Friday, January 31, 2014

बसन्त/बजट

 बसन्त बजट
नमस्कार!
हालचाल ठीक है,
चार फरवरी को बसन्तपंचमी है. जिसका प्रचलन कम होता जा रहा है, आउट आफ फैशन. वैलेन्टाइन डे या चौदह फरवरी नया बसन्तोत्सव दिवस है. जो अंग्रेजी पर्व है वह नवउदारवादी व्यापार को मदद करनेवाला होता जा रहा है. अमिताभ बच्चन और हेमामालिनी ने बागवान फिल्म के माध्यम से अपने समवयस्कों को भी वैलेन्टाइन डे से जोड दिया है. मोबाइल और स्मार्टफोन और विज्ञापन सब कुछ मिलाकर बसन्त को अधिक रंगीन करने पर जोर दे रहे हैं. 
इस वर्ष का जाडा है जाने का नाम ही नहीं लेता,  लोग बसन्तपंचमी को भी दांत कटकटाते हुये मिलेंगे. परसो नेट पर देख कर कह दिया कि मौनी अमावस्या को धूप होगी. किसी ने कहा बसन्तपंचमी तक जाडा ऐसे ही बना रहेगा, किसी और ने कहा आठ फरवरी तक. इस वर्ष आधा पूरा माघे कम्बल कांधे रहेगा. 
इधर बसन्त का दस्तक होता है और टैक्स विशेषज्ञ आयकर का राग अलापने लगते हैं. आयकर विभाग का नाम सुनते ही भय हो जाता है. उनकी हर चिट्ठी में दंड का जिक्र होता है. बचपन में गांव में मालगुजारी वाले लाल पगडी और मोटा डंडा लेकर आते और लोगों के बैल खोलकर लेकर चले जाते (तब हल और बैलों से जुताई होती थी) . पीछे-पीछे किसान, हाथ जोडते, माई बाप करते पहुंच जाते. अजकल भी हर सरकारी विभाग और  कर्मचारी सरकार ही कहलाना पसन्द करते हैं.
बजट में सबसे चर्चित आयकर ही है. वैट को लोग ध्यान नहीं देते, उत्पाद कर को कोई पूछता ही नहीं, सेवाकर का भी यही हाल है. सारे लोगों की निगाह में मध्यवर्ग की एक नम्बर की आमदनी निगाह में होती है. आयकर भी कई तरह का होता है. आजकल, कभी महिला कभी वरिष्ठ नागरिक, हिन्दू अविभक्त परिवार आदि कई तरह से जोडा जाता है. पता नहीं कितनी धाराओं छूट मिलती है.
१-मुझे लगता है कि व्यक्ति के लिये सबसे अधिक व्यय का काल ३५-६० वर्ष तक का होता है. इसलिये अस आयु वर्ग के लोगों को छूट मिलनी चाहिये.
२- आय का योग समस्त स्रोत से कर लिया जाता है किन्तु उस आय पर कितने जीवन निर्वाह करते हैं इसका ध्यान नहीं रखा जाता है. आश्रित संतति या माता, पिता, भाई का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा जाता. प्रत्येक परिवार में प्रति व्यक्ति आमदनी के आधार पर ही कर लगाया जाना चाहिये.
३- एक व्यक्ति के सामान्य और गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिये प्रतिव्यक्ति व्यय के अनुसार आमद्नी को करमुक्त रखना चाहिये. इसे प्रतिवर्ष फुटकर मूल्य सूचकांक के अनुसार बदला जाना चाहिये. जैसे पिछले वित्तवर्ष में दो लाख था तो इस वित्त वर्ष में दो लाख पचीस हजार होना चाहिये.
४- बचत पर छूट के भी तमाम अभ्यास हुये अब इसे एक लाख किया गया है. जिसकी आमदनी तीन लाख है उसे भी एक लाख तथा जिसकी आमदनी बीस लाख है उसे भी एक लाख. सामान्यतः इसे तीस प्रतिशत  कर देना चाहिये और इसकी सीमा भी दस लाख तक ले जाना चाहिये. 
५- आयकर की तीन दरें ही है. १०%, २०%और ३०%. इसे निम्न प्रकार करना चाहिये-
                   ५ लाख तक ५%
                 १० लाख तक १०%
               १५ लाख तक १५%
               २० लाख तक २०% 
               २५ लाख तक २५% 
                 १ करोड तक ३०%
                 २ करोड तक ३५% 
                 अधिक पर ४०%
६- बकायेदारों और कर प्रवंचकों को तरह तरह की छू ट मिलती है किन्तु जो समय से पूर्व अप्रैल से कर देते हैं उन्हें कोई छूट नहीं मिलती है. जो जितना पहले से जितना अधिक कर दे उसे उतना ही अधिक छू ट देना चाहिये. जो सारा भुगतान अप्रैल में कर दे उसे और छूट देना चाहिये. 
इस  ठंढ को बचाने में आयकर और बजट की गर्मी से कुछ राहत मिली है शायद आपको भी राहत मिले. 
नमस्कार.

