्राथमिक शिक्षकों से जो भी अतिरिक्त कार्य लिये जाते हैं उन्हें ग्रीष्मावकाश में समुचित मानदेय देकर कराना चाहिये.

अंग्रेजी की पढाई की व्यवस्था अब सभी स्कूलों मे कर दी जानी चाहिये किन्तु पढाई का माध्यम मातृभाषा ही होना चाहिये. हाई स्कूल तक भाषा की पढाई मौखिक और लिखित दोनों स्तरो पर होनी हिये. सुलेख, श्रुतिलेख,सुपठन अनिवार्य किया जाना चाहिये.

हमारे माननीय गण विकास की बात करते हैं, वेतन भत्ता और पेंशन लेते हैं पैसा बांटने के लिये लोगों की लाइन लगवाते हैं किन्तु हर प्रकार के दायित्व से मुक्त रहते  हैं. उनके क्षेत्र के छात्र पिछडे क्यों इसका उत्तर भी उनसे पूछा जाना चाहिये. जिस प्रकार प्रश्नकाल होता है उसी प्रकार प्रतिवेदन काल भी होना चाहिये जिसमें हर माननीय अपने क्षेत्र की जानकारी दे सके. इस प्रतिवेदन में प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा  तक होनी  चाहिये. जहां तक शिक्षा के अधिकार के दायरे  को बढाया जाय वहां तक जबाबदेही भी बढनी चाहिये.

यदि हम चाहते हैं कि उच्च शिक्षा गुणवत्ता पूर्ण हो तो हमें प्राथमिक स्तर से लेकर हर स्तर पर सुधार करना होगा. प्रत्येक स्तर पर मानव संसाधन और भौतिक संसाधन दोनों का अति अभाव है.

अतः हम सभी को आगामी चुनाव में दबाव बनाना ही होगा कि केजी से पीजी तक अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप निःशुल्क एवं सबके लिये सुलभ शिक्षा की व्यवस्था होनी ही चाहिये.

फिर मिलेंगे
नमस्कार!

Sunday, July 21, 2013

आयकर

नमस्कार!

हालचाल तो ठीक है किन्तुआज आयकर के बारे में कुछ सूचनायें देखने को मिलीं. आयकर विभाग मध्यवर्ग के नौकरों (नौकरी करने वाले ) को बहुत डराती है. आयकर विभाग जो भी चिठ्ठी भेजता है उसमें सजा की धमकी जरूर रहती है. हर कार्यालय में आयकर गणना  की चर्चा होती रहती है. कुछ वर्षों पूर्व आयकर की गणना और सूचना भेजने के लिये एक सीडी  की चर्चा चली किन्तु अभी तक आयकर विभाग यह सीडी टीडीयस अधिकारियों को नहीं भेज सका.

अभी धारा ८० सी के तहत सभी को दो लाख की ही छूट मिलती है चाहे आप की आमदनी  चार लाख प्रति वर्ष हो या दस लाख प्रति वर्ष.यह छूट तो आमदनी आधारित होनी चाहिये.  चाहे आप अकेले  हों या आपके दस आश्रित हों. आय कर तो प्रतिव्यक्ति आमदनी पर होना चाहिये. आपकी आमदनी अधिक होती है तो व्यय भी अधिक होता है और आप व्यय पर भी विविध प्रकार के कर देते हैं. इसी कारण व्यक्तिगत आयकर न लेने का भी सुझाव आता है किन्तु सरकार इसे नहीं सुनती.

इस देश के तमाम लोग जो नौकरी नहीं करते वे कितना आयकर  देते हैं, सभी जानते हैं. किन्तु डिफाल्टरों का जमाना है सरकार एक आध डिफाल्टरों को पकड कर चुप हो जाती है. और मध्यवर्ग के नौकरों के बच्चे दूध, फल, सब्जी और अखबार क पैसा आयकर के रूप में जमाकर सर पीट्कर रह जाते हैं.

आयकर देने वालों को एक पैन कार्ड भी सरकार अपने व्यय पर नहीं दे पाती और जो बनवाते हैं उसपर आवास का पता नहीं होता, अर्थात आप उस कार्ड का उपयोग बैंक का खाता खुलवाने या सिमकार्ड लेने में नहीं कर सकते. है न सोचनीय बात कि जो व्यक्ति आय्कर विभाग को लखों दे देता है सरकार बदले में उसे एक आवासीय पता का प्रमाण पत्र भी नहीं दे पाती.

