Saturday, November 15, 2014

शहर से शिक्षा

शहर से शिक्षा

नमस्कार!

हालचाल ठीक है. जिसे गुलाबी जाड़ा कहते हैं अब बीत गया. अखिल भारतीय शिक्षा संघर्ष यात्रा -२०१४ पथ पर है. बाल दिवस बीत गया. फोकस मे नेहरू और मोदी आ गये हैं. आज  भारत मे लोकतंत्र को सशक्त बनाने, सभी भारतीयों के जीवन सतर को जीने लायक बनाने के लिये आवश्यकताओं को क्रम से रखने में सबसे पहले तो बालक ही आयेंगे. उन्हें स्वस्थ और शिक्षित बनाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है. लोकतंत्र में सरकार जनता के धन से व्यवस्था करने का कार्य करती है किन्तु सरकार की प्राथमिकता में राजदल को सत्ता में बनाये रखना पहली प्राथमिकता हो जाती है इसके लिये जनता के धन को  पानी जैसे बहा दिया जाता है. सत्ता सुख सदा बना रहे इसके लिये आगे के लिये आय के स्रोत बनाने के लिये तमाम तरह के कार्य किये जाते हैं. जनता एक सीमा तक इसे उचित मानने के लिये विवश भी है और विवशता में कुछ खुर्चन पाकर संतुष्ट हो जाती है.

नवम्बर २०१४ की "कादम्बिनी " सामने है...क्योंकि शहर एक सपना है यही प्रतिपाद्य है इस अंक का. जुलाई अगस्त में कई शहरों को देखने का अवसर मिला. गांव में जन्म हुआ. तब गांव में प्रसव कराने के लिये, हल चलाने वाले की पत्नी या मां आती थी. हल्दी, बीरो, दूध और मालिश के सहारे जच्चा बच्चा रहते थे. स्कूल जाने का समय आया तो गांव की जिला परिषद द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालय मिला. मिट्टी की दीवार का खपरैल विद्यालय लगभग गिर चुका था. किन्तु हर कक्षा के लिये एक अध्यापक थे. प्रधानाध्यापक पंडित राज किशोर तिवारी ठीक समय पर विद्यालय पहुंच जाते थे. पेंड़ों के नीचे कक्षायें चल जाती थीं एक पक्का कुआं  भी था. पीटी भी होती थी और शनिवार को बालसभा भी. इस लिहाज से मैं एक गंवार आदमी हूं. तमाम विद्वानों के अनुसार मुझे उसी गांव में बने रहना चाहिये था. मेरे पिताजी जिन्हें मैं बाबूजी कहता था नौकरी तो बाहर करते थे किन्तु गांव में ही रहना चाहते थे. यहां तक कि जब देवरिया में नई कालोनी बस रही थी तो मित्रों द्वारा जमीन लेने के सलाह को ठुकारा दिये और उन लोगों के जमीन लेने के निर्णय की आलोचना भी करते थे. किन्तु १९८१ में उन्होंने देवरिया नगरपालिका क्षेत्र में जमीन लेकर आवास बनवा लिया. इस प्रकार मैं नगरवासी बन गया.

देवरिया नगर भी कई गांवों से मिलकर बना है और लगातार विस्तृत होता जा रहा है. हर कस्बा, नगर और महानगर लगातार बढ़ रहा है. अनियोजित ढंग से बढ़ रहा है. नगर का बढ़ना विकास की परिभाषा में भी आता है. गांव में रहकर कौन गंवार बना रहना चाहेगा. यह अवश्य है कि अनियोजित विस्तार के कारण महानगर भी नरक बन चुके हैं इसके लिये सारा दोष दूसरे प्रदेशों से आये कामगारों को दिया जाता है.

मैं अपनी बात स्पष्ट करने के लिये गाजियाबाद के वसुन्धरा कालोनी को लेता हूं जहां अगस्त में एक सप्ताह रहने का अवसर मिला. सड़क, फुटपाथ, और नाली सार्वजनिक ही बन सकती है और उसे साफ करने का उपाय भी सार्वजनिक ही हो सकता है. इस कार्य को संपन्न करने के लिये नगरपालिका ही जिम्मेदार है और उसे यह जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिये. वसुन्धरा में मुझे यह देखने को नहीं मिला. जो लोग भी रहते हैं उनकी तमाम आवश्यकतायें होती है. उन आवश्यकताओं को पूरा करने वाले लोग कहां रहेंगे इसके बारे में योजनाकारों ने नहीं सोचा. घरेलू सहायिका, परिधानशिल्पी, परिधानसंरक्षी, आटोचालक, सुरक्षाकर्मी, वाहनचालक, जलसंसाधन संरक्षक, विद्युत संरक्षक, आदि आदि के लिये भी वास स्थान बनना चाहिये था , नहीं बना तो आधारभूत काम करनेवाले झुग्गियों में रहते हैं. वे उतना अपराध नहीं करते जितना ह्वाइट कालर क्राइम होता है. वे नाली में नहा लेते हैं, कूड़े में रह लेते हैं ताकि कालोनी वाले सुख से जी सकें.

स्मार्ट सिटी चर्चा में है. धनी लोग उसमें रहेंगे सब कुछ स्मार्ट होगा लेकिन रहेगा तो आदमी ही. उसे सेवक चाहिये, अत्यधिक उत्पादित कचरा को किनारे लगाने वाले लोग चाहिये.

शहर में लोग व्यस्त हैं क्योंकि कार्यस्थल पर पहुंचने के लिये चार घंटे से अधिक समय चाहिये. हर कार्यालय, और उत्पाद्शाला तथा कार्यशाला आदि में कार्य करनेवाले यदि अपने कार्यस्थल के बिल्कुल समीप रहें तो आवागमन और जाम की समस्या से मुक्ति मिल सकती है. राजदल के लोग चुनाव के समय हर आवश्यक नियम को अपने सत्तासुख के लिये समाप्त करने का काम छोड़ दें तो हर नगर और गांव तमाम समस्याओं से मुक्त हो जायेगा. किसी कानून को बदलने के लिये लोगों को जीवन का बलिदान करना पड़ता है, तब भी नहीं बदलता किन्तु वोटबैंक के लिये सब खतम.

इन कालोनियों मे शिक्षा और शिक्षालय के लिये कोई सुविचारित और नियोजित व्यवस्था नहीं है. पक्के मकानों में रहनेवाले प्रतियोगिता में अपनी जेबे ढीली करते रहते हैं. प्राथमिक विद्यालयों की सूचना पुस्तिकायें  पांच सौ , हजार की  मिलती हैं किन्तु उनसे यह पता नहीं चलता कि वहां के शिक्षक वास्तव में प्रशिक्षित हैं या नहीं. पचास हजार से लाख रूपये वार्षिक खर्च कर माता पिता रोज होमवर्क कराने को बाध्य हो जाते हैं या ट्यूशन का सहारा ले लेते हैं. बच्चे वाहनों से विद्यालय जाते हैं और आते हैं. पूरब वाले पश्चिम और पश्चिम वाले पूरब जाते हैं.

यदि सभी के लिये एक समान पाठ्यक्रम, शिक्षालय ,शिक्षक की व्यवस्था हो तो नौनिहाल बस्ते के बोझ से दबने से और अभिभावक शुल्क के बोझ से दबने से बच जायेंगे. सरकार शिक्षा उपकर वसूल लेती है किन्तु शिक्षा क्षेत्र की सम्पूर्ण जिम्मेदारी लेने से बच जाती है. भारत के नब्बे प्रतिशत लोग इस शिक्षा को असहायता में झेल रहे हैं क्योंकि वे जिन्हें अपना प्रतिनिधि समझते हैं वे किसी राजदल के नेता के आगे नतमस्तक हैं और वह नेता पूंजी पतियों की बात मानने को मजबूर है. हमारे जैसे लोग हवा का रुख देखकर अपना रुख बदलते रहत हैं. इसका कुफल हमारे नौनिहाल भुगत रहे हैं.