Thursday, January 30, 2014

बापू जी नमस्कार

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
आज मौनी अमावस्या है. मौन रहकर स्नान करने का दिन. भारतीय परम्परा का एक पर्व, समारोह, मेला, सेमिनार सबकुछ. इस सेमिनार में लोग कुछ ज्ञान देते हैं कुछ लेते हैं. अपना खाना लेकर जाते हैं. कुछ दूसरे का खाते हैं दूसरे को खिलाते हैं.
अभी लम्बे काल तक यह पर्व चलेगा. अभी सेमिनारों और उनके द्वारा प्राप्त निष्कर्षों का जो हाल है, सबको पता है उससे कुछ को धन और कुछ को मान तथा कुछ को भविष्य के लिये प्रमाण-पत्र मिल जाता है. इस तरह के सेमिनार माघ मेला जैसे नहीं हो गयें हैं. जो सेमिनार में न जाय उसे उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिये.
आज ३० जनवरी है. अहिंसा के पुजारी को भारत में गोली मार दी गयी. तमाम लोग दुखी हुये और कुछ मिठाई भी बांटे. आज भी गांधी का मूल्यांकन जारी है. गांधी की हत्या में सम्मिलित लोगों को कोई अपराधबोध नहीं है.
भारत की स्वतंत्रता के जितने भी कारण गिनाये जाय उसमें सबसे अधिक योगदान गांधी का माना जाता है. वर्तमान लोकसेवक और जनसेवक दोनों ही गांधी का नाम जरुर लेते हैं. भारत के राज-काज में गांधी की रेखा दिखाई देती रहती है. कम से कम  साल में दो बार सरकार और अखबार उनको चर्चा में ला देते हैं.
२९ जनवरी २०१४ को बीटिंग-रिट्रीट समारोह में २०सालों बाद पुरानी स्वर्णिम बघ्घी पर सवार होकर भारत के राष्ट्रपति समारोह मेम सम्मिलित होने आये.
गांघी के सिद्धान्त तो मानने वालों के लिये ही हैं. भारत के गवर्नर जनरल को कितना खर्च करना चहिये इसपर गांधी जी टिप्पणी किये थे. आज राष्ट्रपति पर भारत के औसत प्रति व्यक्ति आमदनी के किते गुना व्यय होता है इसका भी लेखा किसी न किसी के पास होगा. अन्तिम व्यक्ति कीआमदनी का हिसाब भी किसी न किसी के पास होगा ही.
आज जो लोग राजघाट गये होंगे उन सभी के दिलों को गांधी प्रेरित नहीं कर सकते. गांधी की प्रेरणा उन्हीं को मिलेगी जो उनसे प्रेरणा लेना चाहेंगे. फिर भी मैं आशा करता हूं कि इरोम शर्मिला को न्याय मिलेगा. देश के अन्तिम व्यक्ति को भी अच्छी शिक्षा मिलेगी. सभी के सवास्थ्य की देख्रेख हो जायेगी.
लुटियन दिल्ली  की सभी इमारतों को गिरा करके अंग्रेजों की गुलामी के अवशेष समाप्त कर दिये जायेंगे. वहां पर आधुनिक जनतंत्र के मानक के अनुसार भवन बनेगे. जनता को अपनी बात कहने के लिये एक विशाल मैदान मिलेगा.
बापू जी नमस्कार.

Tuesday, January 28, 2014

टोल क्यों?

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
इस घोर ठंढ में भी टैक्स और टोल का नाम सुनकर पसीना छूट जाता है. भारत का हर नागरिक कर देता है. भारत सरकार को, प्रदेश सरकार को, जिला पंचायत को, नगर/गांव को . पुल/सडकें जनता के कर से बनतीं हैं. जब तैयार हो जाती हैं तो टोल टैक्स की वसूली शुरु हो जाती है. हमलोग भी सोचते हैं कि सरकार ने दयाकर के सडक/पुल बना दिया, अब  इसके लिये पैसा वसूल रही है तो ठीक ही है.
जब जनता के धन से ही उसका निर्माण हुआ तो फिर अतिरिक्त धन कैसा? टोल जो वसूला जाता है ठेकेदारी प्रथा से वसूला जाता है. जनता से जो धन जाता है उसका अधिकाधिक अंश इन्हीं ठीकेदारों के पास जाता है. इस प्रकार यह केवल टोल ठीकेदारों और उनसे मिले हुये लोगों के लिये ही वसूला जाता है.
सरकार और तमाम लोग इस पर प्रश्न उठायेंगे कि आखिर सरकार के पास धन कहां से आयेगा?
लोग सडक और पुल बनाने के लिये अनशन धरना और प्रदर्शन करते हैं, सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और राजदलों की चाटुकारिता करते हैं वोट के वादे करते हैं तब सरकार कई सालों में धीरे धीरे फंड देती है. फंड मिलने के बाद- ठीकेदारी और उससे जुडे तमाम जगजाहिर-रहस्य-जिनके प्रमाण जुटाये नहीं जा सकते- के बाद घीमी गति से निर्माण शुरु होता है, सरकार बदलने पर निर्माण रुक जाता है, फिर कुछ जगजाहिर-रहस्यों के समधान के बाद निर्माण कार्य शुरु  होता है. और जनता गदगद भाव से निर्माणकर्ता का गुणगान करते हुये टोल्टैक्स देते हुये आशीष देते हुये चली जाती है.
यदि सरकार निर्माण धन किसी बैंक से कर्ज लेकर करे व बाद में टोल-टैक्स से कर्ज का भुगतान करे तो कुछ हद तक बात बन सकती है.
कुछ और सोचने पर यह समझ में आता है कि सरकार हर वाहन के उत्पादन पर कर लेती है, बिक्रय पर कर लेती है और पंजीकरण पर कर लेती है, पेट्रोल और डीजल पर कर लेती है तो फिर टोल टैक्स क्यों? इतना कर देने के बाद हर वाहन को चलाने का समुचित मार्ग तो मिलना ही चाहिये.
कारपोरेट प्रत्येक उपयोगी उपादान को अपने कब्जे में लेकर उससे असीमित कमाई करना चाहता है. इसलिये अब पीपीपी नया नाम देकर भरमाने की प्रक्रिया जारी है. आखिर कारपोरेट के पास जो धन है वह भी तो जनता का ही धन है. जनता से असीमित माध्यमों से धन लेकर उसी धन से पुनः धन बना रहा है. उनका काम भी ठेके पर ही होता है. आखिर सरकारी काम और कारपोरेट के भी काम ठीके पर ही हो रहे हैं  और उनमें गुणवत्ता का अन्तर है तो मात्र व्यस्थापकों अर्थात सरकारों के भ्रष्टाचार के कारण ही है.
अतः टोल टैक्स वास्तव में भ्रष्टाचार के कारण और भ्रष्टाचार के लिये लिया जाता है. इसे बन्द ही किया जाना चाहिये. अधिकाधिक टोल नाके पर टोलवसूली का ढंग अमानवीय होता है इसलिये भी इसे बन्द किया जाना चाहिये.
नमस्कार.