यदि आप आयकर दाता हो गये तो गये काम से यह सरकार आपके कल्याण के लिये कुछ नहीं कर सकती. न चिकित्सा करायेगी न दुर्घटना पर पूछेगी न मरने पर पूछेगी.

इसलिये बन्धुओं यदि मेरी बात से सहमत हों तो इसे शेयर करें, राजदलों पर दबाव बनाये कि आयकर आयकर दाता के परिवार के सदस्यों कभी ध्यान रखे. उसके आयकर का एक मामूली अंश सामूहिक चिकित्सा बीमा में भी भेजे. उसका सामुहिक बीमा कराये और वह जब तक कर देता है उसकी करदेयता के आधार पर उसे बीमा धन मिले..........

Saturday, June 1, 2013

खेल का खेल

खेल का खेल

नमस्कार!

हालचाल ठीक है. कुछ दिनों से क्रिकेट घोटाला चर्चा में है. क्रिकेट का खेल अंग्रेज भारत लेकर आये. क्रिकेट देखना और उसकी बात किये बिना बुद्धिजीवि नहीं हुआ ज सकता है ,इसलिये सभी बुद्धिजीवि इसपर बात करना सम्पादकीय लिख्नना पसन्द करते हैं . धर्म को अन्धविश्वास मानते हुये  खिलाडी को भगवान भी बना देते हैं. जब रेडियो से कमेन्टरी का प्रसारण हुआ करता था तो कार्यालय प्रसारण घर बन जाया करते थे.कुछ दया करके आधी कमेन्ट्री हिन्दी में भी हो जाती थी. अब तो लाइव प्रसारण हो रहा है, अरबों खरबों का विज्ञापन पीछे- पीछे घूम रहा है. सिनेमा और क्रिकेट खेल के टिकट का ब्लैक  तब से चल रहा है जब से ब्लैक मारकेट चल रहा है. जुआ का खेल भी प्रागैतिहासिक काल से चला आ रहा है. क्रिकेट के खेल में जुये की जुगलबन्दी अति प्राचीन है. अधिक और निश्चित कमाई के लिये जुये में बेईमानी होती ही है अतः गेम  फिक्सिंग चालू हो गई. जहां गुड वहां चींटे. अतः राजनेता खेल के मालिक हो गये. तो खेल स्वास्थ्य के लिये नहीं पैसे के लिये खेली जाती है.

इसलिये "खेल" जारी है. जबरोजमर्रा की समस्यायें अधिक कष्ट देने लगें तो, संगीत और खेल शासकों के लिये बडे लाभकर होते हैं. अब तो धनकारक भी हो गये हैं. देश का खेल मन्त्रालय सभी नागरिकों के लिये खेल के साधन जुटाने में नही लगता , कुछ को चुनकर काम चला लेता है. इस समय घोटले के आरोपों से घिरी सरकार के लिये खेल में फिक्सिंग का  खेल  वास्तव में औषधि का काम कर गयी.

नमस्कार. 

Friday, May 31, 2013

किसका वाद और किसका तंत्र

किसका वाद और किसका तंत्र
नमस्कार!

हालचाल ठीक ही है. तंत्र और वाद के संघर्ष में कुछ जीवन और गये. जिसके हाथ में बन्दूक हो या जिसकी सुरक्षा में बन्दूकधारी हों उसके मृत्यु की प्रायिकता सामान्य जन की अपेक्षा अधिक होती है. रक्तपात अच्छा तो कभी नहीं होता. किन्तु युद्ध में रक्तपात वीरता और शहादत मानी जाती है. इसलिये सैन्यबल, माओवादी और राजदल के सदस्य मरते हैं तो शहीद हैं और घायल हैं तो वीर हैं. किन्तु शहादत उसे ही मिलती है जिसके रक्तपात में केवल सैद्धान्तिक शत्रुता हो व्यक्तिगत स्वार्थ कहीं भी न हो. क्या ऐसा सम्भव है? इतिहास के पन्नों में इस तरह के युद्धों का विवरण मिलता है किन्तु बुद्धिमान लोग युद्ध और प्रेम में सब जायज है कहकर अपने कुकृत्यों का तर्कीकरण कर लेते हैं, विजयी होने पर करोडों खून माफ होते हैं.