इसलिये हमें केजी से पीजी तक के लिये निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था को  को हर गांव, कस्बा, नगर तथा महानगर तक प्रसारित करना होगा. इसके लिये अखिल भारतीय शिक्षा संघर्ष यात्रा-२०१४ से जुड़िये और विमर्श कीजिये तथा वह करने का प्रयास कीजिये जिससे हर सपने को आसमान मिले.

सुझाव दीजिये.
नमस्कार.


Friday, July 25, 2014

भावताव

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.

इधर भाई लोग इसराइल के गुणगान में व्यस्त हैं, इसराइल को टमाटर बम बनाना चाहिये. भारत जैसे देश में टमाटर वर्षा कर देनी चाहिये.
 
आजकल  आम की  नहीं  टमाटर की चर्चा हो रही हैं. यह तो पता नहीं कि मीडिया के लोग जहां के मूल निवासी हैं वहां सालोंसाल टमाटर फलता है या मौसमी फल है.

यह बात अलग है कि जमाना ग्लोबल है तो हर समय हर चीज मिलती है. दिल्ली वालों को आदत है कि सब कुछ हर समय खायें तो टमाटर इस समय सौ रूपये किलो हो जा रहा तो टीवी का समाचर हो जा रहा है.

सब्जियां मंहगी और सस्ती होती रहती हैं. जब जो सब्जी महंगी  हो उसे खरीदना बंद कर दीजिये. दूध के भाव से टमाटर का भाव मिला लीजिये.

कल एक देहात के बाजार में आलू चौबीस रुपये किलो तथा परवल बीस रुपये किलो मिल रहा था. कभी कभी सेब से मंहगी प्याज मिलती है.

जब किसी सब्जी का भाव बढ़्ता है तो वह वीआईपी बन जाती है. उसे खाने का अधिक मन करता है. और टमातर में तो लाइकोपेन मिलता है. लाइकोपेन वाली गोली दस रुपये मेम एक मिलती है.

सब्जियों के थोक बाजार से खुदरा बाजार मेम जाने और उनके मंहगा हो जाए पर रोज समाचार सुनने को मिल जाते हैं. दवाओं के भाव के समाचार कोई नहीं दिखाता.

इसी पर याद आया रोटी घटना यह पता नहीं कि वहां थाली कितने की मिलती है. भोजन का भाव तो रोज बदलनेवाला है. जिसके कच्चे माल का भाव रोज बदलता है उससे बने सामग्री का भाव साल भर तक एक कैसे हो सकता है.

कुछ लोग कहते हैं कि बिना प्याज के सब्जी कैसे बनेगी कुछ लोग प्याज खाते ही नहीं.

बड़े बड़े शैफ लोग रोज नाना प्रकार के व्यंजन बनाने को बताते हैं उन्हें प्याज टमाटर रहित व्यंजन विधि बताना चाहिये.

जरा पब्लिक स्कूलों के कापी किताब और ड्रेस की ओर भी नजर घुमा लीजिये मीडिया सर. काटजू साहब के बहाने से ही सही हरिशंकर परसाई के नाम पर कचहरी की सैर भी कर लिजिये.
नमस्कार.




Saturday, July 19, 2014

भाषा और भारत

नमस्कार!

हालचाल ठीक है . सावन भी आज मूड में है. पुनर्वसु नक्षत्र का अंतिम दिन है, सुबह से बरसात के दौर चल रहे हैं. बिजली और वर्षा दोनों  का आना जाना लगा हुआ है. सीसैट ने भाषा और अनुवाद दोनों को विवाद के घेरे में ला दिया है. कई  दिनों के बाद सीसैट ( Civil Services Aptitude Test ) का अर्थ जान पाया. अंग्रेजी की एक बड़ी उपयोगिता छोटे नामों को प्रचलित कर देने में है. यह रोमन लिपि का कमाल है. इस कमाल के कारण धोखे भी खूब होते हैं. भारत सिविल शब्द खूब प्रचलित है. पहले हर जिले में सिविल सर्जन और सिविल लाइन होते थे. अब सिविल सर्जन तो नहीं होते किन्तु सिविल लाइन्स और सिविल सर्विसेज का प्रचलन खूब है. भाषा का ऐसा जोड़ तोड़ होता है कि एक बार खेल के मैदान में खेल-ज्योति या मशाल का नाम जब टार्च बोला गया तो मैं आधुनिक टार्च को ही दिमाग में ला सका. आज भी टार्च माने टार्च ही सामने आता है मशाल नही.

भारत में वस्तुनिष्ठता को नास्तिकता से जोड़ दिया गया, इसलिये भारत के बहुत से वैज्ञानिक और विज्ञान विषयों के आचार्य नास्तिकता से बचने के लिये वस्तुनिष्ठता से दूर ही रहना चाहते हैं. वसुधैव कुटुम्बकम का नारा तो देते हैं किन्तु भारत के ही सब लोगों को समानता का  अवसर नहीं देना चाहते हैं.

सिविल सेवा परीक्षा की वस्तुनिष्ठता शुरु से ही संदिग्ध रही है. विषयों का चयन फैशन की तरह बदलता रहा है. आचार्य गण अपने विषय को प्रचलित करने के लिये सर्ल प्रश्न और अधिक अंक  देने का प्रयास करते रहे हैं. आचार्यों की ""वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता"" के चलते यह परीक्षा विवादित रही है.

अभ्यर्थी विवाद और न्यायालय के चक्कर में पड़ना नहीं चाहते रहे. विषेशज्ञ गण अपनी कसौटी के समान दूसरे की कसौटी को मानते नहीं. फलतः तमाम अभ्यर्थी टूट्ते रहे. जो जीता वही सिकन्दर इसके कारण न चुने जाने वाले अयोग्य माने जाते रहे. जो शोधकार्य और प्रदत्त तथा प्रदत्त विश्लेषण प्रकाश में लाये जाते हैं उन्हें अलग से किसी ने जांचने की कोशिश नहीं की, अगर की भी तो वे चर्चित नहीं हुये.

भारत में इन्टरमीडियेट अर्थात १०+२ की परीक्षा प्रत्येक प्रदेश की परिषदें, और कुछ  परिषदें  संचालित कराती हैं. सबका अपना अपना राग है,  अलग राग प्रायः वस्तुनिष्ठता को समाप्त करने के लिये ही होते हैं.

भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन के महानायक अंग्रेजी जानने वाले लोग ही थे. लेकिन लोग तो अंग्रेजी जानते नहीं थे. अतः नेताओं ने जनता से तो हिन्दी और भारतीय भाषाओं में सम्पर्क साधा किन्तु सरकारी कमकाज अंग्रेजी की ओर गया. मुसलमान शासकों के कारण कचहरी की भाषा उर्दू हुई.

मैं जब हाईस्कूल १०वीं कक्षा में था तो उत्तर भरत में हिन्दी आन्दोलन चला था. १२ वीं तक पढाई का माध्यम हिन्दी रहा, उसके बाद माध्यम अंग्रेजी हो गया. हिन्दी माध्यम से पढकर गये छात्र अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें पढ़ लेते थे. अंग्रेजी में परीक्षा दे देते थे किन्तु आपसी बात तो हिन्दी में ही कर पाते थे. बहुत कम लोग बातचीत अंग्रेजी में करते थे.

