Saturday, December 23, 2017

तिहवार के खुशी

नमस्कार,

हालचाल ठीक बा. बड़ा दिन आवता।  इस्कूलन में छुट्टी हो गईल. बड़ा दिन की बाद सन २०१८ आई. बड़का दिन अंग्रेजी स्कूलन में धूम धाम मनावल जाला. जबसे टीवी नामके टीबी देश में आ गईल तबसे बड़का दिन आ नवका साल सभे मनावे लागल। डायरी, कलेण्डर आ बहुत कुल उपहार बटाईल शुरू हो गईल बा.

केक, पेस्ट्री, चॉकलेट की दिन में गुड़, महिया, राब, पट्टी, लाई के के पूछी. १४ जनवरी के खिचड़ी नाम के तिहवार पड़ेला ओहि दिन के व्यंजन खिचड़ी, लाई, दही, अचार,घी, पापड़ ह. गवई ज़माना में लाई खिचड़ी से बहुत पहिले ही बने लगत रहल ह. बड़की बड़की लाई बान्हल भी कला रहल आ ओके खाइल भी. लेकिन जब हम दुमहला तिमहला बरगर लोगन के खात देखलीं त लाई के आकार की बारे में सोचल बंद क दिहनी।

गाँव से जब शहर/ कस्बा में रहे मोका मिलल त रेवड़ी आ गजक से परिचय भईल. तिल के लाई खाये के आ छूएके (दान) खिचड़ी के जरूरी काम रहे. देहात में लोग माघ में काला तिल ना कीनेला ऐसे माघ की पहिले ही तिल कीन लिहल जात रहल. धीरे धीरे लाई गायब होखे लागल आ रेवड़ी गजक आ भाँति भांति  के डिब्बा बंद लाई गजक मिले लागल।

 खिचड़ी के डिब्बा बंद  नवका सामान में विविघता त बा बाकी बुझाला की सोंधाई आ स्वाद दुनू गड़बड़ा गईल बा. चाउर, चिउरा, चना, मकई, साँवा, कोदो, उजरका तिल, करिका तिल आदि के लाई सब केक पेस्ट्री के कान काटे वाला लागत बा. लाई की पाग में अदरक आ तिल परि  जाई आ पाग ठीक उतरि जाई त सवाद बनि जाई।  हर घर के लाई सवाद भी अलग अलग रहत रहल.

जाड़ा से डर छोड़ी के लोग माघ भरि स्नान दान करेला। त मन भर केक खाई सभे, नवका साल मनाई सभे, लाई बनाई, गजक खाई, घीव खिच्चड़ खाई सभे, उत्सव मनाई खुश रहीं , ख़ुशी बाटीं ,खिचड़ी बाटीं, लाई बाँटीं आ पार लागे त माघ भर नहा के दान देई।

बड़का दिन, नवका साल आ खिचड़ी की सन्ति शुभकामना.

पढ़ले खातिर धन्यवाद.

फेरू भेंट होई।

Thursday, September 8, 2016

फ्लेक्सी किराया बनाम पाकेटमारी उर्फ़ कालाबाजारी

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. भादों का महीना चल रहा है. वर्षा और बाढ़ के साथ कहीं कहीं सूखा भी पड़ा हुआ है. कल रेल विभाग ने कुछ फ्लेक्सी किराया का फार्मूला बनाया है. रेल विभाग कहता है कि उसे घाटा उठाना पड़ रहा है. पिछले तमाम वर्षों से रेल किराया में बजट के समय वृध्दि नहीं की जाती है और बाद में विविध तरीकों से पैसा उगाहा जाता है.

जेब कतरा, लुटेरा और भिखारी तीनों धन लेते हैं किन्तु तरीका भिन्न है .अर्थ व्यवस्था उदार हो रही है. अर्थ व्यवस्था को उदार बनाने के लिए सरकार को कड़े फैसले लेने पड़ते हैं. इसलिए लूटने और ठगने और कालाबाजारी करने के उदारीकृत नाम खोजे गए हैं. इन्ही में से एक है फ्लेक्सी रेल  टिकट.

प्रभु जी यदि रेल पैसा कमाना चाहती है तो प्रत्येक रूट पर नयी ट्रेन चलाये. इस ट्रेन का किराया मनमानी रखिये किन्तु सबके लिए एक रखिये. अधिकतम दस दिन पहले टिकट दीजिये. रेल किराया प्रति किमी की दर से लीजिये और फ्लेक्सी किराया काऔसत निकाल कर सबको एक समान दर पर टिकट दीजिये. ट्रेन के आधे डिब्बे स्लीपर और आधे चेयर कार वाले रखिये. परिचालन व्यय से कम का तो सवाल ही नहीं कम से कम पचास प्रतिशत लाभ पर चलाइये. जैसे जैसे मांग बढ़े वैसे वैसे ट्रेनों की संख्या बढ़ाइए. अगले बजट में जनता  को साफ़ साफ़ खर्चा बताकर यात्री किराया किमी की दर पर कीजिये.

भारत की जनता भारतीय रेल को स्वच्छ , सुन्दर और आधुनिक  देखना चाहती है इसलिए कुछ दिन के लिए बुलेट  ट्रेन पर  पैसा खपाने का काम रोककर एक सौ बीस  करोड़ जनता के लिए काम कीजिये . पांच करोड़  मलाई दार जनता के लिए बाकी  जनता को पीसना बंद कीजिये. संगठित पाकेटमारी बंद होनी चाहिए. रेल और मोबाइल दोनों ही इस काम में जुटे हैं.

नमस्कार
फिर भेंट होगी.

Tuesday, April 12, 2016

स्वर्ण-उत्पाद पर कर

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. कई दिनों  से पछुआ तेजी पर है. यूपी आग से त्रस्त है. सूखा भी है. कुछ प्रदेशों में सूखा से पानी का भयंकर संकट है. कई प्रदेशों में चुनाव हो रहे हैं . चुनावी जुमलेबाजियाँ भी चल रही हैं. भारत राज-दल संकट से गुजर रहा है. पूरी राजनीति को कुछ परिवार (संघ-परिवार) को शामिल करते हुए चला रहे हैं. वाम-दल सठिया गए हैं. उन्हें भी विधायिका की कुर्सी का चस्का लग गया है. युवा चापलूसी और चमचागीरी में लगे हैं. किसी भी दल में वास्तविक लोकतंत्र नहीं है. दलों की कार्यकारिणी में सठिया गए लोगों की कुटिल नीति चल रही है. मोदी ने साहस किया और सफल हुए. अन्य दलों में युवा अपना रास्ता बना नहीं पा रहे हैं. इसका सबसे बड़ा कारण राजनीति के लाभ हैं.

ऐसे राजनैतिक परिवेश में स्वर्णकार उत्पाद-कर/एक्साइज ड्यूटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं और भाजपा  को छोड़कर सभी राजदल विरोध में हैं. भारत में योजनाओं के मूल्यांकन पर समीक्षा नहीं होती तात्कालिक मत-लाभ के आधार पर अपना तर्क दिया जाता है. असली भुक्तभोगी उपभोक्ता मौन तमाशा देखता है क्योंकि वह अपने नेता/राजा पर आँख मूंदकर विश्वास करता है.

कुछ वर्षों पहले कृषि  पर आयकर लगाने की बात उठी थी संसद में खूब विरोध हुआ, भारत के सामान्य किसान भी हाहाकार करने लगे. तब मेरी समझ में जो बात आई थी उसकी पुष्टि अभी कुछ दिनों पूर्व खेती के नाम पर आयकर की चोरी और कालाधन के सृजन के खुलासे से पुष्ट हुई है. भारत में बहुत सारे खुले रहस्य हैं.

लगभग पंद्रह वर्ष पहले आयकर का रिटर्न भरने के लिए मित्र गण एक अधिवक्ता मित्र के पास बैठे थे. कर पर चर्चा करते हुए और हम लोगों के  पेटकटाऊ आयकर पर आह भरते हुए उन्होंने कई ठेलेवालों का नाम लेकर बताया की उनकी आमदनी हमलोगों से अधिक है. ऐसी दशा में मुझे उत्पाद कर लगने से कोई आपत्ति नहीं है. छोटे से दुकानदार से लेकर बड़े उद्योग सभी का पंजीकरण होना चाहिए. सभी उत्पाद गुणवत्तापूर्ण होने चाहिए. हरेक बिक्री पर पक्की रसीद मिलनी चाहिए.

जिस संस्थान में दस से अधिक कर्मचारी हों तो पीयफ नियम लागू होगा. नौ होंगे तो भाड़ में जाएँ. ऐसी स्थिति में हर संस्थान के कर्मचारी को पी यफ का लाभ मिलना चाहिए. प्रत्येक का आनलाइन पंजीकरण होना चाहिए. उत्पादकर, बिक्रीकर/वैट/जीयसटी का पंजीकरण भी आनलाइन होना चाहिए. सरकार कर प्राप्त करती है इसलिए कर के रख रखाव और रसीद की छपाई का दाम निर्धारित कर में से वापस मिलना चाहिए. जो व्यक्ति या संस्थान जितना कर दे उसके अनुपात में सामूहिक जीवन बीमा और सामग्री बीमा होना चाहिये जो व्यक्ति या संस्थान को मिलना चाहिए.

लोग कहते हैं कि इन्स्पेक्टर राज का समापन होना चाहिए. नाम बदल दीजिये कर सहायक नाम दीजिये. अगर राजदल चुनाव चन्दा के नाम पर वसूली बंद कर दें, मंत्रियों  और अधिकारियों को भेंट देना बंद हो जाय तो इस्पेक्टर  राजा से सहायक हो जायेंगे.

कर से किसी दस्तकार पर संकट नहीं आने वाल है. यदि कर उपयक्त हो अनुचित नहो. कर कराधान के बहाने हप्ता वसूली न हो. आखिर सभी करों का बोझ तो अंतिम क्रेता ही भुगतता है.