Monday, January 27, 2014

भावत माता की जय

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
इस वर्ष २६ जनवरी को देवरिया में ठंढक बहुत थी, तेज हवा भी. कालेज गया था. झंडा फहराने के साथ उच्च शिक्षा निदेशक के पत्र का वाचन सुना. महाविद्यालय के जलपान समारोह के बाद घर के लिये मिठाई लिया. २६ जनवरी राष्ट्रीय पर्व के साथ बडी पुत्री के विवाह का दिन भी है.
कैमरा साथ ले गया था. ठंढ के कारण साहस नहीं हुआ. केवल रास्ते में पांच चित्र लिये. तीन को फेसबुक पर लगा दिया.
घर आकर बाहर निकला पुष्पों का छायाचित्र लेने. आजकल कुछ पुष्पों का रोज छाया चित्र लेकर उन्हें ही फेसबुक पर लगाता रहता हूं. बाहर निकट के विद्यालय के छोटे बच्चे समारोह से उल्लास के साथ लौट रहे थे.
अपना बचपन याद आया. एक दिन तो झंडा बनाने और कईन ( बांस की टहनी)  की व्यवस्था में लग जाता था. झंडा ऊंचा करने के लिये एक बित्ते (लगभग नौ इन्च) के झंडे में दस फुट की टहनी. हंसी भी आरही थी. आजकल बनाबनाया प्लास्टिक का सुन्दर झंडा मिलता है.
तीन बच्चों में से सबसे छोटा बच्चा अपना झंडा लहराते लगातार नारा लगा रहा था- भावत माता की जय, भावत माता की जय, भावत माता की जय..........भारत का उच्चारण भारत, उसका उल्लास, आवाज की खनक से ध्वनित हो रही थी.......
उसका उल्लास बना रहे, वह आगे चलकर उसके कार्य भारत की जय लायक हों......

पीछे मुडकर देखने पर विकास भी दिखाई देता है, लूट भी दिखाई देती है,
संविधान का वादा......................नेताओं के भाषण.............................अपना कार्यकलाप ............
सपने.......सच्चाइयां......भूल.......झूठ.........सच.......................................................................................................................भावत माता की जय.......
रात को चिन्मय पूछता है आप झंडा फहराने कालेज गये........................
भावत...............माता ...................की .........................जय.
किंशुक अभिनय के साथ सारे जहां से अच्छा हमारा गा रहे हैं...........................
भावत माता की जय............

Saturday, January 25, 2014

" मतदाता दिवसः सबको सही मतदाता पहचान पत्र"

नमस्कार!
हालचाल ठीक है बस पता का ठिकाना नहीं है.
चुनाव आयोग चुनाव सुधार और मतदाताओं के पंजी करण के लिये बहुत सा प्रयास करता है. मतदाता पहचान पत्र एक बडी उपलब्धि है.
मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड और निवास प्रमाणपत्र और अब आधार कार्ड तथा पासपोर्ट और तमाम एजेन्सियों द्वारा दिये गये प्रमाण पत्र सब को एक साथ रख दीजिये तो आदमी का फोटो और पता दोनों की जानकारी करना कठिन और श्रमसाद्ध्य है.
आजकल समेकित और समावेशी शब्द बडे ही प्रचलन में हैं. सरकार के विभिन्न विभाग भिन्न भिन्न तरह की योजनायें बनाते हैं कभी भी उनमें समन्वय करने का प्रयास नहीं करते.
मैं अपनी समस्या के माध्यम से इस समस्या को बताने की कोशिश कर रहा हूं.
२१ जनवरी १९९१ को मैं अपने वर्तमान  आवास में रहने के लिये आया. उसके बाद मतदाता पहचान पत्र बनाने की योजना आयी. लम्बी लाइन और तमाम कठिनाइयों को झेलकर फोटो खिंचवाया. पहचान पत्र नहीं मिल पाया. मताधिकार तो मिल गया. कुछ समय बाद मतदाता पहचान मिल गया है लेकिन पता तो चुनाव आयोग ही समझ सकता है. तबसे अबतक मेरा मकान कई वार्डों का सदस्य बनता रहा है. कई बार सर्वेक्षण हो चुका है लेकिन एक सही मतदाता कार्ड अभी तक नहीं मिल पाया. राजद्लों के नेताओं से कहा, अखबारनवीसों से कहा, सरकारी अधिकारियों से सार्वजनिक रूप से कहा. सभी कहते हैं आप मतदान तो कर ही लेते हैं तो चिन्ता किस बात की.
दो बार फारम आठ भी भर चुका हूं. चुनाव आयोग के फेसबुक पर भी लिख चुका हूं.
हर दस साल पर जनगणना होती है. उसके पहले गृह गणना होती है. मकान नं., वार्ड नं., विधान सभाई और लोक सभाई क्षेत्र बदलते रहते हैं किन्तु उनके परिवर्तन अलग अलग समय पर होते हैं परिवर्तन के साथ साथ मतदाता सूची और पता में परिवर्तन नहीं हो पाता है.
देवरिया नगर में अभी कुछ दिनों पहले मकान नं का परिवरतन हुआ है, मतदाता सूची का संशोधन हुआ है. राशन कार्ड का हल्ला है. ये तीनों कार्य एक साथ हो जाते तो ये तीन शुद्ध हो जाते. तीनों के विभाग अलग हैं इनमें तालमेल कौन करेगा?
कोई अधिकारी चाहे तो महाविद्यालओं के राष्ट्रीय सेवा योजना का विशेष शिविर इसी थीम पर आयोजित करवा कर देवरिया नगर की तमाम सम्स्याओं से नगर को मुक्त करा सकता है. देवरिया नगर में तीन महाविद्यालय हैं और कुल मिलाकर आठ सो से अधिक छात्र/छात्रायें हैं.