व्यक्ति की बुद्धि, ज्ञान, विवेक मात्र किसी विदेशी भाषा के आधार पर नहीं जाना जा सकता. विश्व में अंग्रेजी बोलने वाले 5.43% तथा हिन्दी वाले 4.70% बंगाली वाले 3.11% हैं.
http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_languages_by_number_of_native_speakers

एक दूसरे श्रोत के अनुसार मानक हिन्दी जानने वालों की संख्या अंग्रेजी वालों से अधिक है.
Hindi

मानक हिन्दी - Mānak Hindī

Modern Standard Hindi is a standardised variety of the Hindustani language.

It is one of the official languages in India (as Hindi, Urdu) and in Pakistan(as Urdu).
 
hin366 000 000487 000 000
English

has been widely dispersed around the world, it is official language in 83 countries/regions (ISO), spoken in 105 other countries (E).

Curiosity: English language does not have official status in Australia, theUnited Kingdom, and the United States.
http://www.nationsonline.org/oneworld/most_spoken_languages.htm

आजकल भारतीय भाषा वाले सीसैट में संशोधन चाहते  है. तमाम विद्वान यह मानते हैं कि अंग्रेजी जाने बिना मोक्ष ही नहीं मिलेगा तो भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की प्री परीक्षा केवल भारतीय भाषा में होने दीजिये. चयन के बाद प्रशिक्षण में प्रशासनिक अंग्रेजी का लिखित और मौखिक अभ्यास और प्रशिक्षण देकर मोक्ष लायक अंग्रेजी सिखा दीजिये.

आजकल के फैशन के अनुरूप प्रत्येक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में अंग्रेजी को एक विषय के रूप में पढ़ाने की व्यवस्था होनी चाहिये जिसमें आधा ध्यान बोलने पर भी दिया जाना चाहिये.

Tuesday, June 10, 2014

प्यासी ट्रेन

नमस्कार!
हालचाल गरम है.
राजनीति में हारे हुये राजद्लों के नेता जो सुपरनेता के चमत्कार से जीतने की सोच रहे थे अब हारने पर अपनी करनी पर कम नेता की करनी पर अधिक गुस्सा कर रहे हैं. इन दलों की हाल चाल गरम है.

मुझे गर्मी बहुत सताती है फिर भी प्रर्यावरण वालों की बात सोचकर रोज अखबार देखता हूं कि अब लिखा रहे कि गर्मी का नया रिकार्ड बना, लेकिन अभी तक नहीं दिखाई दिया.

पुराने मत से मृगशिर नक्षत्र चल रहा है. २३ जून तक दिन बडा होता चला जायेगा तो गर्मी अब नहीं पडेगी तो कब ? देवरिया मेम पुरवा चल रही है, लोकप्रचलित है कि पुरवा हवा भीतर से गर्म होती है. आठ बजे से ही पुरवा में बसी नमी भाप बन जाती है और गर्मी के साथ साथ हवा की कमी का  अनुभव भी होने लगता है. प्यास बुझती ही नहीं, गर्मी में पानी की कमी एक स्ट्रोक के रूप प्राण भी ले लेती है.

अभी पानी की अनुपल्ब्धता के कारण एक खिलाडी की मौत से कुछ अतीत के जलकष्ट प्रकट हो गये. १९६२-६३ में जून में रात में गोरखपुर से लाररोड आना था. पहले तो टिकट पाना ही मुश्किल रहा. बाबूजी के एक परिचित जो वहीं कार्यरत थे टिकट दिलवा दिये. गाडी में बैठने के बाद मुझे प्यास लगी, अब ट्रेन चलने को थी. तब बगल में बैठे एक  भोजपुरी के कवि ने अपना लोटा दिया और किसी ने लोटा भरकर पानी ला दिया. उन्होंने लोटा या गिलास लेकर ही यात्रा करने की सलाह भी दी.

एकबार इसी तरह के मौसम में इलाहाबाद की यात्रा में जा रहा था तब टू टियर वाले डिब्बे भी चलते थे, जिसमें ऊपर वाली बर्थ सोने के लिये तथा नीचेवाली बैठने के लिये होती थी. डिब्बे में बहुत भीड भी थी. किसी के पास लोटा था. उसने किसी प्रकार दूर नल से पानी मंगा लिया. पानी पी ही रहा था कि एक छोटा बच्चा पानी के लिये चिल्लाने लगा. लोगों के अनुरोध पर उस व्यक्ति ने पानी का लोटा दे दिया. लोटा पाते ही बच्चे का पिता जल्दी-जल्दी पानी पीने लगा. सभी लोग गुस्साये. उस व्यक्ति ने नजर नीची कर के लोटा बच्चे कि ओर बढा दिया.

एक यात्रा बैजनाथ धाम की हुई. यात्रा ठीक ठाक चल रही थी. बोतल वाले पानी का जमाना आ गया था कई बोतल पानी लेकर बैठा था. साथ में भी लोग थे. अब यात्रा पूरी होने वाली थी. सब लोग पानी पीकर अपना बोतल भी फेक चुके थे. अगले स्टेशन पर गाडी रुक गई. घंटे भर के बाद गला सूखने लगा. बगल वाले मित्र से पानी मांगा, उनके पास भी नहीं था. पानी वाले भी नहीं थे. हमारी बोगी  प्लैट्फार्म से काफी दूर थी. किन्तु दूर एक स्टाफ क्वार्टर के सामने इन्डिया मार्क पम्प था दिखाई दिया. बगल वाले मित्र ने अपना और मेरा बोतल लेकर दौडकर पानी भरकर लाया.

लगभग दस साल पह्ले पहली जून को घर से दोपहर में बाजार चला गया मिठाई लेने. मन में आया कि एक रसगुल्ला खाकर पानी पीकर तब चलूं. त्भी मन में बात आई अरे दस मिनट में तो घर पहुंच ही जाऊंगा.  घर तो पहुंच गया किन्तु आकर चारपाई पर लेट गया, पूरा शरीर जल रहा था. लू लग चुकी थी. पसीना बंद हो गया था. आज भी अधिक गर्मी होने पर पसीना बंद हो जाता है और शरीर में जलन होने लगती है.

अंग्रेज हमारे देश  से चले गये किन्तु नेता और अधिकारी जनता को अभी भी मानव नहीं समझते और न उसे पूरा अधिकार देना चाहते हैं. अपने लिये जनता के धन से हर प्रकार की सुविधा लेते हैं किन्तु जनता को सामान्य सुविधा भी नहीं देते. अधिकारी, नेता और ठीकेदार के झगडे में प्लेटफार्म तथा ट्रेनों में चलने वाले लाइसेन्सी वेन्डर गायब हो चुके है. इन्हें ट्रेन के अनुसार लाइसेन्स देना चाहिये, इन्हें रेल की कमाई का हिस्सा भी नहीं बनाना चाहिये. पुलिस, टीटी आदि को इनसे धन उगाही और सामान की उगाही भी नहीं करनी चाहिये. बस इसपर ध्यान देना चाहिए कि गुणवत्ता वाली सामग्री मिले. शायद इस प्रकार की घटना फिर न घटे.

नमस्कार.