धन्यवाद! फिर भेंट होगी .
नमस्कार.

Thursday, July 30, 2015

गरमागरम-१

नमस्कार!

हालचाल ठीक ही है. कई दिन से तेज धूप हो रही है. देश में राजनीति गर्मी पर है. पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब नहीं रहे. भगवान उनकी जैसे मृत्यु सबको दें. कर्मयोगी को लोगों ने राजनीति में लाया. उनका व्यक्तित्व और निखरा. "जस की तस धर दीनी चदरिया'' जीवन में ऐसा बनना कठिन है. पूर्व राष्ट्रपति के मृत्यु पर एक राजनयिक परिपाटी / प्रोटोकोल होता है उसका पालन हुआ. उनकी सक्रियता ने उनको जनता से जोड़े रखा. आगे उनके जैसे या उनसे भी अच्छे राष्ट्राध्यक्ष मिलें तो भारत का भविष्य शुभ रहेगा.

आज का दिन कुछ गड़बड़ है. आज ही कलाम साहब को उनके पैत्रिक निवास रामेश्वरम में दफनाया गया और आज ही सबेरे एक ऐतिहासिक फांसी भी दी गयी याकूब मेनन की फांसी.

फेसबुक पूरे समाज का दर्पण है. बहुत सारे लोग एकदम नंगई पर उतारू रहते हैं. दुनिया का हर मानव अपने को सर्वोच्च मानता है. इसलिए वह प्रयास भी करता है. विडम्बना यह है कि  कोई सफल नहीं हो पाता . भगवान भी नहीं. पता नहीं विश्व में कितने भगवान हैं. मानव की दूसरी मजबूरी यह है कि वह अकेले नहीं रह सकता . समाज में आने के बाद समाज में जीने मरने के अपने नियम भी हैं. हम समाज के नियम और अपने नियम से संघर्ष करते रहते हैं. इस संघर्ष के चलते हमने गुणवता पूर्वक जीने के कुछ मानक भी बना लिए हैं. हमारे स्वार्थ इन मानकों से टकराते रहते हैं . हम इन्हें तोड़ते रहते हैं किन्तु साथ में यह भी चाहते हैं की सभी हमारे हर काम को पसंद भी करें.

याकूब ने बम लगाने की योजना क्यों बनाई? उसका कोई खास संबंधी तो दंगे में नहीं मरा था. जिस व्यक्ति का नाम आ रहा है उसका तो वसूली और रंगदारी का धंधा है. इस काम के बहाने एक समुदाय के लोगों का साथ भी मिल गया और धंधा आगे चमकाने की गारंटी भी मिल गयी.

विभिन्न देशों के कर्ता धर्ता जब मिलते हैं तो आतंकवाद पर घडियाली आंसू बहाते हैं , तथा हर क्षण विश्व में धमाके होते रहें इसका प्रबंध/पोषण करते रहते हैं. मानवाधिकार और विश्वबंधुत्व के मुखौटों के पीछे हमारी दूसरों को समाप्त कर देने की इच्छा कुलबुलाती रहती है. जब भी अवसर मिलता है बाहर निकल जाती है.

एक सामान्य नागरिक देश के हर खम्भे पर विश्वास करने को मजबूर है. इसके अतिरिक्त वह कुछ नहीं कर सकता है. यदि थोड़ा भी विचलित हुआ तो ये खम्भे ही खा जायेंगे. जब उसे इन खम्भों का भय नहीं रहता या कोई खम्भा साथ देता हुआ लगता है तो वह खुश हो जाता है. बाकी ट्रेन में चौपाल में हर रोज भुक्तभोगी और लाभभोगी दोनों या तो रोते या डींग हांकते मिल ही जाते हैं.

न्याय गणित के सूत्र जैसा वस्तुनिष्ठ नहीं है. जब न्यायालय में दो न्यायाधीशों की बेंच बनती है तो मुझे कुछ अटपटा लगता है. बेंच तो एक, तीन, पांच जैसे  विसम संख्या की ही होना चाहिए. अथवा सम संख्या होने और मतभेद होने पर तत्काल एक दूसरी बेंच बननी चाहिए. न्याय तो सर्वमत से ही होना चाहिए. यदि सर्वमत नहीं है तो कानून में संशोधन होना चाहिए. किसी भी निर्णय को नजीर नहीं बनाया जाना चाहिए. नजीर बनाने के लिए कम से कम पांच जजों की बेंच का सर्वमत निर्णय होना चाहिए जो स्पष्ट रूप से उल्लेख कर सके. अभी तक न्यायालय अपने निर्णयों पर स्वत: शोध नही कराता है. विधि मंत्रालय में न्याय के विकास के लिए निरंतर शोध होना चाहिए.

न्यायालय और तारीख में बहुत निकट का सम्बन्ध है. भारत के तमाम विधिवेत्ता ऐसी प्रक्रिया का विकास नहीं कर सकें है जिससे पूरा न्याय का कार्य एक निर्धारित सीमा में पूरा हो जाय.

भारत के जितने भी लोग न्याय के क्षेत्र में एक्टिविस्ट के रूप में काम कर रहे हैं तत्काल न्यायाधीशों की नियुक्ति जनसंख्या के अनुपात में कराने के लिए जनचेतना के लिए सक्रिय हो जाय. सभी को न्याय के लिए भौतिक दूरी से भी मुक्ति मिलनी चाहिए. न्याय जनता के लिए है तो उसे जनता के पास ही जाना चाहिए.

सभी को न्याय मिले .
नमस्कार.


Sunday, July 26, 2015

तीस्ता सीतलवाड़

तीस्ता सीतलवाड़ 

नमस्कार! 

हालचाल  ठीक  है. इस क्षेत्र में सूखा अधिक और वर्षा कम है. तिलहन इस समय कम बोया जाता है . तिल और अरहर दोनों को नीलगाय पसंद करते हैं. ये जंगली जीव अबध्य हैं. अत: मोदी जी के मन की बात अच्छी  कैसे लगाती. मोदी जी की बात तीस्ता को भी अच्छी नहीं लगती है. अत: उनकी जांच सीबीआई कर रही है. लोग कहते हैं  कि इसी सीबीआइ की जांच के लिए धरना प्रदर्शन और कोर्ट कचहरी सब होता है तो तीस्ता की जांच से लोग क्यों परेशान हैं?

आज के जनसत्ता नामक अखबार में "अपूर्वानंद " का एक लेख पढ़ा तो तीस्ता के कार्य का महत्व प्रकट हुआ. फिर २४ जुलाई के इन्डियन एक्सप्रेस के लखनऊ संसकरण में "जूलियो रिबेरियो" का लेख "साइलेंसिंग तीस्ता"  पढ़ा. ( देवरिया में यह अखबार दो दिन बाद आता है ) 

अपनी स्वतंत्रता और निर्भयता पर हरदम प्रश्न उठता रहता है. भारत में कितना लोकतंत्र है यह भी दिखाई देता रहता है. तमाम ऐसे लोग जो सत्ता से टकराते हैं उनका हाल भी दिखाई देता रहता है. भारत के  राजदल  जब लोकतंत्र की हत्या रोज ही करते हैं. फिर भी भारत को सबसे बड़ा लोकतंत्र ( सबसे अच्छा नहीं ) कहते रहते है. ऎसी स्थिति में तीस्ता की जांच और जेल दोनों ही अवश्यम्भावी हैं. चाटुकार यनजीओ जय हो में लग गए हैं. 

भारत में प्रत्येक प्रदेश में पुलिस के कार्य में राजदल  पूरा पूरा हस्तक्षेप करते हैं. यह भी कहते रहते हैं कि कानून अपना काम करेगा. पुलिस, प्रशासन व् सत्ताधारी राजदल के सम्बन्ध जनता खूब जानती है. किन्तु एक क्षीण आशा सीबीआइ से बन जाती है. अब तक के अधिकाधिक प्रकरणों में संदेह ही बढ़ा है. 

भारत में एक अंतर-राज्यीय पुलिस व खुफिया पुलिस  की आवश्यकता है, जिसका गठन और परिचालन राज्यों के मुख्यासचिवों के एक पैनल के द्वारा किया जाना चाहिए.एक समय में पांच राज्यों के लाटरी से चुने गए मुख्यासचिवों को रखा जाना चाहिए. 

देश के सेवानिवृत्त लोकसेवक, पुलिससेवक, और न्यायसेवक मिलकर तीस्ता और तीस्ता जैसे लोगों की न्याय की लाड़ाई में सम्मिलित हो जाय तो तीस्ता और एनी जागरूक नागरिकों को न्याय मिल सकेगा.

नमस्कार. 

Sunday, April 5, 2015

लोकतंत्रः आकाश कुसुम

लोकतंत्रः आकाश कुसुम
नमस्कार!
हालचाल ठीक है. जबसे आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्य कारिणी की बैठक हुई तबसे भारत के लोकतांत्रिक संस्थाओं के कार्यकलाप सामने आते चले जा रहे हैं और मन में यह बात बैठती जा रही है कि भारतीय जनमानस में लोकतंत्र व्यवहार से बहुत दूर है. हम लोकतंत्र के मूल्यों को आत्मसात ही नहीं कर पाये हैं.

छोटी या बड़ी कोई भी लोकतांत्रिक संस्था प्रारम्भ से ही व्यक्तिवाद से ग्रस्त हो जाती है और हम अभिभूत हो चरणवन्दना में लग जाते हैं और तब तक लगे रहते हैं जबतक व्यक्तिगत हानि नहीं हो जाती है. छोटी संस्थाओं में सर्वमत से प्रस्ताव पारित होते रहते हैं क्योंकि एक व्यक्ति को छोड़कर अन्य को उससे प्रायः कोई मतलब ही नहीं होता है.

हमारी सबसे बड़ी संस्था में सांसद कितनी बार अपने विवेक के आधार पर अपना मत देता है. हमारे जन प्रतिनिधि को सभी बिलों के बारे में बोलने का अवसर भी नहीं मिलता है. सामान्यतः वह राजदल के लिये एक मत बनकर जाता है. निर्णय तो राजदल के सुप्रीमों तय किये रहते हैं.