भारत में कौन किस वाद का समर्थक है कहना दुष्कर है. किन्तु सरलता के दृष्टिकोण से कहा जा सकता है कि जो पचास प्रतिशत से अधिक दशाओं में जिस विचारधारा के निकट हो वह उस विचारधारा का है. और अधिक कसौटी खरी करें तो कह सकते हैं कि जसकी विचारधारा पन्चानबे प्रतिशत दशाओं में सही है वह व्यक्ति विचार के अनुसार व्यवहार कर रहा है.इससे अधिक प्रत्याशा नहीं की जा सकती है, शर्त यह है कि वह व्यक्ति जानबूझकर कोई त्रुटि नहीं कर रहा है.

भारत में जितने भी लोकतांत्रिक राजदल हैं उनमें से किसी भी दल में गुप्त मतदान द्वारा पारदर्शितापूर्ण निर्णय नहीं किया जाता है अतः उन्हें लोकतान्त्रिक दल कैसे कह सकते हैं . जब दल लोकतान्त्रिक नहीं हैं तो चुनाव और मतदान के आधार पर लोकतंत्र का नाम दे दिया गया है. मैं भी इसी तरह के लोगों में से ही हूं जो भारत को विश्व का सबसे बडा लोकतंत्र कहते रहते हैं. भारत के मतदाताओं के लिये मतदाता पहचान पत्र का कार्यक्रम बहुत दिनों से चल रहा है, किन्तु विश्व के सबसे अधिक कम्प्यूटर ज्ञाताओं के देश में धुंधले चित्र,त्रृटिपूर्ण नाम पते वाले पहचान पत्रो की भरमार है. रंगीन फोटोयुक्त शुद्ध मतदाता पहचान पत्र  के अभाव में कितना विश्वास और कितना संदेह किया जा सकता है.

हमारे माननीय प्रत्याशी  के रूप में सेवा का अवसर मांगते हैं और माननीय बनते ही केवल मेवा की तलाश में लग जाते हैं, लाल बत्ती के वाहन के बिना जनसेवा हो ही नहीं पाती और लाल बत्ती की गाडी क्या से क्या बना देती है यह किसी को बताना नहीं है. गठबन्धन के नाम पर देश गिरवी रख दिया गया. दवा और अफीम की तस्करी तो समझ में आती है किन्तु पानी के जहाजों में भरकर खनिज पदार्थ शत्रु देशों को चले जाते हैं. फिर भी कानून व्यवस्था बनी रहती है. गरीब जनता माननीयों के आगे छोटे छोटे कामों के लिये आगे पीछे घूमती रहती है. नौकरी, स्थानान्तरण, ठीका, पट्टा आदि आदि के लिये मध्यवर्ग या खेतबेंचकर धन देनेवाले पीछे-पीछे घूमते हैं. और माननीय बडे घरानों को फंसाने के फिराक में रहते हैं. लाबीईस्ट लगे ही रहते हैं. 

हर राजदल चुनाव में असीमित धन खर्च करता है. सही हिसाब कोई नहीं देता किन्तु इसका प्रमाण नहीं है. चुनाव चन्दा चढावा के रूप नहीं आता उसे प्रच्छन्न बल कौशल से वसूला जाता है. सभी दल इसके लिये नाना प्रकार के हथकन्डे प्रयोग में लाते हैं किन्तु यह सभी कार्य करते हुये राजदल लोकतंत्र की सीमा में बने रहते हैं. राजदल हैं जहां  लोकतंत्र है वहा.

प्रत्येक सरकारी कार्यालय में आफिस आफिस होता रहता है. नजराना, शुकराना और जबराना हर जगह चलता है. हर आफिस, दूकान, मकान चौराहा, ट्रेन, बस, टैक्सी, गांव , मुहल्ला, शहर और महानगर. सडक से संसद तक इसकी जितनी चर्चा होती है उतनी तीब्र गति से वसूली में विकास होता है. यह विकास समावेशी होता है. इसे छोडकर भारत में और कहीं भी समावेशी विकास नहीं होता सिर्फ नारा दिया जाता है.

ऐसे लोकतंत्र में लोग बडी गम्भीरता से कह रहे हैं कि नक्सलवादी  अपनी विचारधारा से भटक गये हैं. आतंकवादी हो गये हैं. रंगदारी वसूलते हैं. उन्हें सबक सिखाना चाहिये. सैन्य अभियान चलाना चाहिये.