Wednesday, May 28, 2014

दो प्रधानमंत्री

नमस्कार!
हाल चाल ठीक है. रोहिणी नक्षत्र की वर्षा ने किसानों मे भी खुशी बांटा और शहरी बाबुओं को भी राहत दिया. रोहिनियां आम अब अधिक मीठे लगेंगे. बाकी आम भी  जल्दी पकेंगे और मीठे भी लगेंगे. लगन का मौसम है ,पकवानों का जोर है. खानेवाले जुटे हुये हैं.
इसी तरह के मौसम में २७ मई, १९६४ को गांव के पडोस में तिलक समारोह था. लाउडस्पीकर पर गाना चल रहा था. बच्चे से बूढे तक जुटे थे. किसी ने आकर बताया आकाशवाणी से समाचार आ रहा है कि पंडित जी नहीं रहे.
लाउडस्पीकर बन्द हो गया. सन्नाटे में तिलक सम्पन्न हो गया. वह शाम पंडित जी की चर्चा मे बीता. लोगों को लग रहा था कि उनका कोई सगा नहीं रहा.
तब तक प्रथम पंचवर्षीय योजना के तहत ट्यूबवेल मेरे गांव में भी लग गया था, उसकी लम्बी नहरों से सिंचाई की सुविधा भी हो गई थी. उस समय साम्यवादी दल भी गांव में दाखिल हो गया था. नैनीताल मे जमीन पाये लोग रोज नेहरु-गांधी की गाथा भी गा रहे थे. लोकगीतों मे गान्धी, नेहरु व कांग्रेस की चर्चा होती थी. विवाह समारोह में प्रहसन-गाली- गीत में  भी गान्धी, नेहरू व कांग्रेस की चर्चा थी .
ऐसे परिवेश में पले बढे सम्वेदनशील लोगों के मानस पटल पर एक व्यक्तित्व अपनी जगह बना लिया. आधुनिक भारत को तेजी से विकसित राष्ट्रों की तरह बनाने का नेहरू का सपना चीनी आक्रमण से टूट गया और दिल भी. देश तो चलता ही रहेगा. लेकिन उसकी गुणवत्ता भूतकाल की नींव और वर्तमान के कर्म पर निर्भर होती है. आज नेहरू- नीति प्रश्नवाचक है किन्तु उनका भारत के निर्माण का सपना नहीं.

२९ मई,  १९८७ चौधरी चरण सिंह की पुण्यतिथि है, मेरे होश में चरण सिंह घोर नेहरू विरोधी थे. कांग्रेस के कुलवाद के भी विरोधी थे. उन्हें सख्त प्रशासक माना जाता था. जब वे मुख्यमंत्री हुये तो कार्यालय १० बजे माने १०बजे खुलने लगे. सरकारी कर्मचारी समयपालन करने लगे. जनता की एक शिकायत पर प्रशासन दौडता था. मेरे गांव के एक व्यक्ति ने पोस्ट्कार्ड पर शिकायत भेज दी थी. देवरिया से अधिकारी बरसात में भींगते, कीचड में चलकर गांव पहुंचे. हम बच्चों पर बहुत गहरा प्रभाव पडा. किन्तु वार्धक्य आते आते उनका भी मन कुर्सीमय और परिवारवादी हो गया. उन्हें अपने दल भारतीय क्रान्तिदल का कोई कार्यकर्ता योग्य नहीं लगा और इस प्रकार एक और कुनबा दल बन गया.

दोनों को श्रद्धांजलि.
नमस्कार.

अरविन्द की जेल यात्रा

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने नितिन गडकरी मानहानि केस में जेल जाना स्वीकार किया. उनका कहना था कि वे न्यायालय की सूचना पर उपस्थित हो गए हैं, और आगे भी आते रहेंगे, यह लिखकर दे दे रहे हैं, लेकिन विधि के अनुसार या माननीय न्यायमूर्ति के विवेक के अनुसार उनका कहना त्रुटिपूर्ण था. उन्हें जेल भेज दिया गया. न्यायमूर्ति ने उन्हें उच्च न्यायालय में जाने को सलाह दिया. उच्च न्यायालय ने उन्हें पहले जेल से बाहर आने कि कार्यवाही कर लेने की सलाह दी उन्होंने वैसा ही किया.

काका हाथरसी ने कहा है कि "सांई ये न बिरुद्धिये....." यद्यपि इसमें पत्रकारों और मीडिया का नाम नहीं है किन्तु अरविन्द ने इनका विरोध कर दिया. उनका विरोध कर दिया जो मंत्री बनाते बिगाडते हैं. यह सबसे बडा बंधुआ मजूर वाला क्षेत्र है. कुछ लोगों को खूब पगार मिलती है बाकी को लालीपाप. कस्बे से लेकर राजधानी तक मीडियाकर क्या क्या करते हैं ये सब  जानते हैं. एक शब्द है साक्षीभाव अर्थात परिघटना को राग द्वेश और संवेग से मुक्त होकर देखना. मीडियाकर को इसीभाव से समाचार लिखना चाहिये. एक शब्द है मीडिया प्रबन्धन. इसे भी मीडिया वाले ही जानते हैं, लोग भी जानते हैं.  भारत में लोग "बूझि मनहिं मन रहिये" "सामने कह कर तो देखे" के चलते किसी को कुछ कहना ठीक नहीं समझते हैं और कोर्ट कचहरी से भी डरते हैं.

भाई मीडियाकर लोग, अम्बेडकरवादी लोग, वामपंथी लोग, अन्नावादी लोग और प्रतिद्वन्द्वी राजदल वाले सभी अरविंद के जेल जाने का परिहास ही करते दिख रहे हैं.

केजरीवाल के जेल जाने से लोग इतने नाराज क्यों हैं. भारत की जेलों तमाम ऐसे लोग बन्द हैं जिन्हें वहां नहीं होना चाहिये. वे जमानत की न्यायिक प्रक्रिया के कारण जेल मे हैं. कचहरी के खर्च के लिये धन न जुटाने के कारण जेल मे हैं.

अभी कुछ दिनों पहले मीडिया में हंगामा हुआ था जब एक पुत्र ने वर्षों की मेहनत के बाद अपनी माता को जेल से रिहा कराया था.

जब देश के न्यायाधीश, शिक्षक, और पत्रकार/मीडियाकर आत्मनिरीक्षण न कर विवेक के स्थान पर अधिवक्ता की तरह पक्षपातपूर्ण तर्क का सहारा लेंगे तो देश का नैतिक पतन होगा.

नमस्कार.