आशा करें कि इस समस्या का सही समा धान हो जायेगा.
नमस्कार.

Tuesday, January 21, 2014

राजनिति का धरना

नमस्कार!
हालचाल ठंढा है और राजनीति गरम है.
भारत देश में मोहन दास गांधी के नाम पर राजनीति  करने वाले असीमित हैं, अनुगामी बहुत कम. राम, कृष्ण, बुद्ध को भी पूजने वाले बहुत हैं अनुगामी बहुत कम. इस देश में गांधी के रास्ते अपनी बात रखनेवाले को कांग्रेस मार ही देना चाहती है. क्योंकि वह गांधी के नाम पर वोट लेना मात्र चाहती है. नेहरू, फिरोज की विरासत वाले भी गांधी कहलाना चाहते हैं.
जब कोई गांधी के मार्ग पर चलकर भारत के किसी समस्या का समाधान करना चाह्ता है तो भारत की सरकार बहुत तेज विरोध करती है. सरकार मानती है कि इस तरह से जनता कि हर आवाज सुनने से जनता का मन बढ जायेगा और वह उन सारे अधिकारों को मांगने लगेगी जो उसे मिलना चाहिये.
राजा को ईश्वर का रूप मानकर जीनेवाली जनता अभी भी विधायक, सांसद और मंत्री को उसी रूप में देखना चाहती है. आप कल्पना कर सकते हैं कि  भारत के किसी कार्यालय में प्रथम श्रेणी से लेकर चतुर्थ श्रेणी तक के कर्मचारी बैठ कर बात कर सकते हैं. ब्राह्म्णवाद को गाली देनेवाला अधिकारी भी ऐसा नहीं करना चाहता.
ईरोम गांधीवाद में विश्वास करती हैं. शिन्दे लाठीवाद में.
भारत में कितनी और कैसी पुलिस होनी चाहिये इसपर आयोग तो बन जायेंगे, अनुपालन कभी भी नहीं होगा. पुलिस के मारल या उच्चाधिकारियों के माल का सवाल पर जनता को भुगतने के लिये छोड दिया जाना चाहिये.
दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री और मंत्री धरना पर हैं,  चार थानेदारों का निलम्बन/ स्थनान्तरण कराना चाहते थे. दिल्ली के पुलिस कमिश्नर और गृहमंत्री इसके लिये तैयार नही हैं. भारत सरकार के गृहमंत्री इतनी सी बात को न होने देने के लिये कई हजार लोगों को दिल्ली की बरसाती, बर्फीली ठंढ मे रहने के लिये मजबूर कर दिया है. दिल्ली पुलिस के काम काज और प्रणाली को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों के प्रांतीय नेता पहले से ही आवाज उठाते रहे हैं. अभी कुछ दिनों पूर्व दिल्ली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रदर्शन करने गये थे. दिल्ली एक खतरनाक जगह बनती जा रही है. इसके लिये दिल्ली पुलिस को अत्याधुनिक आधारभूत संरचना और जनबल चहिये.
इतनी सी बात को लेकर मुख्यमंत्री को धरना पर बैठना चाहिये या नहीं, केजरीवाल को  सरकार चलाने आता है या नहीं. कांग्रेस ने केजरीवाल को दिल्ली में बांध दिया है केजरीवाल ने कांग्रेस को बौना बना दिया है. एक बात है कि केजरीवाल सत्ता के लोभी नहीं.
केजरीवाल के शपथग्रहण समारोह ने ही उन्हें देश में १०० रैलियों से मिलने वाली प्रसिद्धि दिला दी. यह कबीरपंथी या कहिए अरविन्दपंथी आन्दोलन करते रहना चाहता है. लोकतंत्र और जनाधिकार को नये ढंग से सोचने का समय आ गया है.
गांधीवादी लोगों के लिये सरकार ने जंतर मंतर पर एक सडक को निर्धारित कर दिया है. गांधी के नाम पर दिल्ली में वायसरीगल हाउस को मटियामेट कर गांधी मैदान बना दिया जाना चाहिये जहां देश की जनता रैली धरना और प्रदर्शन कर सके. लोकतंत्र  का हथियार रैली धरना और प्रदर्शन ही है. घेराव और धरना सम्बन्धित व्यक्ति के कार्यालय पर  ही होना चाहिये. दिल्ली के लोग पंचसितारा लाभ लेना चाहते हैं तो धरना प्रदर्शन की आवाज को भी सुनना पडेगा.
देश की पूरी राजनीति इस धरने के इर्द गिर्द घूम रही है. मौसम धरने के साथ नहीं है. कांग्रेस और भाजपा विकल हैं. हरदम अपने प्रतिद्वन्दी का विरोध करना ठीक नहीं. राजनीति जनहित के लिये है. प्रत्येक राजदल को जनहित में जनता को मजबूत करना चाहिये. उसे वह सभी अधिकार मिलना चाहिये जो लोकतंत्र में आवश्यक  है.
काश देश का मीडिया जनता की हर आवाज के साथ खडा रहता तो शायद सब पढ रहे होते. सभी को एक समान चिकित्सा मिल रही होती. सभी को शीघ्र न्याय मिल रहा होता. नीचे से ऊपर को जाती थैलियां रुक जाती. ऊपर से आता भ्रष्टाचार रुक जाता. सेवा आयोगों द्वारा पैसा लेना और अंगूठा काटना रुक जाता.
नमस्कार.