ऐसी स्थिति में जब हर जिम्मेदार सेवा के अधिकाधिक लोग भ्रष्टाचार, कदाचार पर उतारू हों. हर दूसरे की गलतियों को गिना रहे हों. और रात को चर्चा में मशगूल हो जाते हों कि किसने कितना किसतरह से कमाया और किस तरह से पचाया. 

ऐसी स्थिति में भारत में कौन सा तंत्र और कौन वाद कहां है ? एक अनुत्तरित प्रश्न जैसे मेरे समक्ष खडा है.






























Thursday, May 23, 2013

रिपोर्ट कार्ड

नमस्कार
हालचाल ठीक है. मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी भारत निर्माण कर रहे हैं. ्यह निर्माण उन्हें और कान्ग्रेसियों को ही दिखाई दे रहा है. इस समय कोई भी दल नहीं है जिसमें आन्तरिक लोकतन्त्र हो. सभी हर प्रकार से सामन्तवादी हैं. ये सारा दोष जनता पर थोप देने के लिये तैयार बैठे हैं.१९१४ में लोकसभा का आम चुनाव है. सभी दल अपनी सीट बढाने के तिकडमी कार्यक्रम पर जुटे हुये हैं . इस समय कान्ग्रेस चार वर्ष पूरे करने का समारोह कर रही है. मैं भी सोच रहा हूं कि इस सरकार ने भारत को और मुझे ऐसा क्या दिया है जिसके लिये इसकी सराहना करूं या उलाहना दूं.

अब भारत सरकार छ्ब्बीस जनवरी को राष्ट्र की प्रगति का लेखाजोखा न देकर सरकार के गठन के दिन को रिपोर्ट कार्ड का दिन मानती है और अपने को टापर बना देती है.नौ वर्षों से सोनिया और मनमोहन को छोडकर सभी अस्थिर रहे हैं. इन दोनों की प्रत्येक  गलती क्षम्य है.

राष्ट्रीय स्तर तथा अन्तर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर भ्रष्टाचार में प्रथम  स्थान दिया जा सकता है.
शासन के सन्चालन में बस पास भर किया जा सकता है.
मौन और धैर्य के लिये प्रथम स्थान दिया जा सकता है.
केवल भाजपा वाले मनमोहन जी को ईमानदार कहते रहे हैं क्योकि ये सदा से पूंजीपतियों के पक्षधर रहे हैं किन्तु अब वे भी बेईमान कहने लगे हैं. अतः बेईमानी में प्रथम श्रेणी प्रदान किया जा सकता है.
देश के भ्रष्टों को मनमोहन जी के कारण राहत, सूझ, और सहनशक्ति मिलती है अतः इन्हे माडल भ्रष्ट कहा जा सकता है.

Monday, May 13, 2013

मेला

नमस्कार !
हालचाल ठीक है .

बचपन में अक्षय तृतीया को सोहनाग का मेला करने ( मेला में जाने के लिए प्रयुक्त शब्द )गया था. परशुरामधाम  सोहनाग देवरिया जिले के सलेमपुर तहसील मुख्यालय से २-३  किमी दक्षिण स्थित है. उस समय मै प्राथमिक कक्षा के तीसरी या चौथी का विद्यार्थी था. मुझे कनिया (मेरी चचेरी दादी ) के साथ जाना था .कनिया को सभी लोग कनिया ही कहते थे . मरे गाँव से सोहनाग की दूरी लगभग तीन कोस या दस किमी है. अक्षय तृतीया मई महीने में पड़ती  है . देहात में तब मई महीना रबी के कृषि कार्य के बाद का काल होता था. प्राथमिक विद्यालय अभी चलते रहते थे. लू और गर्मी सहने की आदत भी थी. 

एकतीजिया (अक्षय तृतीया) के दिन बहुत सबेरे चलकर सूर्योदय तक सोहनाग पहुँच गए . वहां कमल (पुरइन ) के पत्तों से घिरा एक पोखरा दिखा जिसके चारो ओर लोग नहा रहे थे . हमलोग भी नहाए . आज के दृष्टिकोण से ओह नहाने लायक पानी नहीं था . किन्तु वहां सभीलोग नहाते रहे। कहते  रहे कि कनई (कीचड) हो गया है . लोग नहाते रहे. नहाने के बाद भगवान  परशुराम  का दर्शन कैसे किया यह तो याद नहीं किन्तु मानस पटल में मंदिर और पोखरे को जो चित्र  था वह कुछ वर्षों पूर्व धूल धूसरित हो गया . मंदिर के बगल का खँडहर  भी नहीं दिखा. 