शिक्षा बनाम शिक्षा

नमस्कार!
हालचाल  ठीक है.
मेरे लिये यह हर्ष का विषय है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सबसे युवा कैबिनेट मंत्री मिला है. मननीया स्मृति ईरानी महोदया सफल हैं या असफल यह तो कुछ समय बाद पता चलेगा.
अगर मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने में सफल हो जांय तो सफल मंत्री सिद्ध होंगी.
पांच साल में शिक्षा का व्यय ६.५ % पहुंचाने में कामयाबी भाजपा और देश दोनों के लिये उत्तम होगा.
शिक्षित और कौशल प्रशिक्षित युवक ही देश को आगे बढा सकता है.
देश के प्रत्येक विकास खण्ड में एक औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान खोल दिया जाय और सर्वशिक्षा अभियान के तहत प्रत्येक बालक को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के इन्फ्रास्ट्रक्चर, पाठ्यक्रम और शिक्षक मिल जाय तो ही भारत का विकास होगा, विदेशी निवेश से नहीं.
आधुनिक भारत का अपना शिक्षा का माडल होना चाहिये. अब तक के विद्वान मम्त्रियों के कार्यकाल के कारण भारत का कोई भी शिक्षण संस्थान विश्व के टाप टेन मे नहीं है. यदि सालभर के अन्दर पांच शिक्षण संस्थान उस श्रेणी में आ जायें तो लगेगा कि कोई युवा मंत्री आया है.
शिक्षा के क्षेत्र में हर प्रोफेसर कुलपति और फिर मानव संसाधन विकास मंत्री बन जाना चाहता है. जो प्रोफेसर एक विश्वविद्यालय नहीं सम्भाल पाते वे मंत्रालय क्या संभालेंगे. अपनी कक्षा अपने शोधछात्रों से पढवा लेना, जातिवाद और क्षेत्रवाद करना, अपने शोधछात्रों को ही काबिल समझ कर उनकी नियुक्तियां कराना, वस्तुनिष्ठता से कोसों दूर रहना और अपने शोधछात्रों का शोषण करना और अब तो धन ले दे कर नियुक्तियां कराना ही अधिकाधिक प्रोफेसरों का काम रह गया है. जो निष्ठावान, शिक्षा, शिक्षक, शिक्षार्थी के प्रतिबद्ध प्रोफेसर हैं कृपया इस टिप्पडी पर नाराज होने के पहले अपने मित्रों को ध्यान में अवश्य रखें.
एक युवा मंत्री भारतीय शिक्षा में क्रांतिकारी सिद्ध हो इसी शुभकामना के साथ.
नमस्कार.
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Saturday, May 17, 2014

नई सरकार क्या दूर करेगी भ्रष्टाचार?

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. मोदी सरकार बनने वाली है. भाजपा सहयोग लेकर पास हो गई. तृतीय श्रेणी मिली है. लेकिन जनता पार्टी के बाद कांग्रेस को छोडकर भाजपा ही एक राज दल इस समय बचा था. बाम दल व्यक्तिवाद की राजनीति में डूब चुका है उसका उबरना चमत्कार ही होगा. एक वैकल्पिक राजदल उभर रहा है. लेकिन लोकसभा की परीक्षा को पास करना मुश्किल  लग रहा था. लेकिन आआपा  व्यूह कारपोरेट ने तोड दिया. मध्यवर्ग भ्रष्टाचार से त्रस्त तो है किन्तु सीधे  लडना नहीं चाहता, घरबारी आदमी बच बचाकर जी मरते मरते जी लेता है. पैसे वाला मध्यवर्ग नजराना, जबराना, शुकराना, फिरौती मनौती आदि से अपना काम साध लेता है. बीस लाख देकर भी नौकरी मिल जाय तो वह नौकरी दिलाने वाले की आजीवन चरण वन्दना करता रहता है. ऐसी स्थिति में आम आदमी पार्टी को क्या मिलता.

आज के अखबार "रविवासरीय हिन्दुस्तान " में हिन्दुस्तान हिन्दी समूह के सम्पादक श्री शशि शेखर जी का सम्पादकीय निकला है. प्रथम पृष्ठ पर जरूर पढने का निर्देश या आग्रह भी छपा है "नरेन्द्र मोदी को जो करना है"- महगाई और बेरोजगारी को पहला एजेन्डा माना गया है. मैं शशि शेखर के विचारों से प्रायः सहमत नहीं हो पाता हूं. इसलिये आज की असहमति पूर्वाग्रह पूर्ण हो सकती है.

मैं भ्रष्टाचार को ही भारत की दुर्दशा का कारण मानता हूं और मंहगाई तथा बेरोजगारी को उसका बाई प्रोडक्ट. भ्रष्टाचार के कारण रोज बनने वाला काला धन महगाई का पहला कारण है. मंत्रालयों से अस्सी प्रतिशत  लीकेज वाली योजनायें बनाकर पैसा वसूल कर चेक भेजने की परम्परा काला धन भी बनाती है तथा मंत्रालय के लिये मंत्रियों में मार भी कराती हैं. मंत्रालय का बंटवारा योग्यतानुसार न कर राजनैतिक ब्लैकमेलिंग की क्षमता के अनुसार कराने में भ्रष्ट धन की ललक भी छिपी होती है.

भ्रष्टाचार के चलते जनता की जेब से जो अप्रत्यक्ष  कर(  टैक्स) जाता है उसका अधिकतम पचीस प्रतिशत भाग ही सरकार तक पहुंचता है. अतः सरकार पैसे की कमी के नाम पर  नियुक्तियां नहीं करती है और बेरोजगारी बढती है. पूर्व प्रधानमंत्री आई यम यफ की राय पर  सरकारी खर्चे की कटौती के नाम पर सरकारी नियुक्तियों पर रोक लगाकर बेरोजगारी बढा दी . बहुत सारे लोग बेरोजगारी के लिये आबादी को दोष मढ देंगे. किन्तु हमारी आबादी का घनत्व जापान से कम है. सभी सरकारी क्षेत्रों में लगभग चारगुने पद रिक्त हैं. जब ये पद भर जायेंगे तो इसके कारण बहुत रोजगार सृजित हो जायेगा.

भ्रष्टाचार के कारण शिक्षा  की गुणवत्ता का ह्रास होता चला जा रहा है. विद्यालयों की मान्यता के लिये रजभवन तक में फिरौती चल रही है. ऐसे विद्यालयों  से शिक्षा प्राप्त करने वाले लोग भ्रष्टाचार के अतिरिक्त कुछ नहीं करेंगे. ये कामचोर कर्मचारी बनेंगे.

इसलिये भारत में भ्रष्टाचार ही समस्या है. भारतीय संस्कृति की बात करने वाले वैलेन्टाइन डे पर हंगामा करने, स्कर्ट की साइज नापने की बजाय भ्रष्टों को निशाना बनायें. स्वयं भ्रष्टाचार और सत्ता मद से बचें तो भारत का भला होगा.

रामदेव जी कालाधन वापस मंगा लिजियेगा तीन साल बाद ही मंगा लीजियेगा, अभी तो अपने उत्पादों की गुण्वत्ता सुधारिये तथा अपने उत्पादों के विक्रेताओं से पक्की रसीद दिलवाने की व्यवस्था तो कर दीजिये.

राष्ट्रीय सवयं सेवक संघ, और विश्व हिन्दु परिषद भारत को वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त देखने के लिये उतना ही श्रम करने को तैयार है जितना सरकार बनाने के लिये?
फिर मिलेंगे.
नमस्कार.

Sunday, March 23, 2014

२३ मार्च २०१४-२

नमस्कार!
हालचाल ठीक है,

आज  विधान परिषद उ.प्र. के गोररखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिये मतदान हुआ. यह चुनाव भी चुनाव आयोग ही कराता है. प्रदेश में जितने भी विद्यालय और शिक्षक हैं  उसकी सूची शासन के पास है. निर्वाचन आयोग उससे कोई सूचना न प्राप्त कर मतदाता से आवेदन पत्र लेता है. जबकि प्रत्येक जनपद से फोटोयुक्त मतदाता सूची और पहचान पत्र निर्गत किया जा सकता है. प्रति चुनाव सूची के नवीनीकरण में बहुत सारे खिलाडी अपना खेल करते हैं.