प्रत्येक राजदल कुछ विशिष्ट सदस्यों को आजीवन अभिजात्य बना देता है. कुछ लोग नया दल बना लेते हैं आजीवन उसको चलाते हैं उसके बाद उनकी संततियां उसपर अधिकार प्राप्त कर ले ती हैं. जहां ऐसा नहीं होता वहां भी राजदल के निर्णय गुप्त मतदान द्वारा नहीं होते.

आम आदमी पार्टी के गठन के साथ यह विश्वास बन गया कि यह राजदल लोकतंत्र के हर कसौटी पर खरा उतरने का प्रयास करेगा किन्तु शीघ्र ही यह अरविन्द और दिल्ली के विधायकों द्वारा स्थापित कसौटी की ओर चलने लगा. आज अरविन्द केजरीवाल यह मान रहे हैं कि मात्र उन्हीं के कारण यह दल बन गया. अब उनको यह नहीं याद आ रहा है कि पता नहीं कितनों ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया.

समता, वन्धुता और वस्तुनिष्ठता के बिना लोकतंत्र नहीं हो सकता. जबतक ऐसा नहीं होता तबतक और चाहे जो कुछ हो लोकतंत्र नहीं हो सकता.

१४ अप्रैल को कुछ लोग लोकतंत्र के बुझे हुये दीप को पुनः जलाने जा रहे हैं. उन्हें सफलता मिले. उसमें आनंद कुमार और योगेन्द्र भी होंगे. उनसे निवेदन है कि समाजमिति विधि से कार्यसमिति का चयन करें. एक प्रयोग इस विधि का भी होना चाहिये.

नमस्कार.

Saturday, November 15, 2014

शहर से शिक्षा

शहर से शिक्षा

नमस्कार!

हालचाल ठीक है. जिसे गुलाबी जाड़ा कहते हैं अब बीत गया. अखिल भारतीय शिक्षा संघर्ष यात्रा -२०१४ पथ पर है. बाल दिवस बीत गया. फोकस मे नेहरू और मोदी आ गये हैं. आज  भारत मे लोकतंत्र को सशक्त बनाने, सभी भारतीयों के जीवन सतर को जीने लायक बनाने के लिये आवश्यकताओं को क्रम से रखने में सबसे पहले तो बालक ही आयेंगे. उन्हें स्वस्थ और शिक्षित बनाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है. लोकतंत्र में सरकार जनता के धन से व्यवस्था करने का कार्य करती है किन्तु सरकार की प्राथमिकता में राजदल को सत्ता में बनाये रखना पहली प्राथमिकता हो जाती है इसके लिये जनता के धन को  पानी जैसे बहा दिया जाता है. सत्ता सुख सदा बना रहे इसके लिये आगे के लिये आय के स्रोत बनाने के लिये तमाम तरह के कार्य किये जाते हैं. जनता एक सीमा तक इसे उचित मानने के लिये विवश भी है और विवशता में कुछ खुर्चन पाकर संतुष्ट हो जाती है.

नवम्बर २०१४ की "कादम्बिनी " सामने है...क्योंकि शहर एक सपना है यही प्रतिपाद्य है इस अंक का. जुलाई अगस्त में कई शहरों को देखने का अवसर मिला. गांव में जन्म हुआ. तब गांव में प्रसव कराने के लिये, हल चलाने वाले की पत्नी या मां आती थी. हल्दी, बीरो, दूध और मालिश के सहारे जच्चा बच्चा रहते थे. स्कूल जाने का समय आया तो गांव की जिला परिषद द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालय मिला. मिट्टी की दीवार का खपरैल विद्यालय लगभग गिर चुका था. किन्तु हर कक्षा के लिये एक अध्यापक थे. प्रधानाध्यापक पंडित राज किशोर तिवारी ठीक समय पर विद्यालय पहुंच जाते थे. पेंड़ों के नीचे कक्षायें चल जाती थीं एक पक्का कुआं  भी था. पीटी भी होती थी और शनिवार को बालसभा भी. इस लिहाज से मैं एक गंवार आदमी हूं. तमाम विद्वानों के अनुसार मुझे उसी गांव में बने रहना चाहिये था. मेरे पिताजी जिन्हें मैं बाबूजी कहता था नौकरी तो बाहर करते थे किन्तु गांव में ही रहना चाहते थे. यहां तक कि जब देवरिया में नई कालोनी बस रही थी तो मित्रों द्वारा जमीन लेने के सलाह को ठुकारा दिये और उन लोगों के जमीन लेने के निर्णय की आलोचना भी करते थे. किन्तु १९८१ में उन्होंने देवरिया नगरपालिका क्षेत्र में जमीन लेकर आवास बनवा लिया. इस प्रकार मैं नगरवासी बन गया.

देवरिया नगर भी कई गांवों से मिलकर बना है और लगातार विस्तृत होता जा रहा है. हर कस्बा, नगर और महानगर लगातार बढ़ रहा है. अनियोजित ढंग से बढ़ रहा है. नगर का बढ़ना विकास की परिभाषा में भी आता है. गांव में रहकर कौन गंवार बना रहना चाहेगा. यह अवश्य है कि अनियोजित विस्तार के कारण महानगर भी नरक बन चुके हैं इसके लिये सारा दोष दूसरे प्रदेशों से आये कामगारों को दिया जाता है.

मैं अपनी बात स्पष्ट करने के लिये गाजियाबाद के वसुन्धरा कालोनी को लेता हूं जहां अगस्त में एक सप्ताह रहने का अवसर मिला. सड़क, फुटपाथ, और नाली सार्वजनिक ही बन सकती है और उसे साफ करने का उपाय भी सार्वजनिक ही हो सकता है. इस कार्य को संपन्न करने के लिये नगरपालिका ही जिम्मेदार है और उसे यह जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिये. वसुन्धरा में मुझे यह देखने को नहीं मिला. जो लोग भी रहते हैं उनकी तमाम आवश्यकतायें होती है. उन आवश्यकताओं को पूरा करने वाले लोग कहां रहेंगे इसके बारे में योजनाकारों ने नहीं सोचा. घरेलू सहायिका, परिधानशिल्पी, परिधानसंरक्षी, आटोचालक, सुरक्षाकर्मी, वाहनचालक, जलसंसाधन संरक्षक, विद्युत संरक्षक, आदि आदि के लिये भी वास स्थान बनना चाहिये था , नहीं बना तो आधारभूत काम करनेवाले झुग्गियों में रहते हैं. वे उतना अपराध नहीं करते जितना ह्वाइट कालर क्राइम होता है. वे नाली में नहा लेते हैं, कूड़े में रह लेते हैं ताकि कालोनी वाले सुख से जी सकें.

स्मार्ट सिटी चर्चा में है. धनी लोग उसमें रहेंगे सब कुछ स्मार्ट होगा लेकिन रहेगा तो आदमी ही. उसे सेवक चाहिये, अत्यधिक उत्पादित कचरा को किनारे लगाने वाले लोग चाहिये.

शहर में लोग व्यस्त हैं क्योंकि कार्यस्थल पर पहुंचने के लिये चार घंटे से अधिक समय चाहिये. हर कार्यालय, और उत्पाद्शाला तथा कार्यशाला आदि में कार्य करनेवाले यदि अपने कार्यस्थल के बिल्कुल समीप रहें तो आवागमन और जाम की समस्या से मुक्ति मिल सकती है. राजदल के लोग चुनाव के समय हर आवश्यक नियम को अपने सत्तासुख के लिये समाप्त करने का काम छोड़ दें तो हर नगर और गांव तमाम समस्याओं से मुक्त हो जायेगा. किसी कानून को बदलने के लिये लोगों को जीवन का बलिदान करना पड़ता है, तब भी नहीं बदलता किन्तु वोटबैंक के लिये सब खतम.

इन कालोनियों मे शिक्षा और शिक्षालय के लिये कोई सुविचारित और नियोजित व्यवस्था नहीं है. पक्के मकानों में रहनेवाले प्रतियोगिता में अपनी जेबे ढीली करते रहते हैं. प्राथमिक विद्यालयों की सूचना पुस्तिकायें  पांच सौ , हजार की  मिलती हैं किन्तु उनसे यह पता नहीं चलता कि वहां के शिक्षक वास्तव में प्रशिक्षित हैं या नहीं. पचास हजार से लाख रूपये वार्षिक खर्च कर माता पिता रोज होमवर्क कराने को बाध्य हो जाते हैं या ट्यूशन का सहारा ले लेते हैं. बच्चे वाहनों से विद्यालय जाते हैं और आते हैं. पूरब वाले पश्चिम और पश्चिम वाले पूरब जाते हैं.

यदि सभी के लिये एक समान पाठ्यक्रम, शिक्षालय ,शिक्षक की व्यवस्था हो तो नौनिहाल बस्ते के बोझ से दबने से और अभिभावक शुल्क के बोझ से दबने से बच जायेंगे. सरकार शिक्षा उपकर वसूल लेती है किन्तु शिक्षा क्षेत्र की सम्पूर्ण जिम्मेदारी लेने से बच जाती है. भारत के नब्बे प्रतिशत लोग इस शिक्षा को असहायता में झेल रहे हैं क्योंकि वे जिन्हें अपना प्रतिनिधि समझते हैं वे किसी राजदल के नेता के आगे नतमस्तक हैं और वह नेता पूंजी पतियों की बात मानने को मजबूर है. हमारे जैसे लोग हवा का रुख देखकर अपना रुख बदलते रहत हैं. इसका कुफल हमारे नौनिहाल भुगत रहे हैं.

इसलिये हमें केजी से पीजी तक के लिये निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था को  को हर गांव, कस्बा, नगर तथा महानगर तक प्रसारित करना होगा. इसके लिये अखिल भारतीय शिक्षा संघर्ष यात्रा-२०१४ से जुड़िये और विमर्श कीजिये तथा वह करने का प्रयास कीजिये जिससे हर सपने को आसमान मिले.