Thursday, January 16, 2014

आपकी आप

नमस्कार!
हालचाल तो बस ठंढक है. दिसम्बर में एक मीडिया चैनल के महान ऐंकर महोदय परेशान थे कि ठंढ को लकवा मार गया है क्या? फिर लोग दिल्ली के चुनाव से परेशान हो गये थे. तमाम लोग आआपा को ललकार रहे थे कि सरकार बनाओ. एक लंगडे राज्य में लंगडी सरकार बन गई है. आआप राजदल के गठन से ही बहुत से लोग इससे एक साफसुथरी लोकतांत्रिक दल के रूप में देखना चाहते थे. दिल्ली की आंशिक सफलता ने लोगों की कल्पना में जान डाल दिया.
केजरीवाल ने सभी अन्य दलों के ईमानदार लोगों को बुलाया. अन्ना के आन्दोलन के तमाम लोग जो देश के नुक्कडों पर जुटते थे उनमें से अधिकाधिक आआप में आ गये. अब तो मारामारी का समय है.
सरकारी गाडी और बंगला तथा मंत्रिपद साथी विधायकों में ईर्ष्या पैदा करती ही है.
तमाम समस्यायें उन कार्यकर्ताओं की होती हैं जो प्रचार करते हैं. चुनाव के बाद जिनके प्रत्याशी विधायक हो जाते हैं वे भी विजयी हो जाते हैं जिस कार्यकर्ता का प्रत्याशी हार जाता है उसे बहुत संतोष करना पडता है. जो राजदल सरकार में हो उसे अपने निर्वाचित तथा अनिर्वाचित दोनों तरह के प्रत्याशियों को समान महत्व देते हुये उनके माध्यम से उस क्षेत्र से सम्पर्क में रहना चाहिये.
आआपा ने अब राजनीति के तालाब के नीचे बैठे कीचड को डबरा बना दिया है. अब लगे रहने की बात है. अभी वास्तव में भ्रष्टाचार के समापन पर सबका मानस अलग-अलग है. इसके एक होने में समय लगेगा. दल के प्रवक्ता,और  शीर्ष सदस्य को अपनी बात सार्वजनिक कहने का कोई अधिकार नहीं होता.
आशा है शीघ्र ही आआप इस तात्कालिक समस्या का हल निकाल लेगी.
केजरीवाल और अन्य मंत्रिओं को प्रत्येक क्षेत्र के सक्रिय कार्यकर्ताओं से भी मिलते रहना होगा. अब समय आ गया है कि देश की सभी इकाइयां सामने आयें और खुलकर सदस्यता अभियान चलायें.
नमस्कार.

Wednesday, January 15, 2014

राजनीति और जीविका

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
मकर संक्रांति ठीक-ठाक बीत गयी. चुनाव का बिगुल बज गया है. टिकट के लिये टिकटार्थी अपना बायोडाटा और समर्थक जुटाने में लगे हैं. सबलोग ऐसे दल से टिकट चाह रहे हैं जिसके चमत्कार से जीत जायें. हर पार्टी की रैली हो रही है. सभी जनसमर्थन के लिये दौड रहे हैं.
लोगों के बीच रहना लोगों के दुख से दुखी होकर उसके निराकरण का प्रयास करना इसके लिये सम्मानित होते रहने की भूख मात्र हो तो जिस किसी राजदल से मन बने उसकी सदस्यता लेकर राजनीति में रहना उचित है. कोई राष्ट्रीय समस्या हो तथा उअसके समाधान के लिये किसी राजदल का सहयोग करना भी उचित है. धन के लोभ और पद के मोह में राजदलों में जाने वाले कूदते रहते हैं. जनहित की बात कहते हुये, जनता को ही ठगने का काम करतए रहते हैं.
राजदलों में काम करनेवाले लोगों की आजीविका का संकट एक गम्भीर संकट है. यही संकट उन्हें भ्रष्टाचार में खींचती है. ईमानदान बने रहने के लिये पहले अपने से लडना पडता है, फिर अपनों से लडना पडता है, फिर चाहने वालों से लडना पडता है. उच्च सिद्धान्त के अनुपालन की राह में पत्थर अपने लोग ही बनते हैं. जीविका के साधन के अभाव में राज-दल के कार्यकर्ता को संकट का सामना करना पडता है ऐसे समय उसके साथ ऐसे लोग हो जाते हैं जिनका उद्देश्य येन-्केन -प्रकारेण अपना स्वार्थ महत्वपूर्ण होता है..
चुनाव के समय प्रत्याशी और राजद्लों को बहुत से लोग चाहिये. अभी भारत में अपनी विचारधारा वाले दल के लिये सामन्य जन न तो धन खर्च  करना चाहता है  न समय. ऐसी परिस्थिति में अवसरवादी लोग सामने आते हैं जो आगे चलकर पार्टी के लिये सरदर्द ही साबित होते हैं. तमाम बेरोजगार नौकरी की लालच में अथक श्रम करते हैं. उनके प्रत्याशी विधायक या सांसद चुनाव जीत जाते हैं तो उनकी आशा हो जाती है कि उन्हें कही न कही नौकरी मिल ही ्जायेगी, वे भी जल्दी ही अपने नेता को मंत्री के रूप में देखना चाहते हैं.
लोकतंत्र में आस्था और विश्वास रखने वाले लोगों को इस समस्या पर विचार करना चाहिये. अब यह जरूरी हो गया है कि हरेक लोकतान्त्रिक संस्था को ्मजबूत बनाया जाय. राजदल इसका आधार है इसलिये सभी राजदलों का पंजीकरण, और उसके संगठनात्मक चुनाव भी निर्वाचन आयोग की देखरेख में ही होने चाहिये. उसे सूचना अधिकार कानून में ले आना आवश्यक है तथा उसे मिले प्रत्येक पैसे का हिसाब होना चाहिये. देश के सबसे महत्वपूर्ण कार्य इन्हें सौप दिया जाता है और ये किसी के प्रति जिम्मेदार नही होते हैं. किसी को भी पत्र लिखना हर तरह की सिफारिश करना इनका सबसे बडा काम हो गया है. इस प्रकार के सभी पत्रो की जांच हो जाय तो पता चलेगा कि हर भ्रष्टाचारी के रक्षक के रूप में कोई राजदलकर्मी साथ है.
राजदल के कार्यकर्ता की जीविका का साधन का सवाल हल नहीं होगा तो भ्रष्टाचार समाप्त ही नहीं होगा.
फिर मिलेंगे.
नमस्कार.