शिक्षक विधायक अब शिक्षा-शिक्षार्थी-शिक्षक की बात नहीं करता. विधायक बनने के अपने सुख हैं उन्हीं सुखों की लालसा इन्हें इधर लाती है. चुनाव के बाद शिक्षकों से  सम्पर्क में बने रहना और शिक्षा के हित के लिये संघर्ष बनाये रखने में य सभी लोग असमर्थ हैं. उत्तर प्रदेश की शिक्षा प्रत्येक स्तर पर चौपट हो चुकी है. जब मैं यह लिख रहा हूं तो बहुत से लोगों के प्रश्न सामने आ जायेंगे. उन सभी से निवेदन है कि कभी सौ दो सौ किसी भी स्तर के विद्यार्थियों का उपयुक्त सैम्पल लेकर जाम्च कर लें. ५-१०% ही उपयुक्त विद्यार्थी मिलेंगे.

सीयनबीसी आवाज एक व्यवसआयिक चैनल है. यहा पर उद्योगपतियों के हितों की चर्चा होती रहती है. यहाम पर उद्योगपतियों का नये प्रधानमंत्री के लिये तय हो रहा है. क्या कोई चैनेल नागरिकों का एजेन्डा भी बनायेगा?
जनता को इसके लिये आगे आना चाहिये. केवल विकास......विकास...... विकास ......का क्या अर्थ. राजदल केवल विकास बता रहे हैं. उन्हें बताना चाहिये कि हमें शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका,और न्याय चाहिये.
नमस्कार.

२३ मार्च २०१४

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
रविवार का दिन है. छुट्टी का दिन है. आज शहीद दिवस  है, देश दुनिया और आदमी की हालत  पर सोचने का दिन है. साल भर में आदमी को एक बार तो सोचना ही चाहिये कि आदमी को कैसे जीना चाहिये और वह कैसे जी रहा है. राजा भी आदमी है, दरबारी भी आदमी. रंक भी आदमी भिखारी भी आदमी. अपने हिस्से की आजादी लेते लेते आदमी दूसरे की आजादी छीन लेता है. एक वक्त की रोटी खाने के बाद पीढियों तक राज करने का सपना आने लगता है
.
२३ मार्च को कुछ लोग शहीदों की कुर्बानी को याद करने की कोशिश करते हैं. कुछ कर्मकांड भी होते हैं. बहुत से लोग इसी बात से डरने लगते हैं. हर छोटा या बडा बास भगत सिंह के नाम से घबराने लगता है. राजदल तो घबराहट में उन्हें ब्रह्म जैसे पूजते हैं. भारत इस वर्ष अपने सांसदों नहीं प्रधानमंत्री का चुनाव करने जा रहा है. या कहें कुछ लोग अपने में से किसी एक को प्रधानमंत्री बनवाना चाहते हैं ऐसी स्थिति में भगत सिंह का संदर्भ लेते हुये क्या करना चाहिये, क्या जो हम चाह्ते हैं कर पायेंगे, तमाम स्थितियों में हम उसे नहीं करते जो हम करना चाहते हैं हम उसे करते हैं जिसे लोग चाहते हैं.

एक पांच अंकों वाला धारावाहिक " सत्यमेव जयते" नाम से प्रसारित हो रहा है जो मार्च के हर रविवार को प्रसारित होगा. आज चौथा अंक प्रसारित हुआ. इस अंक में आम आदमी को जागरूक करने के लिये पूरा प्रयास किया गया है.

भारत के प्रति व्यक्ति सम्पत्ति की स्थिति बतायी गयी. मीडिया द्वारा प्रसारित करदाता के भ्रम को तोडने का प्रयास किया गया. भारत के भ्रष्टाचार की स्थिति बतायी  गयी. संघर्ष और निर्माण की भूमिका रेखांकित की गयी. सूचना के अधिकार के प्रयोग के लिये प्रेरित किया गया.

मुझे लगता है कि सोसल मीडिया के द्वारा जनता को सभी राजदलों को नागरिक एजेन्डा बताने की आवश्यकता है. सभी दल जनता को मूर्ख बनाकर अपनी कुर्सी पक्की करना चाहते हैं. उन्हें प्रतिनिधि बनाना पडेगा.
नमस्कार!
फिर मिलेंगे.
धन्यवाद.

Sunday, February 2, 2014

"आम आदमी और आम आदमी पार्टी"

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
रविवार का दिन, धूप का अभाव, फेसबुक की खींच, टीवी की खींच, रजाई की खींच हीटर की खीच .......फेसबुक ही जीत जाता है. कभी-कभी ब्लाग भी.
इस जाडे में  मफलर और चाय में जंग हो रही है. मफलर वाला भी नया है. चायवाला अचानक चायवाला बन गया. विज्ञापन कम्पनियां जिसको जब चाहे नककटवा बना दें.
केजरीवाल की हिट्लिस्ट पुआल की आग जैसे गर्मी दे रही है. सर्वविदित रहस्य की चर्चा जब कोई करता है तो सभी प्रमाण मांगते हैं. इस देश के बहुत सारे सत्य कभी कचहरी में प्रमाणित नहीं हो सकते. कोई राजदल यह नहीं दावा कर सकता कि उसके शासन काल में काला धन नहीं बनेगा.
आजकल आरोप लग रहा है कि केजरीवाल को शासन करने नहीं आता. आरोप लगाने वाले अपने शासन को देखते ही नहीं. दिल्ली में पुलिस ( गृहमंत्री) की कार्य कुशलता रोज ही दिखाई देती है.
किसी भी दूर जाने वाली रेलगाडी ( रेल मंत्रालय )  में टिकट भारत निर्माण और शाइनिंग इंडिया दोनों की याद दिला देता है.
सेना की स्थिति और सैन्य साजो-सामान की शीघ्र आपूर्ति और नियुक्तियां (रक्षा मंत्रालय ) की कार्य कुशलता बताती रहतीं हैं
इस देश में बिकनेवाले तमाम साजोसामान भारतीय भाषा में निर्देश भी नहीं देते हैं. तमाम वैधानिक चेतावनियों को पढने के लिये सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है. ( गृह मंत्रालय ) की कार्य कुशलता.
पूरे देश में कुछ स्थानों को छोडकर किसी को भी समय से  रसोई गैस की आपूर्ति नहीं हो पाती. आपूर्ति कोई मुद्दा भी नही है. रात को दो बजे से लाइन लगाने वाले जिन्दाबाद. ( पेट्रोल मंत्रालय की कार्य कुशलता)
देश के सभी पढनेवालों के लिये शिक्षा संस्थान नहीं है. छात्रों का अधिकाधिक समय प्रतीक्षा में ही कट जाता है. यहां तक कि दिल्ली में भी विद्यालयों की कमी है. (शिक्षा मंत्रालय की कार्य-कुशलता)
न्यायालयों में लम्बित पडे मुकदमें विधि मंत्रालय की कार्यकुशलता दिखाते हैं.
यह सब देखने के बाद लगता है कि " आप" को कुछ दिया जाना चाहिये.
आप को छूट की आशा नहीं करनी चाहिये. आप का मूल्यांकन प्रतिदिन के हिसाब से किया जाना चाहिये. दिल्ली सरकार के प्रत्येक मंत्रालय का काम तीब्र गति से होना चाहिये. मैंने कहीं पढा था कि बिडला की कम्पनी में प्रतिदिन की पडता प्रडाली से मूल्यांकन होता है. "आआप" को इसे दिल्ली सरकार के कार्य प्रणाली के लिये उपयोग में लाना चाहिये. इसके लिये मूल्यांकन की एक वस्तुनिष्ठ प्रणाली विकसित कि जानी चाहिये. आज के जमाने में किसी को सच या झूठ सिद्ध करना मीडिया के हाथ में है.
भारती जी के छापे को लेकर बहुत आलोचनायें हुईं. किन्तु अभी तक वस्तुस्थिति सामने नहीं आ सकी.
तमाम आलोचक आप की आलोचना खाप को लेकर भी कर रहे है.
कुछ अति महत्वाकांक्षी लोग आप के सदस्य बने हैं. आये दिन कुछ लोग आप की आलोचना कर अपनी छवि बनायेंगे. दूसरे दलों में जगह बनाने के लिये यह एक अच्छा अवसर है. मोबाइल से आप का सदस्य बनिये सौ ऐसे ही सदस्यों के सहारे  दूसरे दल में अपना टिकट पक्का कीजिये.
राजनीति में बाहुबल, धनबल, जनबल सभी से अधिक बलवान छलबल है. लंगीबाजी राजनीति भी चलती रहती है.
आम आदमी भी आज की राजनीति में केवल यही जानना चाहता है कि कौन जीतेगा.?
वास्तविक प्रश्न है किसे मत दें दल को या व्यक्ति को?
चुनाव की कसौटी क्या है?
हमें अपने निर्णय पर रहना चाहिये या जीतनेवाले के साथ हो जाना चहिये.
नमस्कार.
 