सुझाव दीजिये.
नमस्कार.


Friday, July 25, 2014

भावताव

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.

इधर भाई लोग इसराइल के गुणगान में व्यस्त हैं, इसराइल को टमाटर बम बनाना चाहिये. भारत जैसे देश में टमाटर वर्षा कर देनी चाहिये.
 
आजकल  आम की  नहीं  टमाटर की चर्चा हो रही हैं. यह तो पता नहीं कि मीडिया के लोग जहां के मूल निवासी हैं वहां सालोंसाल टमाटर फलता है या मौसमी फल है.

यह बात अलग है कि जमाना ग्लोबल है तो हर समय हर चीज मिलती है. दिल्ली वालों को आदत है कि सब कुछ हर समय खायें तो टमाटर इस समय सौ रूपये किलो हो जा रहा तो टीवी का समाचर हो जा रहा है.

सब्जियां मंहगी और सस्ती होती रहती हैं. जब जो सब्जी महंगी  हो उसे खरीदना बंद कर दीजिये. दूध के भाव से टमाटर का भाव मिला लीजिये.

कल एक देहात के बाजार में आलू चौबीस रुपये किलो तथा परवल बीस रुपये किलो मिल रहा था. कभी कभी सेब से मंहगी प्याज मिलती है.

जब किसी सब्जी का भाव बढ़्ता है तो वह वीआईपी बन जाती है. उसे खाने का अधिक मन करता है. और टमातर में तो लाइकोपेन मिलता है. लाइकोपेन वाली गोली दस रुपये मेम एक मिलती है.

सब्जियों के थोक बाजार से खुदरा बाजार मेम जाने और उनके मंहगा हो जाए पर रोज समाचार सुनने को मिल जाते हैं. दवाओं के भाव के समाचार कोई नहीं दिखाता.

इसी पर याद आया रोटी घटना यह पता नहीं कि वहां थाली कितने की मिलती है. भोजन का भाव तो रोज बदलनेवाला है. जिसके कच्चे माल का भाव रोज बदलता है उससे बने सामग्री का भाव साल भर तक एक कैसे हो सकता है.

कुछ लोग कहते हैं कि बिना प्याज के सब्जी कैसे बनेगी कुछ लोग प्याज खाते ही नहीं.

बड़े बड़े शैफ लोग रोज नाना प्रकार के व्यंजन बनाने को बताते हैं उन्हें प्याज टमाटर रहित व्यंजन विधि बताना चाहिये.

जरा पब्लिक स्कूलों के कापी किताब और ड्रेस की ओर भी नजर घुमा लीजिये मीडिया सर. काटजू साहब के बहाने से ही सही हरिशंकर परसाई के नाम पर कचहरी की सैर भी कर लिजिये.
नमस्कार.




Saturday, July 19, 2014

भाषा और भारत

नमस्कार!

हालचाल ठीक है . सावन भी आज मूड में है. पुनर्वसु नक्षत्र का अंतिम दिन है, सुबह से बरसात के दौर चल रहे हैं. बिजली और वर्षा दोनों  का आना जाना लगा हुआ है. सीसैट ने भाषा और अनुवाद दोनों को विवाद के घेरे में ला दिया है. कई  दिनों के बाद सीसैट ( Civil Services Aptitude Test ) का अर्थ जान पाया. अंग्रेजी की एक बड़ी उपयोगिता छोटे नामों को प्रचलित कर देने में है. यह रोमन लिपि का कमाल है. इस कमाल के कारण धोखे भी खूब होते हैं. भारत सिविल शब्द खूब प्रचलित है. पहले हर जिले में सिविल सर्जन और सिविल लाइन होते थे. अब सिविल सर्जन तो नहीं होते किन्तु सिविल लाइन्स और सिविल सर्विसेज का प्रचलन खूब है. भाषा का ऐसा जोड़ तोड़ होता है कि एक बार खेल के मैदान में खेल-ज्योति या मशाल का नाम जब टार्च बोला गया तो मैं आधुनिक टार्च को ही दिमाग में ला सका. आज भी टार्च माने टार्च ही सामने आता है मशाल नही.

भारत में वस्तुनिष्ठता को नास्तिकता से जोड़ दिया गया, इसलिये भारत के बहुत से वैज्ञानिक और विज्ञान विषयों के आचार्य नास्तिकता से बचने के लिये वस्तुनिष्ठता से दूर ही रहना चाहते हैं. वसुधैव कुटुम्बकम का नारा तो देते हैं किन्तु भारत के ही सब लोगों को समानता का  अवसर नहीं देना चाहते हैं.

सिविल सेवा परीक्षा की वस्तुनिष्ठता शुरु से ही संदिग्ध रही है. विषयों का चयन फैशन की तरह बदलता रहा है. आचार्य गण अपने विषय को प्रचलित करने के लिये सर्ल प्रश्न और अधिक अंक  देने का प्रयास करते रहे हैं. आचार्यों की ""वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता"" के चलते यह परीक्षा विवादित रही है.

अभ्यर्थी विवाद और न्यायालय के चक्कर में पड़ना नहीं चाहते रहे. विषेशज्ञ गण अपनी कसौटी के समान दूसरे की कसौटी को मानते नहीं. फलतः तमाम अभ्यर्थी टूट्ते रहे. जो जीता वही सिकन्दर इसके कारण न चुने जाने वाले अयोग्य माने जाते रहे. जो शोधकार्य और प्रदत्त तथा प्रदत्त विश्लेषण प्रकाश में लाये जाते हैं उन्हें अलग से किसी ने जांचने की कोशिश नहीं की, अगर की भी तो वे चर्चित नहीं हुये.

भारत में इन्टरमीडियेट अर्थात १०+२ की परीक्षा प्रत्येक प्रदेश की परिषदें, और कुछ  परिषदें  संचालित कराती हैं. सबका अपना अपना राग है,  अलग राग प्रायः वस्तुनिष्ठता को समाप्त करने के लिये ही होते हैं.

भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन के महानायक अंग्रेजी जानने वाले लोग ही थे. लेकिन लोग तो अंग्रेजी जानते नहीं थे. अतः नेताओं ने जनता से तो हिन्दी और भारतीय भाषाओं में सम्पर्क साधा किन्तु सरकारी कमकाज अंग्रेजी की ओर गया. मुसलमान शासकों के कारण कचहरी की भाषा उर्दू हुई.

मैं जब हाईस्कूल १०वीं कक्षा में था तो उत्तर भरत में हिन्दी आन्दोलन चला था. १२ वीं तक पढाई का माध्यम हिन्दी रहा, उसके बाद माध्यम अंग्रेजी हो गया. हिन्दी माध्यम से पढकर गये छात्र अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें पढ़ लेते थे. अंग्रेजी में परीक्षा दे देते थे किन्तु आपसी बात तो हिन्दी में ही कर पाते थे. बहुत कम लोग बातचीत अंग्रेजी में करते थे.

व्यक्ति की बुद्धि, ज्ञान, विवेक मात्र किसी विदेशी भाषा के आधार पर नहीं जाना जा सकता. विश्व में अंग्रेजी बोलने वाले 5.43% तथा हिन्दी वाले 4.70% बंगाली वाले 3.11% हैं.
http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_languages_by_number_of_native_speakers

एक दूसरे श्रोत के अनुसार मानक हिन्दी जानने वालों की संख्या अंग्रेजी वालों से अधिक है.
Hindi

मानक हिन्दी - Mānak Hindī

Modern Standard Hindi is a standardised variety of the Hindustani language.

It is one of the official languages in India (as Hindi, Urdu) and in Pakistan(as Urdu).
 
hin366 000 000487 000 000
English

has been widely dispersed around the world, it is official language in 83 countries/regions (ISO), spoken in 105 other countries (E).

Curiosity: English language does not have official status in Australia, theUnited Kingdom, and the United States.
http://www.nationsonline.org/oneworld/most_spoken_languages.htm

आजकल भारतीय भाषा वाले सीसैट में संशोधन चाहते  है. तमाम विद्वान यह मानते हैं कि अंग्रेजी जाने बिना मोक्ष ही नहीं मिलेगा तो भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की प्री परीक्षा केवल भारतीय भाषा में होने दीजिये. चयन के बाद प्रशिक्षण में प्रशासनिक अंग्रेजी का लिखित और मौखिक अभ्यास और प्रशिक्षण देकर मोक्ष लायक अंग्रेजी सिखा दीजिये.

आजकल के फैशन के अनुरूप प्रत्येक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में अंग्रेजी को एक विषय के रूप में पढ़ाने की व्यवस्था होनी चाहिये जिसमें आधा ध्यान बोलने पर भी दिया जाना चाहिये.

Tuesday, June 10, 2014

प्यासी ट्रेन

नमस्कार!
हालचाल गरम है.
राजनीति में हारे हुये राजद्लों के नेता जो सुपरनेता के चमत्कार से जीतने की सोच रहे थे अब हारने पर अपनी करनी पर कम नेता की करनी पर अधिक गुस्सा कर रहे हैं. इन दलों की हाल चाल गरम है.

मुझे गर्मी बहुत सताती है फिर भी प्रर्यावरण वालों की बात सोचकर रोज अखबार देखता हूं कि अब लिखा रहे कि गर्मी का नया रिकार्ड बना, लेकिन अभी तक नहीं दिखाई दिया.

पुराने मत से मृगशिर नक्षत्र चल रहा है. २३ जून तक दिन बडा होता चला जायेगा तो गर्मी अब नहीं पडेगी तो कब ? देवरिया मेम पुरवा चल रही है, लोकप्रचलित है कि पुरवा हवा भीतर से गर्म होती है. आठ बजे से ही पुरवा में बसी नमी भाप बन जाती है और गर्मी के साथ साथ हवा की कमी का  अनुभव भी होने लगता है. प्यास बुझती ही नहीं, गर्मी में पानी की कमी एक स्ट्रोक के रूप प्राण भी ले लेती है.