Wednesday, January 8, 2014

शर्म-शर्म

नमस्कार!
हालचाल बहुत खराब है.
भीषण ठंढक है.
यनडीटीवी पर प्राइम टाइम में दिल्ली में दिल्लीवालों के लिये आरक्षण पर बहस चल रही है. अत्यन्त निराशाजनक स्थिति मे टीवी देखना बंद कर दिया. लेकिन सोने भी नहीं जा सका. अब अपनी बात लिख रहा हूं .शायद शान्ति मिल जाय.
कांग्रेस, भाजपा और आआपा तीनों दलों की शिक्षा की नीति का क्या कहना तीनों क्षेत्रीय आरक्षण की वकालत कर रहे हैं. अभी भी समय है तोनों दल भारत की जनता से माफी मांग लें.
दिल्ली से पढकर निकले सारे राजनेता, और अधिकारी जो दिल्ली में हैं उन्हें भी देश से माफी मांगनी चाहिये. यूजीसी के सभी अधिकारी जो ८०% लीकेज वली योजनाओं पर धन व्यय करते हैं उन्हे माफी मांगनी चाहिये.
देश के सभी सांसदों को देश से माफी मांगनी चाहिये.
दिल्ली राज्य  में १५ वर्षों से शासन कर रही कांग्रेस दिल्ली से १२वीं पास छात्रों को उच्च शिक्षा देने में असमर्थ रही है. केन्द्र में शासन कर चुकी भाजपा और कांग्रेस  को यह आवश्यक नहीं लगा कि दिल्ली की उच्च शिक्षा की  हालत में सुधार करें.
देश के तमाम राज्यों को विकास के नाम पर गलियाते पत्रकार, विद्वान और स्तम्भकार इस सत्य और तथ्य को नकारते रहे. दिल्ली और जनेवि के जुझारू नेता कुछ नहीं कर पाये.
एशियाड और कामनवेल्थ खेलों में पानी जैसा पैसा बहाने वालों शिक्षा के लिये क्या कर र्हे थे. देश के नेता शिक्षा के जो आंकडे बताते हैं वे किस बूते पर बताते हैं.
सबसे अधिक तरस आआपा के नीतिकारों और योगेन्द्र यादव पर आ रहा है. आप दिल्ली वालों को आरक्षण की बात कांग्रेस और भाजपा की तौर पर दिया. आआपा कह सकती थी कि दिल्ली से १२वीं  पास हर छात्र को उच्च शिक्षा की व्यवस्था कर दी जायेगी.
आआपा तो ६.५% शिक्षा पर व्यय करने के सपने को पूरा करे.
दिल्ली के सभी आवासीय बडे बंगलों को विद्यालय बना दीजिये. कुछ ही बंगलों में बहुमंजिली इमारतें बनाकर सबको शिफ्ट कर दीजिये.
नमस्कार.

Monday, January 6, 2014

आयकर से टोलटैक्स तक

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
चुनाव के जमाने में कर की चर्चा भी हो ही जाती है. भारत में पत्रकार जगत में 'करदाता' शब्द प्रचलित है. जब हम करदाता कहते हैं तो भारत के कुछ लोग गौरवान्वित महसूस करते है. कर तो भारत का प्रत्येक नागरिक देता है. कर पर चर्चा योगव्यवसायी बाबा रामदेव ने शुरु किया है. बाबा अब हजार रूपये की नोट नहीं बन्द करायेंगे न ही कालाधन को भारत में मंगवायेगे. (अब बाबा भी क्रीम पाउडर बनाने बे्चने लगे हैं तो बात का विषय भी बदल गया है. इनके उत्पादों की दुकानों से भी पक्की रसीद नहीं मिलती. दन्तकांति के लगातार उपयोग से मेरे दांत हिलने लगे हैं. )
मुद्दा तो बिल्कुल ठीक है कि भारत की कर प्रणाली दोषपूर्ण है. इस प्रणाली में हम केन्द्र सरकार, प्रान्त सरकार, नगर , गांव सबको अलग अलग टैक्स देते हैं. जब सुविधाओं की बात आती है तो सब अपना पल्ला झाड लेते हैं.
अप्रत्यक्ष कर उत्पादकर्ता और विपणन कर्ता वसूल करते है. जितनी इच्छा होती है उतनी सरकार को देते हैं बाकी सब रख लेते हैं. आईयमयफ भारत सरकार को सरकारी खर्च कम करने को कहता है तो ये सरकारी विभागों में नियुक्तियों रोककर खर्च बचाने का दिखावा करते हैं, खूब फिजूल्खर्ची करते हैं और अप्रत्यक्ष करों का मात्र दस प्रतिशत ही संग्रह करते हैं.
भारत के नागरिक को जन्म से लेकर मृत्यु तक और उसके बाद भी कितना कर दे देना पडता है उसका हिसाब करना कठिन है.
एक जमाने में दियासलाई पर भी दिये गये कर की रसीद  मिल जाती थी. अब राजदल उत्पादकों, विपणनकर्ताओं और ठीकेदारों से चुनाव चंदा और गिफ्ट ले लेते हैं और उन्हें करचोरी की छूट दे देते हैं.
आम अखबारी जनता और मीडिया आयकर, पेट्रो पदार्थों के दाम,रेल किराया पर खूब चर्चा करते है. रेल किराया बढाने के विवाद पर ममता जी ने मंत्री को हटवा दिया. सेवाकर बढाने पर चुप रहीं. सेवाकर का दायरा बढता जा रहा है जनता झेलती जा रही है.
जब बिक्री कर आया तो कहा गया कि जिसकी बिक्री अधिक है वे लोग सरकार को कुछ कर दे दें. बाद मे सरकार ने इसे ग्राहकों से वसूलने की छूट दे दी.अब जनता कर देती है, उसका एक हिस्सा सरकार पाती है बाकी टैक्स कलेक्टर. अब इसका नाम वैट हो गया है, पहले तो व्यापारियों ने इसका विरोध किया बाद में राजी हो गये. जब सरकार को वैट वसूलना है तो सरकार को हर छोटी या बडी दुकान को अपनी ओर से छपवा कर रसीद देनी चाहिये. साथ मे आधुनिक डिजिटल तकनीक का एक उपकरण देना चाहिये. रसीद पर पूर्ण विवरण होना चाहिये तथा भुगतान किए गये धन की स्लिप डिजिटल मशीन द्वारा भी मिलनी चाहिये यह मशीन हर बिक्री की की सूचना वैट विभाग को दे देगी.
जो सडक या पुल सरकार बनवाती है वह नागरिकों के धन से बनती है. टोल के नाम पर जनता से खूब वसूली होती है. जिसका दस प्रतिशत हिस्सा भी सरकारी कोष में नहीं जाता. इससे केवल ठीकेदार ही कमाते हैं यह उन्ही के लाभ के लिये वसूला भी जाता है. टोल टैक्स की वसूली तत्काल ही बन्द होनी चाहिये.