Friday, January 31, 2014

बसन्त/बजट

 बसन्त बजट
नमस्कार!
हालचाल ठीक है,
चार फरवरी को बसन्तपंचमी है. जिसका प्रचलन कम होता जा रहा है, आउट आफ फैशन. वैलेन्टाइन डे या चौदह फरवरी नया बसन्तोत्सव दिवस है. जो अंग्रेजी पर्व है वह नवउदारवादी व्यापार को मदद करनेवाला होता जा रहा है. अमिताभ बच्चन और हेमामालिनी ने बागवान फिल्म के माध्यम से अपने समवयस्कों को भी वैलेन्टाइन डे से जोड दिया है. मोबाइल और स्मार्टफोन और विज्ञापन सब कुछ मिलाकर बसन्त को अधिक रंगीन करने पर जोर दे रहे हैं. 
इस वर्ष का जाडा है जाने का नाम ही नहीं लेता,  लोग बसन्तपंचमी को भी दांत कटकटाते हुये मिलेंगे. परसो नेट पर देख कर कह दिया कि मौनी अमावस्या को धूप होगी. किसी ने कहा बसन्तपंचमी तक जाडा ऐसे ही बना रहेगा, किसी और ने कहा आठ फरवरी तक. इस वर्ष आधा पूरा माघे कम्बल कांधे रहेगा. 
इधर बसन्त का दस्तक होता है और टैक्स विशेषज्ञ आयकर का राग अलापने लगते हैं. आयकर विभाग का नाम सुनते ही भय हो जाता है. उनकी हर चिट्ठी में दंड का जिक्र होता है. बचपन में गांव में मालगुजारी वाले लाल पगडी और मोटा डंडा लेकर आते और लोगों के बैल खोलकर लेकर चले जाते (तब हल और बैलों से जुताई होती थी) . पीछे-पीछे किसान, हाथ जोडते, माई बाप करते पहुंच जाते. अजकल भी हर सरकारी विभाग और  कर्मचारी सरकार ही कहलाना पसन्द करते हैं.
बजट में सबसे चर्चित आयकर ही है. वैट को लोग ध्यान नहीं देते, उत्पाद कर को कोई पूछता ही नहीं, सेवाकर का भी यही हाल है. सारे लोगों की निगाह में मध्यवर्ग की एक नम्बर की आमदनी निगाह में होती है. आयकर भी कई तरह का होता है. आजकल, कभी महिला कभी वरिष्ठ नागरिक, हिन्दू अविभक्त परिवार आदि कई तरह से जोडा जाता है. पता नहीं कितनी धाराओं छूट मिलती है.
१-मुझे लगता है कि व्यक्ति के लिये सबसे अधिक व्यय का काल ३५-६० वर्ष तक का होता है. इसलिये अस आयु वर्ग के लोगों को छूट मिलनी चाहिये.
२- आय का योग समस्त स्रोत से कर लिया जाता है किन्तु उस आय पर कितने जीवन निर्वाह करते हैं इसका ध्यान नहीं रखा जाता है. आश्रित संतति या माता, पिता, भाई का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा जाता. प्रत्येक परिवार में प्रति व्यक्ति आमदनी के आधार पर ही कर लगाया जाना चाहिये.
३- एक व्यक्ति के सामान्य और गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिये प्रतिव्यक्ति व्यय के अनुसार आमद्नी को करमुक्त रखना चाहिये. इसे प्रतिवर्ष फुटकर मूल्य सूचकांक के अनुसार बदला जाना चाहिये. जैसे पिछले वित्तवर्ष में दो लाख था तो इस वित्त वर्ष में दो लाख पचीस हजार होना चाहिये.
४- बचत पर छूट के भी तमाम अभ्यास हुये अब इसे एक लाख किया गया है. जिसकी आमदनी तीन लाख है उसे भी एक लाख तथा जिसकी आमदनी बीस लाख है उसे भी एक लाख. सामान्यतः इसे तीस प्रतिशत  कर देना चाहिये और इसकी सीमा भी दस लाख तक ले जाना चाहिये. 
५- आयकर की तीन दरें ही है. १०%, २०%और ३०%. इसे निम्न प्रकार करना चाहिये-
                   ५ लाख तक ५%
                 १० लाख तक १०%
               १५ लाख तक १५%
               २० लाख तक २०% 
               २५ लाख तक २५% 
                 १ करोड तक ३०%
                 २ करोड तक ३५% 
                 अधिक पर ४०%
६- बकायेदारों और कर प्रवंचकों को तरह तरह की छू ट मिलती है किन्तु जो समय से पूर्व अप्रैल से कर देते हैं उन्हें कोई छूट नहीं मिलती है. जो जितना पहले से जितना अधिक कर दे उसे उतना ही अधिक छू ट देना चाहिये. जो सारा भुगतान अप्रैल में कर दे उसे और छूट देना चाहिये. 
इस  ठंढ को बचाने में आयकर और बजट की गर्मी से कुछ राहत मिली है शायद आपको भी राहत मिले. 
नमस्कार.