अभी पानी की अनुपल्ब्धता के कारण एक खिलाडी की मौत से कुछ अतीत के जलकष्ट प्रकट हो गये. १९६२-६३ में जून में रात में गोरखपुर से लाररोड आना था. पहले तो टिकट पाना ही मुश्किल रहा. बाबूजी के एक परिचित जो वहीं कार्यरत थे टिकट दिलवा दिये. गाडी में बैठने के बाद मुझे प्यास लगी, अब ट्रेन चलने को थी. तब बगल में बैठे एक  भोजपुरी के कवि ने अपना लोटा दिया और किसी ने लोटा भरकर पानी ला दिया. उन्होंने लोटा या गिलास लेकर ही यात्रा करने की सलाह भी दी.

एकबार इसी तरह के मौसम में इलाहाबाद की यात्रा में जा रहा था तब टू टियर वाले डिब्बे भी चलते थे, जिसमें ऊपर वाली बर्थ सोने के लिये तथा नीचेवाली बैठने के लिये होती थी. डिब्बे में बहुत भीड भी थी. किसी के पास लोटा था. उसने किसी प्रकार दूर नल से पानी मंगा लिया. पानी पी ही रहा था कि एक छोटा बच्चा पानी के लिये चिल्लाने लगा. लोगों के अनुरोध पर उस व्यक्ति ने पानी का लोटा दे दिया. लोटा पाते ही बच्चे का पिता जल्दी-जल्दी पानी पीने लगा. सभी लोग गुस्साये. उस व्यक्ति ने नजर नीची कर के लोटा बच्चे कि ओर बढा दिया.

एक यात्रा बैजनाथ धाम की हुई. यात्रा ठीक ठाक चल रही थी. बोतल वाले पानी का जमाना आ गया था कई बोतल पानी लेकर बैठा था. साथ में भी लोग थे. अब यात्रा पूरी होने वाली थी. सब लोग पानी पीकर अपना बोतल भी फेक चुके थे. अगले स्टेशन पर गाडी रुक गई. घंटे भर के बाद गला सूखने लगा. बगल वाले मित्र से पानी मांगा, उनके पास भी नहीं था. पानी वाले भी नहीं थे. हमारी बोगी  प्लैट्फार्म से काफी दूर थी. किन्तु दूर एक स्टाफ क्वार्टर के सामने इन्डिया मार्क पम्प था दिखाई दिया. बगल वाले मित्र ने अपना और मेरा बोतल लेकर दौडकर पानी भरकर लाया.

लगभग दस साल पह्ले पहली जून को घर से दोपहर में बाजार चला गया मिठाई लेने. मन में आया कि एक रसगुल्ला खाकर पानी पीकर तब चलूं. त्भी मन में बात आई अरे दस मिनट में तो घर पहुंच ही जाऊंगा.  घर तो पहुंच गया किन्तु आकर चारपाई पर लेट गया, पूरा शरीर जल रहा था. लू लग चुकी थी. पसीना बंद हो गया था. आज भी अधिक गर्मी होने पर पसीना बंद हो जाता है और शरीर में जलन होने लगती है.

अंग्रेज हमारे देश  से चले गये किन्तु नेता और अधिकारी जनता को अभी भी मानव नहीं समझते और न उसे पूरा अधिकार देना चाहते हैं. अपने लिये जनता के धन से हर प्रकार की सुविधा लेते हैं किन्तु जनता को सामान्य सुविधा भी नहीं देते. अधिकारी, नेता और ठीकेदार के झगडे में प्लेटफार्म तथा ट्रेनों में चलने वाले लाइसेन्सी वेन्डर गायब हो चुके है. इन्हें ट्रेन के अनुसार लाइसेन्स देना चाहिये, इन्हें रेल की कमाई का हिस्सा भी नहीं बनाना चाहिये. पुलिस, टीटी आदि को इनसे धन उगाही और सामान की उगाही भी नहीं करनी चाहिये. बस इसपर ध्यान देना चाहिए कि गुणवत्ता वाली सामग्री मिले. शायद इस प्रकार की घटना फिर न घटे.

नमस्कार.



Wednesday, May 28, 2014

दो प्रधानमंत्री

नमस्कार!
हाल चाल ठीक है. रोहिणी नक्षत्र की वर्षा ने किसानों मे भी खुशी बांटा और शहरी बाबुओं को भी राहत दिया. रोहिनियां आम अब अधिक मीठे लगेंगे. बाकी आम भी  जल्दी पकेंगे और मीठे भी लगेंगे. लगन का मौसम है ,पकवानों का जोर है. खानेवाले जुटे हुये हैं.
इसी तरह के मौसम में २७ मई, १९६४ को गांव के पडोस में तिलक समारोह था. लाउडस्पीकर पर गाना चल रहा था. बच्चे से बूढे तक जुटे थे. किसी ने आकर बताया आकाशवाणी से समाचार आ रहा है कि पंडित जी नहीं रहे.
लाउडस्पीकर बन्द हो गया. सन्नाटे में तिलक सम्पन्न हो गया. वह शाम पंडित जी की चर्चा मे बीता. लोगों को लग रहा था कि उनका कोई सगा नहीं रहा.
तब तक प्रथम पंचवर्षीय योजना के तहत ट्यूबवेल मेरे गांव में भी लग गया था, उसकी लम्बी नहरों से सिंचाई की सुविधा भी हो गई थी. उस समय साम्यवादी दल भी गांव में दाखिल हो गया था. नैनीताल मे जमीन पाये लोग रोज नेहरु-गांधी की गाथा भी गा रहे थे. लोकगीतों मे गान्धी, नेहरु व कांग्रेस की चर्चा होती थी. विवाह समारोह में प्रहसन-गाली- गीत में  भी गान्धी, नेहरू व कांग्रेस की चर्चा थी .
ऐसे परिवेश में पले बढे सम्वेदनशील लोगों के मानस पटल पर एक व्यक्तित्व अपनी जगह बना लिया. आधुनिक भारत को तेजी से विकसित राष्ट्रों की तरह बनाने का नेहरू का सपना चीनी आक्रमण से टूट गया और दिल भी. देश तो चलता ही रहेगा. लेकिन उसकी गुणवत्ता भूतकाल की नींव और वर्तमान के कर्म पर निर्भर होती है. आज नेहरू- नीति प्रश्नवाचक है किन्तु उनका भारत के निर्माण का सपना नहीं.

२९ मई,  १९८७ चौधरी चरण सिंह की पुण्यतिथि है, मेरे होश में चरण सिंह घोर नेहरू विरोधी थे. कांग्रेस के कुलवाद के भी विरोधी थे. उन्हें सख्त प्रशासक माना जाता था. जब वे मुख्यमंत्री हुये तो कार्यालय १० बजे माने १०बजे खुलने लगे. सरकारी कर्मचारी समयपालन करने लगे. जनता की एक शिकायत पर प्रशासन दौडता था. मेरे गांव के एक व्यक्ति ने पोस्ट्कार्ड पर शिकायत भेज दी थी. देवरिया से अधिकारी बरसात में भींगते, कीचड में चलकर गांव पहुंचे. हम बच्चों पर बहुत गहरा प्रभाव पडा. किन्तु वार्धक्य आते आते उनका भी मन कुर्सीमय और परिवारवादी हो गया. उन्हें अपने दल भारतीय क्रान्तिदल का कोई कार्यकर्ता योग्य नहीं लगा और इस प्रकार एक और कुनबा दल बन गया.

दोनों को श्रद्धांजलि.
नमस्कार.

अरविन्द की जेल यात्रा

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने नितिन गडकरी मानहानि केस में जेल जाना स्वीकार किया. उनका कहना था कि वे न्यायालय की सूचना पर उपस्थित हो गए हैं, और आगे भी आते रहेंगे, यह लिखकर दे दे रहे हैं, लेकिन विधि के अनुसार या माननीय न्यायमूर्ति के विवेक के अनुसार उनका कहना त्रुटिपूर्ण था. उन्हें जेल भेज दिया गया. न्यायमूर्ति ने उन्हें उच्च न्यायालय में जाने को सलाह दिया. उच्च न्यायालय ने उन्हें पहले जेल से बाहर आने कि कार्यवाही कर लेने की सलाह दी उन्होंने वैसा ही किया.

काका हाथरसी ने कहा है कि "सांई ये न बिरुद्धिये....." यद्यपि इसमें पत्रकारों और मीडिया का नाम नहीं है किन्तु अरविन्द ने इनका विरोध कर दिया. उनका विरोध कर दिया जो मंत्री बनाते बिगाडते हैं. यह सबसे बडा बंधुआ मजूर वाला क्षेत्र है. कुछ लोगों को खूब पगार मिलती है बाकी को लालीपाप. कस्बे से लेकर राजधानी तक मीडियाकर क्या क्या करते हैं ये सब  जानते हैं. एक शब्द है साक्षीभाव अर्थात परिघटना को राग द्वेश और संवेग से मुक्त होकर देखना. मीडियाकर को इसीभाव से समाचार लिखना चाहिये. एक शब्द है मीडिया प्रबन्धन. इसे भी मीडिया वाले ही जानते हैं, लोग भी जानते हैं.  भारत में लोग "बूझि मनहिं मन रहिये" "सामने कह कर तो देखे" के चलते किसी को कुछ कहना ठीक नहीं समझते हैं और कोर्ट कचहरी से भी डरते हैं.

भाई मीडियाकर लोग, अम्बेडकरवादी लोग, वामपंथी लोग, अन्नावादी लोग और प्रतिद्वन्द्वी राजदल वाले सभी अरविंद के जेल जाने का परिहास ही करते दिख रहे हैं.

केजरीवाल के जेल जाने से लोग इतने नाराज क्यों हैं. भारत की जेलों तमाम ऐसे लोग बन्द हैं जिन्हें वहां नहीं होना चाहिये. वे जमानत की न्यायिक प्रक्रिया के कारण जेल मे हैं. कचहरी के खर्च के लिये धन न जुटाने के कारण जेल मे हैं.

