Tuesday, January 21, 2014

राजनिति का धरना

नमस्कार!
हालचाल ठंढा है और राजनीति गरम है.
भारत देश में मोहन दास गांधी के नाम पर राजनीति  करने वाले असीमित हैं, अनुगामी बहुत कम. राम, कृष्ण, बुद्ध को भी पूजने वाले बहुत हैं अनुगामी बहुत कम. इस देश में गांधी के रास्ते अपनी बात रखनेवाले को कांग्रेस मार ही देना चाहती है. क्योंकि वह गांधी के नाम पर वोट लेना मात्र चाहती है. नेहरू, फिरोज की विरासत वाले भी गांधी कहलाना चाहते हैं.
जब कोई गांधी के मार्ग पर चलकर भारत के किसी समस्या का समाधान करना चाह्ता है तो भारत की सरकार बहुत तेज विरोध करती है. सरकार मानती है कि इस तरह से जनता कि हर आवाज सुनने से जनता का मन बढ जायेगा और वह उन सारे अधिकारों को मांगने लगेगी जो उसे मिलना चाहिये.
राजा को ईश्वर का रूप मानकर जीनेवाली जनता अभी भी विधायक, सांसद और मंत्री को उसी रूप में देखना चाहती है. आप कल्पना कर सकते हैं कि  भारत के किसी कार्यालय में प्रथम श्रेणी से लेकर चतुर्थ श्रेणी तक के कर्मचारी बैठ कर बात कर सकते हैं. ब्राह्म्णवाद को गाली देनेवाला अधिकारी भी ऐसा नहीं करना चाहता.
ईरोम गांधीवाद में विश्वास करती हैं. शिन्दे लाठीवाद में.
भारत में कितनी और कैसी पुलिस होनी चाहिये इसपर आयोग तो बन जायेंगे, अनुपालन कभी भी नहीं होगा. पुलिस के मारल या उच्चाधिकारियों के माल का सवाल पर जनता को भुगतने के लिये छोड दिया जाना चाहिये.
दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री और मंत्री धरना पर हैं,  चार थानेदारों का निलम्बन/ स्थनान्तरण कराना चाहते थे. दिल्ली के पुलिस कमिश्नर और गृहमंत्री इसके लिये तैयार नही हैं. भारत सरकार के गृहमंत्री इतनी सी बात को न होने देने के लिये कई हजार लोगों को दिल्ली की बरसाती, बर्फीली ठंढ मे रहने के लिये मजबूर कर दिया है. दिल्ली पुलिस के काम काज और प्रणाली को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों के प्रांतीय नेता पहले से ही आवाज उठाते रहे हैं. अभी कुछ दिनों पूर्व दिल्ली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रदर्शन करने गये थे. दिल्ली एक खतरनाक जगह बनती जा रही है. इसके लिये दिल्ली पुलिस को अत्याधुनिक आधारभूत संरचना और जनबल चहिये.
इतनी सी बात को लेकर मुख्यमंत्री को धरना पर बैठना चाहिये या नहीं, केजरीवाल को  सरकार चलाने आता है या नहीं. कांग्रेस ने केजरीवाल को दिल्ली में बांध दिया है केजरीवाल ने कांग्रेस को बौना बना दिया है. एक बात है कि केजरीवाल सत्ता के लोभी नहीं.
केजरीवाल के शपथग्रहण समारोह ने ही उन्हें देश में १०० रैलियों से मिलने वाली प्रसिद्धि दिला दी. यह कबीरपंथी या कहिए अरविन्दपंथी आन्दोलन करते रहना चाहता है. लोकतंत्र और जनाधिकार को नये ढंग से सोचने का समय आ गया है.
गांधीवादी लोगों के लिये सरकार ने जंतर मंतर पर एक सडक को निर्धारित कर दिया है. गांधी के नाम पर दिल्ली में वायसरीगल हाउस को मटियामेट कर गांधी मैदान बना दिया जाना चाहिये जहां देश की जनता रैली धरना और प्रदर्शन कर सके. लोकतंत्र  का हथियार रैली धरना और प्रदर्शन ही है. घेराव और धरना सम्बन्धित व्यक्ति के कार्यालय पर  ही होना चाहिये. दिल्ली के लोग पंचसितारा लाभ लेना चाहते हैं तो धरना प्रदर्शन की आवाज को भी सुनना पडेगा.
देश की पूरी राजनीति इस धरने के इर्द गिर्द घूम रही है. मौसम धरने के साथ नहीं है. कांग्रेस और भाजपा विकल हैं. हरदम अपने प्रतिद्वन्दी का विरोध करना ठीक नहीं. राजनीति जनहित के लिये है. प्रत्येक राजदल को जनहित में जनता को मजबूत करना चाहिये. उसे वह सभी अधिकार मिलना चाहिये जो लोकतंत्र में आवश्यक  है.
काश देश का मीडिया जनता की हर आवाज के साथ खडा रहता तो शायद सब पढ रहे होते. सभी को एक समान चिकित्सा मिल रही होती. सभी को शीघ्र न्याय मिल रहा होता. नीचे से ऊपर को जाती थैलियां रुक जाती. ऊपर से आता भ्रष्टाचार रुक जाता. सेवा आयोगों द्वारा पैसा लेना और अंगूठा काटना रुक जाता.
नमस्कार.

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