आयकर  की चक्की में मध्यवर्ग को पीसा जात है. आयकर दाता से दंड के नाम पर कर लिया जाता है तथा उसे कोई सुविधा भी नहीं दी जाती. आयकर के दायरे में आते ही उससे सुविधायें हटाई जाने लगती हैं. आयकर विभाग अपने इस दुधारी गाय को लाठी मारने के सिवा कुछ नहीं करता. उसे आयकर की सूचना तक नहीं देता. आयकर की सीमा बहुत नीचे से शुरु हो जाती है तथा १०,२०, और ३० प्रतिशत तक ही रहती है.
आयकर की सीमा  को फुटकर उपभोक्ता सूचकांक से जोड दिया जाना चहिये.
पचास लाख की सीमा तक २५% आय को बीमा, पीयफ आदि के लिये छूट दिया जाना चाहिये.
प्रत्येक आयकरदाता का समूह बीमा किया जाना चहिये, करदाता द्वारा दिये गये धन का एक प्रतिशत इस हेतु व्यय किया  जाना चाहिये और असामयिक मृत्यु की दशा में तथा अति गम्भीर रोगों की चिकित्सा में दिया जाना चाहिये.
इसे अत्यन्त सरल किया जाना चाहिये और किसी भी संस्था  को छूट किसी भी दशा में नहीं दिया जाना चाहिये.
बाकी फिर कभी.
नमस्कार.

आम आदमी और चुनाव के मुद्दे

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
२०१४ के संसदीय आम चुनाव का प्रचार जोरों पर है. मीडिया और चौपाल सभी जगह एक ही चर्चा कौन जीतेगा. किस राजदल को कौन सी रणनीति अपनानी चाहिये.
भारत के नागरिक को, भोजन, वस्त्र, आवास,शिक्षा, चिकित्सा,न्याय,सुरक्षा कैसे मिल सकेगी? कौन इसे देने की बात कर रहा है? केजरीवाल, मोदी, राहुल, मायावती, मुलायम या कोई और.
भाजपा ने कर्म्चारियों के पेंशन योजना को बिना सोचे समझे समाप्त कर दिया अभी तक उसका पूरा पूरा  समाधान नहीं हो पाया है. मोदी के विकास के माडल में पूंजीवाद ही चलेगा. भले ही उनकी माताजी घरेलू नौकरानी थी वे मजदूरों की बात नही करेंगे आज उनके प्रिय कारपोरेट घराने हैं.वे चाय जब बेचते थे तब बेचते थे अब उनके मन में गरीबों को और गरीब बनाने का सूत्र है.
वे सबको समान और गुणवत्ता पुर्ण शिक्षा देने की बात नहीं कर सकते. ्गुजरात के सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय मानक नहीं हैं. वहां के हर नागरिक को हर स्तर की अत्याधुनिक चिकित्सा की सुविधा नहीं है. वहां पर भी न्याय शीघ्रता से नहीं मिलता है.

आज भारत की जनता मूल्भूत मुद्दों पर राय जानना चाहती है.वह रोजी-रोटी, भोजन-छाजन या रोटी, कपडा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा, न्याय  ौर सुरक्षा की चिन्ता में है. इन समस्याओं का समाधान किस दल के पास है? उसका खाका बताये और जाकर जनता की सेवा करे. सता और कुर्सी केलिये ठीका पर कब्जा के लिये मुखौटा बदल कर विधायिका के रास्ते सता पर कब्जा की नीयत छीड दे.
नमस्कार!


सरकारी आवास की सीमा

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
आम आदमी पार्टी ने हर आम व खास आदमी की पहचान बदल दी है. दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री के परम्परागत आवास को छोडकर  पांच कमरेवाले मकान को रहने के लिये् चुना तथा साथ वाले पांच कमरेवाले आवास को आवासीय कार्यालय बनाने के लिये . उनके इस निर्णय ने हलचल मचा दी है. अरविद के परिवार में छह सदस्य हैं. वे बताते हैं कि  उनका इस समय का घर भी चार कमरे का है. यनडीटीवी के पत्रकार ने सम्भवतः टिप्पडी की थी कि बडे मकान वालों को मुख्यमंत्री का यह निवास बडा लगता है. आम आदमी पार्टी के घोषडा पत्र में है कि वे बंगला और मंहगी गाडी नही लेंगे. एक नामी पत्रकार ने लिखा है कि पहलेवाली मुख्यमंत्री जी का बंगला भी टीवी पर दिखाया जाना चाहिये. इस समय सादगी और केजरीवाल के बंगले पर राष्ट्रीय बहस चल रही है.

इस बहस  ने मेरी स्मृति में बसी बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दशक में ्चर्चित बहस को सामने ला दिया जिसमें राष्ट्रपति भवन, सरकारी तामझाम, तोपों की सलामी आदि पर चर्चा हुआ करती थी. लोकतंत्र की स्थापना के बाद लोगों के दिमाग में  सिंहासन,  राज , सत्ता तख्त आदि अभी तक बसे हुये हैं. इसे समाप्त करने के महात्मा गांधी के सलाह को कोई महत्व न देते हुये दिल्ली में उनकी समाधि बनाकर उस पर इतना व्यय किया जाता है कि बाकी सभी लोगों  पर हुये  व्यय को न्यायपूर्ण सिद्ध किया जा सके.