अभी कुछ दिनों पहले मीडिया में हंगामा हुआ था जब एक पुत्र ने वर्षों की मेहनत के बाद अपनी माता को जेल से रिहा कराया था.

जब देश के न्यायाधीश, शिक्षक, और पत्रकार/मीडियाकर आत्मनिरीक्षण न कर विवेक के स्थान पर अधिवक्ता की तरह पक्षपातपूर्ण तर्क का सहारा लेंगे तो देश का नैतिक पतन होगा.

नमस्कार.

शिक्षा बनाम शिक्षा

नमस्कार!
हालचाल  ठीक है.
मेरे लिये यह हर्ष का विषय है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सबसे युवा कैबिनेट मंत्री मिला है. मननीया स्मृति ईरानी महोदया सफल हैं या असफल यह तो कुछ समय बाद पता चलेगा.
अगर मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने में सफल हो जांय तो सफल मंत्री सिद्ध होंगी.
पांच साल में शिक्षा का व्यय ६.५ % पहुंचाने में कामयाबी भाजपा और देश दोनों के लिये उत्तम होगा.
शिक्षित और कौशल प्रशिक्षित युवक ही देश को आगे बढा सकता है.
देश के प्रत्येक विकास खण्ड में एक औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान खोल दिया जाय और सर्वशिक्षा अभियान के तहत प्रत्येक बालक को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के इन्फ्रास्ट्रक्चर, पाठ्यक्रम और शिक्षक मिल जाय तो ही भारत का विकास होगा, विदेशी निवेश से नहीं.
आधुनिक भारत का अपना शिक्षा का माडल होना चाहिये. अब तक के विद्वान मम्त्रियों के कार्यकाल के कारण भारत का कोई भी शिक्षण संस्थान विश्व के टाप टेन मे नहीं है. यदि सालभर के अन्दर पांच शिक्षण संस्थान उस श्रेणी में आ जायें तो लगेगा कि कोई युवा मंत्री आया है.
शिक्षा के क्षेत्र में हर प्रोफेसर कुलपति और फिर मानव संसाधन विकास मंत्री बन जाना चाहता है. जो प्रोफेसर एक विश्वविद्यालय नहीं सम्भाल पाते वे मंत्रालय क्या संभालेंगे. अपनी कक्षा अपने शोधछात्रों से पढवा लेना, जातिवाद और क्षेत्रवाद करना, अपने शोधछात्रों को ही काबिल समझ कर उनकी नियुक्तियां कराना, वस्तुनिष्ठता से कोसों दूर रहना और अपने शोधछात्रों का शोषण करना और अब तो धन ले दे कर नियुक्तियां कराना ही अधिकाधिक प्रोफेसरों का काम रह गया है. जो निष्ठावान, शिक्षा, शिक्षक, शिक्षार्थी के प्रतिबद्ध प्रोफेसर हैं कृपया इस टिप्पडी पर नाराज होने के पहले अपने मित्रों को ध्यान में अवश्य रखें.
एक युवा मंत्री भारतीय शिक्षा में क्रांतिकारी सिद्ध हो इसी शुभकामना के साथ.
नमस्कार.
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Saturday, May 17, 2014

नई सरकार क्या दूर करेगी भ्रष्टाचार?

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. मोदी सरकार बनने वाली है. भाजपा सहयोग लेकर पास हो गई. तृतीय श्रेणी मिली है. लेकिन जनता पार्टी के बाद कांग्रेस को छोडकर भाजपा ही एक राज दल इस समय बचा था. बाम दल व्यक्तिवाद की राजनीति में डूब चुका है उसका उबरना चमत्कार ही होगा. एक वैकल्पिक राजदल उभर रहा है. लेकिन लोकसभा की परीक्षा को पास करना मुश्किल  लग रहा था. लेकिन आआपा  व्यूह कारपोरेट ने तोड दिया. मध्यवर्ग भ्रष्टाचार से त्रस्त तो है किन्तु सीधे  लडना नहीं चाहता, घरबारी आदमी बच बचाकर जी मरते मरते जी लेता है. पैसे वाला मध्यवर्ग नजराना, जबराना, शुकराना, फिरौती मनौती आदि से अपना काम साध लेता है. बीस लाख देकर भी नौकरी मिल जाय तो वह नौकरी दिलाने वाले की आजीवन चरण वन्दना करता रहता है. ऐसी स्थिति में आम आदमी पार्टी को क्या मिलता.

आज के अखबार "रविवासरीय हिन्दुस्तान " में हिन्दुस्तान हिन्दी समूह के सम्पादक श्री शशि शेखर जी का सम्पादकीय निकला है. प्रथम पृष्ठ पर जरूर पढने का निर्देश या आग्रह भी छपा है "नरेन्द्र मोदी को जो करना है"- महगाई और बेरोजगारी को पहला एजेन्डा माना गया है. मैं शशि शेखर के विचारों से प्रायः सहमत नहीं हो पाता हूं. इसलिये आज की असहमति पूर्वाग्रह पूर्ण हो सकती है.

मैं भ्रष्टाचार को ही भारत की दुर्दशा का कारण मानता हूं और मंहगाई तथा बेरोजगारी को उसका बाई प्रोडक्ट. भ्रष्टाचार के कारण रोज बनने वाला काला धन महगाई का पहला कारण है. मंत्रालयों से अस्सी प्रतिशत  लीकेज वाली योजनायें बनाकर पैसा वसूल कर चेक भेजने की परम्परा काला धन भी बनाती है तथा मंत्रालय के लिये मंत्रियों में मार भी कराती हैं. मंत्रालय का बंटवारा योग्यतानुसार न कर राजनैतिक ब्लैकमेलिंग की क्षमता के अनुसार कराने में भ्रष्ट धन की ललक भी छिपी होती है.

भ्रष्टाचार के चलते जनता की जेब से जो अप्रत्यक्ष  कर(  टैक्स) जाता है उसका अधिकतम पचीस प्रतिशत भाग ही सरकार तक पहुंचता है. अतः सरकार पैसे की कमी के नाम पर  नियुक्तियां नहीं करती है और बेरोजगारी बढती है. पूर्व प्रधानमंत्री आई यम यफ की राय पर  सरकारी खर्चे की कटौती के नाम पर सरकारी नियुक्तियों पर रोक लगाकर बेरोजगारी बढा दी . बहुत सारे लोग बेरोजगारी के लिये आबादी को दोष मढ देंगे. किन्तु हमारी आबादी का घनत्व जापान से कम है. सभी सरकारी क्षेत्रों में लगभग चारगुने पद रिक्त हैं. जब ये पद भर जायेंगे तो इसके कारण बहुत रोजगार सृजित हो जायेगा.

भ्रष्टाचार के कारण शिक्षा  की गुणवत्ता का ह्रास होता चला जा रहा है. विद्यालयों की मान्यता के लिये रजभवन तक में फिरौती चल रही है. ऐसे विद्यालयों  से शिक्षा प्राप्त करने वाले लोग भ्रष्टाचार के अतिरिक्त कुछ नहीं करेंगे. ये कामचोर कर्मचारी बनेंगे.

इसलिये भारत में भ्रष्टाचार ही समस्या है. भारतीय संस्कृति की बात करने वाले वैलेन्टाइन डे पर हंगामा करने, स्कर्ट की साइज नापने की बजाय भ्रष्टों को निशाना बनायें. स्वयं भ्रष्टाचार और सत्ता मद से बचें तो भारत का भला होगा.

रामदेव जी कालाधन वापस मंगा लिजियेगा तीन साल बाद ही मंगा लीजियेगा, अभी तो अपने उत्पादों की गुण्वत्ता सुधारिये तथा अपने उत्पादों के विक्रेताओं से पक्की रसीद दिलवाने की व्यवस्था तो कर दीजिये.

राष्ट्रीय सवयं सेवक संघ, और विश्व हिन्दु परिषद भारत को वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त देखने के लिये उतना ही श्रम करने को तैयार है जितना सरकार बनाने के लिये?
फिर मिलेंगे.
नमस्कार.

Sunday, March 23, 2014

२३ मार्च २०१४-२

नमस्कार!
हालचाल ठीक है,

आज  विधान परिषद उ.प्र. के गोररखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिये मतदान हुआ. यह चुनाव भी चुनाव आयोग ही कराता है. प्रदेश में जितने भी विद्यालय और शिक्षक हैं  उसकी सूची शासन के पास है. निर्वाचन आयोग उससे कोई सूचना न प्राप्त कर मतदाता से आवेदन पत्र लेता है. जबकि प्रत्येक जनपद से फोटोयुक्त मतदाता सूची और पहचान पत्र निर्गत किया जा सकता है. प्रति चुनाव सूची के नवीनीकरण में बहुत सारे खिलाडी अपना खेल करते हैं.

शिक्षक विधायक अब शिक्षा-शिक्षार्थी-शिक्षक की बात नहीं करता. विधायक बनने के अपने सुख हैं उन्हीं सुखों की लालसा इन्हें इधर लाती है. चुनाव के बाद शिक्षकों से  सम्पर्क में बने रहना और शिक्षा के हित के लिये संघर्ष बनाये रखने में य सभी लोग असमर्थ हैं. उत्तर प्रदेश की शिक्षा प्रत्येक स्तर पर चौपट हो चुकी है. जब मैं यह लिख रहा हूं तो बहुत से लोगों के प्रश्न सामने आ जायेंगे. उन सभी से निवेदन है कि कभी सौ दो सौ किसी भी स्तर के विद्यार्थियों का उपयुक्त सैम्पल लेकर जाम्च कर लें. ५-१०% ही उपयुक्त विद्यार्थी मिलेंगे.