मेले में नहाने के बाद जलपान के लिए तीसी के तेल की जलेबी मेले की सर्व प्रमुख आकर्षण थी  जो आज भी बनी हुई है. अब तीसी का तेल दुर्लभ हो गया है तब शोध हुआ है की दिल के रोगियों की दवा है तीसी. अब तो सबसे घटिया वनस्पति या किसी ऐसे  माध्यम में जलेबी बनती  है. जलेबी के साथ घर से लाया हुआ जलपान भी हुआ. जलपान से याद आया कि घर से जलपान, दान का सिद्धान्न (सीधा ) और दोपहर के लिए सत्तू भी साथ आया था. 

पोखरे के चारो ओर कई मदारी प्रदर्शन में जुटे थे . उसमे से एक बिच्छू की दवा बेंच रहा था . उसके पास बहुत से बिच्छू भी थे वह दवा का परीक्षण भी दिखाया फिर दवा बेचने लगा मैंने भी एक गोली खरीदी . उस गोली नुमा बूटी की विशेषता बतायी गयी थी की बिच्छू के डंक मारने पर उस दवा को पत्थर पर पानी के साथ रगडकर चिपकादेने पर वह  चिपक कर विष खीचने लगेगी और दर्द कम होने लगेगा . दर्द समाप्त हो जाने पर बूटी अलग हो जायेगी, धोकर रख देने पर पुन: कार्य करने लगेगी. मैंने भी वह बूटी खरीदवाया .

बहुत जल्दी ही धूप तेज होने लगी और लोग मेले से बाहर होने लगे . रास्ते में भिखारियों की लाइन लगी हुई थी जिसमे से अधिकाश कोढी थे. उस समय भी भिखारियों के विषय में जो चर्चा हो रही थी आज भी होती है . मेले में आने वाले लोगों की मनोवृत्ति की भी चर्चा हुई . शिव पार्वती की एक प्रचलित कथा के अनुसार बताया गया की जो जिस भावना से आया है उसे वही मिलेगा. 

आगे बढ़ने  पर एक बड़ा सा आम का बाग़ आया वहां कूआं था जिसपर कोई व्यक्ति ढेकुल से लगातार पानी चला रहा था .बहुत से लोग अपना लोटा और डोरी लेकर गए थे वे अपना पानी अपने ही भर लेते थे . कई लोग पनिसरा चला रहे थे . वे लोग बड़े से मिटटी के मटके में जल रखकर लोगों को बतासे के साथ पिलाते थे. बतासा अभी भी बचा हुआ है लेकिन हर सस्ती भारतीय मिठाई की तरह उपेक्षित है. इसमें मिलावट तो की ही नहीं जा सकती. तब केवल मापतौल में डंडीमारी (घटतौली )होती थी. 

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में पवहारी महाराज का नाम बहु प्रचलित है. पैकौली में उनकी मूल कुटी है जहां का पक्का पोखरा देखने लायक है. इस क्षेत्र बहुत से लोग पवहारी महाराज के शिष्य हैं . उस बागीचे में उनकी जमात भी विश्राम कर रही थी. उनके चेले खलिहानी जौ , गेंहू या गोजई लेकर आते उन्हें देते और चरण स्पर्श करते. बहुत से लोग उसी दिन सिख (शिष्य) बन जाते. 

हम लोग भी गमछे में सत्तू सानकर  भरुआ मरिचा  और अचार से खाकर आगे चल दिये. अब धूप तेज हो गई थी . पैर जलने लगे थे. रास्ते के किनारे की घास खोज कर उसपर चल रहे थे. जहां बालू होता वहा दौड़ते हुये. छाया में रुकते हुए लगभग पांच बजे घर पहुँच गये. घर आने पर थाली में पर धोया गया . वह मेले का का अद्भुद आनंद वास्तव में पूरा वर्णित हो सकता. 

तब परशुराम जी राजनैतिक नहीं हुए थे. 

वर्तनी की अशुद्धियों केलिए क्षमा याचना सहित .

 नमस्कार !