जब यह बहस चल रही है तो यह तय जाना चाहिये कि भारत के राजनैतिक और प्रशासनिक लोकसेवकों को किस स्तर का कितने क्षेत्रफल का आवास दिया जाना चाहिये. भारत में प्रत्येक स्थान पर इसी मानक का उपयोग किया जाना चाहिये. ऐसा करने पर प्रत्येक स्थान पर भरपूर मात्रा में सरकारी जमीन खाली होगी, जिस पर तमाम कार्यालय, विद्यालय और कर्मचारियों के आवास बनाये जा सकते हैं. जितना बडा शहर हो भवन की ऊंचाई उतनी ही बढाई जाय.इस बात पर  बहुत से लोग यह प्रश्न उठायेंगे कि वर्तमान भवनों का क्या किया जायेगा. सभी जानते हैं कि इनमे से अधिकांश भवन अपनी आयु पूरा कर चुके हैं. जो  काम लायक हैं वे भी साम्राज्यवाद की मानसिकता को ही बनाते हैं. अभी कुछ दिनों पूर्व संसद भवन की आयु को लेकर प्रश्न उथे थे, आज के सरकारी लोगों को इन्हें नष्ट करने का मन नहीं करता. ये लोग अग्रेजों के बनाये भवनों और कानूनों इतर नहीं जाना चाहते हैं.

नई दिल्ली की सरकारी इमारतें जितनी जमीन घेरती हैं उतनी जमीन में आज की तकनीक से भवन और आवास बनाये जाय तो तमाम समस्याओं का समाधान मिल सकता है. सबसे बडी आवश्यकता है कि जनता मैदान की जहां जनता अपनी बात कह सके उसे जंतर मंतर पर सीमित कर दिया गया है. दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के पूरे क्षेत्र में आधुनिक तकनीक से नियोजित बहुमंजिले भवन बना दिये जांय. पूरा लुटियन क्षेत्र बहुमंजिले भवनों का बना दिया जाय तो अनेकानेक समस्याओं का समाधान निकल आयेगा.

नमस्कार.


Saturday, January 4, 2014

आप ही आप

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बन गयी. आम आदमी खुश है. आआप  के रथ को रोकने के कुछ तिकडमी प्रयास किये गये. रथ को २०% पहले रोक भी लिया गया. अभी आम आदमी भीड का हिस्सा ही बना रहना चाहता. अपने मत को हारते देखने से पहले ही रास्ता बदल लेता है. इसका मुख्य कारण निर्णय लेने के लिये आवश्यक मुद्दों का अभाव. बहुमत के अभाव में ही सही भाजपा, कांग्रेस और मीडिया ने हुरपेट कर केजरीवाल को फंदे में लेना चाहा किन्तु उन्होंने जनता से पू्छने का आइडिया लेकर इन तीनों के मंसूबे पर पानी फेरकर सरकार बनाकर बहुमत भी सिद्ध कर दिया.
अब कोठी और कार का कलह उपजा है. प्रशासनिक लोकसेवक भारत में अपना प्रभुत्व बनाने के लिये मंत्रीगण को तमाम सुख सुविधायें उपलब्ध करा देते हैं, प्रलोभन, के तमाम स्वरूपों का उपयोग कर इन्हें जनता से दूर और आरामदेह जिन्दगी जीने का आदती बनाकर अपना काम करा लिया जाता है. करोडों, अरबों के कारोबार में आदर्शों के नशे हिरन हो जाते हैं. इन लोगों पर सभी प्रकार के साम, दान, दण्ड और भेद के हथियार उपयोग में लाये जायेंगे. जनता से संवाद करते रहने और सचेत रहने से तथा निरंतर सुधार करने की आदत रहेगी तो निखार ही आयेगा.
जनसेवा का कार्य वानप्रस्थ आश्रम या सन्यास आश्रम से ही चल सकता है. अर्थात जो भी जनसेवा करना चाहेगा उसे परिवार और परिजन के सुख से वंचित होना पडेगा. विधायक हो मंत्री सबको एक समान ही आवास की आवश्यकता है. आवास को आफिस मत बनाइये. कार्यालय का काम कार्यालय में ही कीजिये. जनता से  कार्यालय या  सचिवालय में ही मिलिये. लेकिन मिलिये अवश्य. प्रेस से भी मिलिये. ऐसी तकनीक बनाइये कि जनता को अपनी बात कहने के लिये आपके पास जाने  की जरूरत ही कम पडे. ईमेल से आवेदन मंगाइये और समस्या का निपटारा कीजिये.
भारत की जनता में त्याग को बडा माना गया है अभी भी उसका महत्व है. आआपा के प्रत्येक सदस्य अब राडार पर है. इसपर आपको सचेत रहना पडेगा. इस समय जो भी दशा चल रही है
भारत के स्वतंत्र होने के बाद से ही चर्चा चलती रही कि साम्राज्यवाद के अवशेषों का समापन कर दिया जाय किंतु हर बार जनता धोखा खा जाती है. बहुत दिनों  तक बहस चली कि राष्ट्रपति भवन से लेकर समस्त तामझाम में लोकतंत्र की आत्मा मर जाती है. एक बार बडा फैसला लेकर लुटियन दिल्ली को तहस नहस कर सभी सांसदों, विधायकों मंत्रियों केलिये बने हुये भवनों कोध्वस्त करना ही होगा.
देश के बहुत से लोग सांस थामे आआप की सफलता चाह्ते हैं तथा यह भी चाह्ते हैं कि मंत्रीगण इत्नी सादगी से रहें कि कोई भी जल्दी मंत्री न बनना चाहे.
नमस्कार.