सीयनबीसी आवाज एक व्यवसआयिक चैनल है. यहा पर उद्योगपतियों के हितों की चर्चा होती रहती है. यहाम पर उद्योगपतियों का नये प्रधानमंत्री के लिये तय हो रहा है. क्या कोई चैनेल नागरिकों का एजेन्डा भी बनायेगा?
जनता को इसके लिये आगे आना चाहिये. केवल विकास......विकास...... विकास ......का क्या अर्थ. राजदल केवल विकास बता रहे हैं. उन्हें बताना चाहिये कि हमें शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका,और न्याय चाहिये.
नमस्कार.

२३ मार्च २०१४

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
रविवार का दिन है. छुट्टी का दिन है. आज शहीद दिवस  है, देश दुनिया और आदमी की हालत  पर सोचने का दिन है. साल भर में आदमी को एक बार तो सोचना ही चाहिये कि आदमी को कैसे जीना चाहिये और वह कैसे जी रहा है. राजा भी आदमी है, दरबारी भी आदमी. रंक भी आदमी भिखारी भी आदमी. अपने हिस्से की आजादी लेते लेते आदमी दूसरे की आजादी छीन लेता है. एक वक्त की रोटी खाने के बाद पीढियों तक राज करने का सपना आने लगता है
.
२३ मार्च को कुछ लोग शहीदों की कुर्बानी को याद करने की कोशिश करते हैं. कुछ कर्मकांड भी होते हैं. बहुत से लोग इसी बात से डरने लगते हैं. हर छोटा या बडा बास भगत सिंह के नाम से घबराने लगता है. राजदल तो घबराहट में उन्हें ब्रह्म जैसे पूजते हैं. भारत इस वर्ष अपने सांसदों नहीं प्रधानमंत्री का चुनाव करने जा रहा है. या कहें कुछ लोग अपने में से किसी एक को प्रधानमंत्री बनवाना चाहते हैं ऐसी स्थिति में भगत सिंह का संदर्भ लेते हुये क्या करना चाहिये, क्या जो हम चाह्ते हैं कर पायेंगे, तमाम स्थितियों में हम उसे नहीं करते जो हम करना चाहते हैं हम उसे करते हैं जिसे लोग चाहते हैं.

एक पांच अंकों वाला धारावाहिक " सत्यमेव जयते" नाम से प्रसारित हो रहा है जो मार्च के हर रविवार को प्रसारित होगा. आज चौथा अंक प्रसारित हुआ. इस अंक में आम आदमी को जागरूक करने के लिये पूरा प्रयास किया गया है.

भारत के प्रति व्यक्ति सम्पत्ति की स्थिति बतायी गयी. मीडिया द्वारा प्रसारित करदाता के भ्रम को तोडने का प्रयास किया गया. भारत के भ्रष्टाचार की स्थिति बतायी  गयी. संघर्ष और निर्माण की भूमिका रेखांकित की गयी. सूचना के अधिकार के प्रयोग के लिये प्रेरित किया गया.

मुझे लगता है कि सोसल मीडिया के द्वारा जनता को सभी राजदलों को नागरिक एजेन्डा बताने की आवश्यकता है. सभी दल जनता को मूर्ख बनाकर अपनी कुर्सी पक्की करना चाहते हैं. उन्हें प्रतिनिधि बनाना पडेगा.
नमस्कार!
फिर मिलेंगे.
धन्यवाद.

Sunday, February 2, 2014

"आम आदमी और आम आदमी पार्टी"

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
रविवार का दिन, धूप का अभाव, फेसबुक की खींच, टीवी की खींच, रजाई की खींच हीटर की खीच .......फेसबुक ही जीत जाता है. कभी-कभी ब्लाग भी.
इस जाडे में  मफलर और चाय में जंग हो रही है. मफलर वाला भी नया है. चायवाला अचानक चायवाला बन गया. विज्ञापन कम्पनियां जिसको जब चाहे नककटवा बना दें.
केजरीवाल की हिट्लिस्ट पुआल की आग जैसे गर्मी दे रही है. सर्वविदित रहस्य की चर्चा जब कोई करता है तो सभी प्रमाण मांगते हैं. इस देश के बहुत सारे सत्य कभी कचहरी में प्रमाणित नहीं हो सकते. कोई राजदल यह नहीं दावा कर सकता कि उसके शासन काल में काला धन नहीं बनेगा.
आजकल आरोप लग रहा है कि केजरीवाल को शासन करने नहीं आता. आरोप लगाने वाले अपने शासन को देखते ही नहीं. दिल्ली में पुलिस ( गृहमंत्री) की कार्य कुशलता रोज ही दिखाई देती है.
किसी भी दूर जाने वाली रेलगाडी ( रेल मंत्रालय )  में टिकट भारत निर्माण और शाइनिंग इंडिया दोनों की याद दिला देता है.
सेना की स्थिति और सैन्य साजो-सामान की शीघ्र आपूर्ति और नियुक्तियां (रक्षा मंत्रालय ) की कार्य कुशलता बताती रहतीं हैं
इस देश में बिकनेवाले तमाम साजोसामान भारतीय भाषा में निर्देश भी नहीं देते हैं. तमाम वैधानिक चेतावनियों को पढने के लिये सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है. ( गृह मंत्रालय ) की कार्य कुशलता.
पूरे देश में कुछ स्थानों को छोडकर किसी को भी समय से  रसोई गैस की आपूर्ति नहीं हो पाती. आपूर्ति कोई मुद्दा भी नही है. रात को दो बजे से लाइन लगाने वाले जिन्दाबाद. ( पेट्रोल मंत्रालय की कार्य कुशलता)
देश के सभी पढनेवालों के लिये शिक्षा संस्थान नहीं है. छात्रों का अधिकाधिक समय प्रतीक्षा में ही कट जाता है. यहां तक कि दिल्ली में भी विद्यालयों की कमी है. (शिक्षा मंत्रालय की कार्य-कुशलता)
न्यायालयों में लम्बित पडे मुकदमें विधि मंत्रालय की कार्यकुशलता दिखाते हैं.
यह सब देखने के बाद लगता है कि " आप" को कुछ दिया जाना चाहिये.
आप को छूट की आशा नहीं करनी चाहिये. आप का मूल्यांकन प्रतिदिन के हिसाब से किया जाना चाहिये. दिल्ली सरकार के प्रत्येक मंत्रालय का काम तीब्र गति से होना चाहिये. मैंने कहीं पढा था कि बिडला की कम्पनी में प्रतिदिन की पडता प्रडाली से मूल्यांकन होता है. "आआप" को इसे दिल्ली सरकार के कार्य प्रणाली के लिये उपयोग में लाना चाहिये. इसके लिये मूल्यांकन की एक वस्तुनिष्ठ प्रणाली विकसित कि जानी चाहिये. आज के जमाने में किसी को सच या झूठ सिद्ध करना मीडिया के हाथ में है.
भारती जी के छापे को लेकर बहुत आलोचनायें हुईं. किन्तु अभी तक वस्तुस्थिति सामने नहीं आ सकी.
तमाम आलोचक आप की आलोचना खाप को लेकर भी कर रहे है.
कुछ अति महत्वाकांक्षी लोग आप के सदस्य बने हैं. आये दिन कुछ लोग आप की आलोचना कर अपनी छवि बनायेंगे. दूसरे दलों में जगह बनाने के लिये यह एक अच्छा अवसर है. मोबाइल से आप का सदस्य बनिये सौ ऐसे ही सदस्यों के सहारे  दूसरे दल में अपना टिकट पक्का कीजिये.
राजनीति में बाहुबल, धनबल, जनबल सभी से अधिक बलवान छलबल है. लंगीबाजी राजनीति भी चलती रहती है.
आम आदमी भी आज की राजनीति में केवल यही जानना चाहता है कि कौन जीतेगा.?
वास्तविक प्रश्न है किसे मत दें दल को या व्यक्ति को?
चुनाव की कसौटी क्या है?
हमें अपने निर्णय पर रहना चाहिये या जीतनेवाले के साथ हो जाना चहिये.
नमस्कार.
 

Friday, January 31, 2014

बसन्त/बजट

 बसन्त बजट
नमस्कार!
हालचाल ठीक है,
चार फरवरी को बसन्तपंचमी है. जिसका प्रचलन कम होता जा रहा है, आउट आफ फैशन. वैलेन्टाइन डे या चौदह फरवरी नया बसन्तोत्सव दिवस है. जो अंग्रेजी पर्व है वह नवउदारवादी व्यापार को मदद करनेवाला होता जा रहा है. अमिताभ बच्चन और हेमामालिनी ने बागवान फिल्म के माध्यम से अपने समवयस्कों को भी वैलेन्टाइन डे से जोड दिया है. मोबाइल और स्मार्टफोन और विज्ञापन सब कुछ मिलाकर बसन्त को अधिक रंगीन करने पर जोर दे रहे हैं. 
इस वर्ष का जाडा है जाने का नाम ही नहीं लेता,  लोग बसन्तपंचमी को भी दांत कटकटाते हुये मिलेंगे. परसो नेट पर देख कर कह दिया कि मौनी अमावस्या को धूप होगी. किसी ने कहा बसन्तपंचमी तक जाडा ऐसे ही बना रहेगा, किसी और ने कहा आठ फरवरी तक. इस वर्ष आधा पूरा माघे कम्बल कांधे रहेगा. 
इधर बसन्त का दस्तक होता है और टैक्स विशेषज्ञ आयकर का राग अलापने लगते हैं. आयकर विभाग का नाम सुनते ही भय हो जाता है. उनकी हर चिट्ठी में दंड का जिक्र होता है. बचपन में गांव में मालगुजारी वाले लाल पगडी और मोटा डंडा लेकर आते और लोगों के बैल खोलकर लेकर चले जाते (तब हल और बैलों से जुताई होती थी) . पीछे-पीछे किसान, हाथ जोडते, माई बाप करते पहुंच जाते. अजकल भी हर सरकारी विभाग और  कर्मचारी सरकार ही कहलाना पसन्द करते हैं.
बजट में सबसे चर्चित आयकर ही है. वैट को लोग ध्यान नहीं देते, उत्पाद कर को कोई पूछता ही नहीं, सेवाकर का भी यही हाल है. सारे लोगों की निगाह में मध्यवर्ग की एक नम्बर की आमदनी निगाह में होती है. आयकर भी कई तरह का होता है. आजकल, कभी महिला कभी वरिष्ठ नागरिक, हिन्दू अविभक्त परिवार आदि कई तरह से जोडा जाता है. पता नहीं कितनी धाराओं छूट मिलती है.
१-मुझे लगता है कि व्यक्ति के लिये सबसे अधिक व्यय का काल ३५-६० वर्ष तक का होता है. इसलिये अस आयु वर्ग के लोगों को छूट मिलनी चाहिये.
२- आय का योग समस्त स्रोत से कर लिया जाता है किन्तु उस आय पर कितने जीवन निर्वाह करते हैं इसका ध्यान नहीं रखा जाता है. आश्रित संतति या माता, पिता, भाई का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा जाता. प्रत्येक परिवार में प्रति व्यक्ति आमदनी के आधार पर ही कर लगाया जाना चाहिये.
३- एक व्यक्ति के सामान्य और गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिये प्रतिव्यक्ति व्यय के अनुसार आमद्नी को करमुक्त रखना चाहिये. इसे प्रतिवर्ष फुटकर मूल्य सूचकांक के अनुसार बदला जाना चाहिये. जैसे पिछले वित्तवर्ष में दो लाख था तो इस वित्त वर्ष में दो लाख पचीस हजार होना चाहिये.
४- बचत पर छूट के भी तमाम अभ्यास हुये अब इसे एक लाख किया गया है. जिसकी आमदनी तीन लाख है उसे भी एक लाख तथा जिसकी आमदनी बीस लाख है उसे भी एक लाख. सामान्यतः इसे तीस प्रतिशत  कर देना चाहिये और इसकी सीमा भी दस लाख तक ले जाना चाहिये. 
५- आयकर की तीन दरें ही है. १०%, २०%और ३०%. इसे निम्न प्रकार करना चाहिये-
                   ५ लाख तक ५%
                 १० लाख तक १०%
               १५ लाख तक १५%
               २० लाख तक २०% 
               २५ लाख तक २५% 
                 १ करोड तक ३०%
                 २ करोड तक ३५% 
                 अधिक पर ४०%
६- बकायेदारों और कर प्रवंचकों को तरह तरह की छू ट मिलती है किन्तु जो समय से पूर्व अप्रैल से कर देते हैं उन्हें कोई छूट नहीं मिलती है. जो जितना पहले से जितना अधिक कर दे उसे उतना ही अधिक छू ट देना चाहिये. जो सारा भुगतान अप्रैल में कर दे उसे और छूट देना चाहिये. 
इस  ठंढ को बचाने में आयकर और बजट की गर्मी से कुछ राहत मिली है शायद आपको भी राहत मिले. 
नमस्कार.

Thursday, January 30, 2014

बापू जी नमस्कार

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
आज मौनी अमावस्या है. मौन रहकर स्नान करने का दिन. भारतीय परम्परा का एक पर्व, समारोह, मेला, सेमिनार सबकुछ. इस सेमिनार में लोग कुछ ज्ञान देते हैं कुछ लेते हैं. अपना खाना लेकर जाते हैं. कुछ दूसरे का खाते हैं दूसरे को खिलाते हैं.
अभी लम्बे काल तक यह पर्व चलेगा. अभी सेमिनारों और उनके द्वारा प्राप्त निष्कर्षों का जो हाल है, सबको पता है उससे कुछ को धन और कुछ को मान तथा कुछ को भविष्य के लिये प्रमाण-पत्र मिल जाता है. इस तरह के सेमिनार माघ मेला जैसे नहीं हो गयें हैं. जो सेमिनार में न जाय उसे उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिये.
आज ३० जनवरी है. अहिंसा के पुजारी को भारत में गोली मार दी गयी. तमाम लोग दुखी हुये और कुछ मिठाई भी बांटे. आज भी गांधी का मूल्यांकन जारी है. गांधी की हत्या में सम्मिलित लोगों को कोई अपराधबोध नहीं है.
भारत की स्वतंत्रता के जितने भी कारण गिनाये जाय उसमें सबसे अधिक योगदान गांधी का माना जाता है. वर्तमान लोकसेवक और जनसेवक दोनों ही गांधी का नाम जरुर लेते हैं. भारत के राज-काज में गांधी की रेखा दिखाई देती रहती है. कम से कम  साल में दो बार सरकार और अखबार उनको चर्चा में ला देते हैं.
२९ जनवरी २०१४ को बीटिंग-रिट्रीट समारोह में २०सालों बाद पुरानी स्वर्णिम बघ्घी पर सवार होकर भारत के राष्ट्रपति समारोह मेम सम्मिलित होने आये.
गांघी के सिद्धान्त तो मानने वालों के लिये ही हैं. भारत के गवर्नर जनरल को कितना खर्च करना चहिये इसपर गांधी जी टिप्पणी किये थे. आज राष्ट्रपति पर भारत के औसत प्रति व्यक्ति आमदनी के किते गुना व्यय होता है इसका भी लेखा किसी न किसी के पास होगा. अन्तिम व्यक्ति कीआमदनी का हिसाब भी किसी न किसी के पास होगा ही.
आज जो लोग राजघाट गये होंगे उन सभी के दिलों को गांधी प्रेरित नहीं कर सकते. गांधी की प्रेरणा उन्हीं को मिलेगी जो उनसे प्रेरणा लेना चाहेंगे. फिर भी मैं आशा करता हूं कि इरोम शर्मिला को न्याय मिलेगा. देश के अन्तिम व्यक्ति को भी अच्छी शिक्षा मिलेगी. सभी के सवास्थ्य की देख्रेख हो जायेगी.
लुटियन दिल्ली  की सभी इमारतों को गिरा करके अंग्रेजों की गुलामी के अवशेष समाप्त कर दिये जायेंगे. वहां पर आधुनिक जनतंत्र के मानक के अनुसार भवन बनेगे. जनता को अपनी बात कहने के लिये एक विशाल मैदान मिलेगा.
बापू जी नमस्कार.

Tuesday, January 28, 2014

टोल क्यों?

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
इस घोर ठंढ में भी टैक्स और टोल का नाम सुनकर पसीना छूट जाता है. भारत का हर नागरिक कर देता है. भारत सरकार को, प्रदेश सरकार को, जिला पंचायत को, नगर/गांव को . पुल/सडकें जनता के कर से बनतीं हैं. जब तैयार हो जाती हैं तो टोल टैक्स की वसूली शुरु हो जाती है. हमलोग भी सोचते हैं कि सरकार ने दयाकर के सडक/पुल बना दिया, अब  इसके लिये पैसा वसूल रही है तो ठीक ही है.
जब जनता के धन से ही उसका निर्माण हुआ तो फिर अतिरिक्त धन कैसा? टोल जो वसूला जाता है ठेकेदारी प्रथा से वसूला जाता है. जनता से जो धन जाता है उसका अधिकाधिक अंश इन्हीं ठीकेदारों के पास जाता है. इस प्रकार यह केवल टोल ठीकेदारों और उनसे मिले हुये लोगों के लिये ही वसूला जाता है.
सरकार और तमाम लोग इस पर प्रश्न उठायेंगे कि आखिर सरकार के पास धन कहां से आयेगा?
लोग सडक और पुल बनाने के लिये अनशन धरना और प्रदर्शन करते हैं, सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और राजदलों की चाटुकारिता करते हैं वोट के वादे करते हैं तब सरकार कई सालों में धीरे धीरे फंड देती है. फंड मिलने के बाद- ठीकेदारी और उससे जुडे तमाम जगजाहिर-रहस्य-जिनके प्रमाण जुटाये नहीं जा सकते- के बाद घीमी गति से निर्माण शुरु होता है, सरकार बदलने पर निर्माण रुक जाता है, फिर कुछ जगजाहिर-रहस्यों के समधान के बाद निर्माण कार्य शुरु  होता है. और जनता गदगद भाव से निर्माणकर्ता का गुणगान करते हुये टोल्टैक्स देते हुये आशीष देते हुये चली जाती है.
यदि सरकार निर्माण धन किसी बैंक से कर्ज लेकर करे व बाद में टोल-टैक्स से कर्ज का भुगतान करे तो कुछ हद तक बात बन सकती है.
कुछ और सोचने पर यह समझ में आता है कि सरकार हर वाहन के उत्पादन पर कर लेती है, बिक्रय पर कर लेती है और पंजीकरण पर कर लेती है, पेट्रोल और डीजल पर कर लेती है तो फिर टोल टैक्स क्यों? इतना कर देने के बाद हर वाहन को चलाने का समुचित मार्ग तो मिलना ही चाहिये.
कारपोरेट प्रत्येक उपयोगी उपादान को अपने कब्जे में लेकर उससे असीमित कमाई करना चाहता है. इसलिये अब पीपीपी नया नाम देकर भरमाने की प्रक्रिया जारी है. आखिर कारपोरेट के पास जो धन है वह भी तो जनता का ही धन है. जनता से असीमित माध्यमों से धन लेकर उसी धन से पुनः धन बना रहा है. उनका काम भी ठेके पर ही होता है. आखिर सरकारी काम और कारपोरेट के भी काम ठीके पर ही हो रहे हैं  और उनमें गुणवत्ता का अन्तर है तो मात्र व्यस्थापकों अर्थात सरकारों के भ्रष्टाचार के कारण ही है.
अतः टोल टैक्स वास्तव में भ्रष्टाचार के कारण और भ्रष्टाचार के लिये लिया जाता है. इसे बन्द ही किया जाना चाहिये. अधिकाधिक टोल नाके पर टोलवसूली का ढंग अमानवीय होता है इसलिये भी इसे बन्द किया जाना चाहिये.
नमस्कार.