Thursday, January 30, 2014

बापू जी नमस्कार

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
आज मौनी अमावस्या है. मौन रहकर स्नान करने का दिन. भारतीय परम्परा का एक पर्व, समारोह, मेला, सेमिनार सबकुछ. इस सेमिनार में लोग कुछ ज्ञान देते हैं कुछ लेते हैं. अपना खाना लेकर जाते हैं. कुछ दूसरे का खाते हैं दूसरे को खिलाते हैं.
अभी लम्बे काल तक यह पर्व चलेगा. अभी सेमिनारों और उनके द्वारा प्राप्त निष्कर्षों का जो हाल है, सबको पता है उससे कुछ को धन और कुछ को मान तथा कुछ को भविष्य के लिये प्रमाण-पत्र मिल जाता है. इस तरह के सेमिनार माघ मेला जैसे नहीं हो गयें हैं. जो सेमिनार में न जाय उसे उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिये.
आज ३० जनवरी है. अहिंसा के पुजारी को भारत में गोली मार दी गयी. तमाम लोग दुखी हुये और कुछ मिठाई भी बांटे. आज भी गांधी का मूल्यांकन जारी है. गांधी की हत्या में सम्मिलित लोगों को कोई अपराधबोध नहीं है.
भारत की स्वतंत्रता के जितने भी कारण गिनाये जाय उसमें सबसे अधिक योगदान गांधी का माना जाता है. वर्तमान लोकसेवक और जनसेवक दोनों ही गांधी का नाम जरुर लेते हैं. भारत के राज-काज में गांधी की रेखा दिखाई देती रहती है. कम से कम  साल में दो बार सरकार और अखबार उनको चर्चा में ला देते हैं.
२९ जनवरी २०१४ को बीटिंग-रिट्रीट समारोह में २०सालों बाद पुरानी स्वर्णिम बघ्घी पर सवार होकर भारत के राष्ट्रपति समारोह मेम सम्मिलित होने आये.
गांघी के सिद्धान्त तो मानने वालों के लिये ही हैं. भारत के गवर्नर जनरल को कितना खर्च करना चहिये इसपर गांधी जी टिप्पणी किये थे. आज राष्ट्रपति पर भारत के औसत प्रति व्यक्ति आमदनी के किते गुना व्यय होता है इसका भी लेखा किसी न किसी के पास होगा. अन्तिम व्यक्ति कीआमदनी का हिसाब भी किसी न किसी के पास होगा ही.
आज जो लोग राजघाट गये होंगे उन सभी के दिलों को गांधी प्रेरित नहीं कर सकते. गांधी की प्रेरणा उन्हीं को मिलेगी जो उनसे प्रेरणा लेना चाहेंगे. फिर भी मैं आशा करता हूं कि इरोम शर्मिला को न्याय मिलेगा. देश के अन्तिम व्यक्ति को भी अच्छी शिक्षा मिलेगी. सभी के सवास्थ्य की देख्रेख हो जायेगी.
लुटियन दिल्ली  की सभी इमारतों को गिरा करके अंग्रेजों की गुलामी के अवशेष समाप्त कर दिये जायेंगे. वहां पर आधुनिक जनतंत्र के मानक के अनुसार भवन बनेगे. जनता को अपनी बात कहने के लिये एक विशाल मैदान मिलेगा.
बापू जी नमस्कार.

Tuesday, January 28, 2014

टोल क्यों?

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
इस घोर ठंढ में भी टैक्स और टोल का नाम सुनकर पसीना छूट जाता है. भारत का हर नागरिक कर देता है. भारत सरकार को, प्रदेश सरकार को, जिला पंचायत को, नगर/गांव को . पुल/सडकें जनता के कर से बनतीं हैं. जब तैयार हो जाती हैं तो टोल टैक्स की वसूली शुरु हो जाती है. हमलोग भी सोचते हैं कि सरकार ने दयाकर के सडक/पुल बना दिया, अब  इसके लिये पैसा वसूल रही है तो ठीक ही है.
जब जनता के धन से ही उसका निर्माण हुआ तो फिर अतिरिक्त धन कैसा? टोल जो वसूला जाता है ठेकेदारी प्रथा से वसूला जाता है. जनता से जो धन जाता है उसका अधिकाधिक अंश इन्हीं ठीकेदारों के पास जाता है. इस प्रकार यह केवल टोल ठीकेदारों और उनसे मिले हुये लोगों के लिये ही वसूला जाता है.
सरकार और तमाम लोग इस पर प्रश्न उठायेंगे कि आखिर सरकार के पास धन कहां से आयेगा?
लोग सडक और पुल बनाने के लिये अनशन धरना और प्रदर्शन करते हैं, सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और राजदलों की चाटुकारिता करते हैं वोट के वादे करते हैं तब सरकार कई सालों में धीरे धीरे फंड देती है. फंड मिलने के बाद- ठीकेदारी और उससे जुडे तमाम जगजाहिर-रहस्य-जिनके प्रमाण जुटाये नहीं जा सकते- के बाद घीमी गति से निर्माण शुरु होता है, सरकार बदलने पर निर्माण रुक जाता है, फिर कुछ जगजाहिर-रहस्यों के समधान के बाद निर्माण कार्य शुरु  होता है. और जनता गदगद भाव से निर्माणकर्ता का गुणगान करते हुये टोल्टैक्स देते हुये आशीष देते हुये चली जाती है.
यदि सरकार निर्माण धन किसी बैंक से कर्ज लेकर करे व बाद में टोल-टैक्स से कर्ज का भुगतान करे तो कुछ हद तक बात बन सकती है.
कुछ और सोचने पर यह समझ में आता है कि सरकार हर वाहन के उत्पादन पर कर लेती है, बिक्रय पर कर लेती है और पंजीकरण पर कर लेती है, पेट्रोल और डीजल पर कर लेती है तो फिर टोल टैक्स क्यों? इतना कर देने के बाद हर वाहन को चलाने का समुचित मार्ग तो मिलना ही चाहिये.
कारपोरेट प्रत्येक उपयोगी उपादान को अपने कब्जे में लेकर उससे असीमित कमाई करना चाहता है. इसलिये अब पीपीपी नया नाम देकर भरमाने की प्रक्रिया जारी है. आखिर कारपोरेट के पास जो धन है वह भी तो जनता का ही धन है. जनता से असीमित माध्यमों से धन लेकर उसी धन से पुनः धन बना रहा है. उनका काम भी ठेके पर ही होता है. आखिर सरकारी काम और कारपोरेट के भी काम ठीके पर ही हो रहे हैं  और उनमें गुणवत्ता का अन्तर है तो मात्र व्यस्थापकों अर्थात सरकारों के भ्रष्टाचार के कारण ही है.
अतः टोल टैक्स वास्तव में भ्रष्टाचार के कारण और भ्रष्टाचार के लिये लिया जाता है. इसे बन्द ही किया जाना चाहिये. अधिकाधिक टोल नाके पर टोलवसूली का ढंग अमानवीय होता है इसलिये भी इसे बन्द किया जाना चाहिये.
नमस्कार.

Monday, January 27, 2014

भावत माता की जय

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
इस वर्ष २६ जनवरी को देवरिया में ठंढक बहुत थी, तेज हवा भी. कालेज गया था. झंडा फहराने के साथ उच्च शिक्षा निदेशक के पत्र का वाचन सुना. महाविद्यालय के जलपान समारोह के बाद घर के लिये मिठाई लिया. २६ जनवरी राष्ट्रीय पर्व के साथ बडी पुत्री के विवाह का दिन भी है.
कैमरा साथ ले गया था. ठंढ के कारण साहस नहीं हुआ. केवल रास्ते में पांच चित्र लिये. तीन को फेसबुक पर लगा दिया.
घर आकर बाहर निकला पुष्पों का छायाचित्र लेने. आजकल कुछ पुष्पों का रोज छाया चित्र लेकर उन्हें ही फेसबुक पर लगाता रहता हूं. बाहर निकट के विद्यालय के छोटे बच्चे समारोह से उल्लास के साथ लौट रहे थे.
अपना बचपन याद आया. एक दिन तो झंडा बनाने और कईन ( बांस की टहनी)  की व्यवस्था में लग जाता था. झंडा ऊंचा करने के लिये एक बित्ते (लगभग नौ इन्च) के झंडे में दस फुट की टहनी. हंसी भी आरही थी. आजकल बनाबनाया प्लास्टिक का सुन्दर झंडा मिलता है.
तीन बच्चों में से सबसे छोटा बच्चा अपना झंडा लहराते लगातार नारा लगा रहा था- भावत माता की जय, भावत माता की जय, भावत माता की जय..........भारत का उच्चारण भारत, उसका उल्लास, आवाज की खनक से ध्वनित हो रही थी.......
उसका उल्लास बना रहे, वह आगे चलकर उसके कार्य भारत की जय लायक हों......

पीछे मुडकर देखने पर विकास भी दिखाई देता है, लूट भी दिखाई देती है,
संविधान का वादा......................नेताओं के भाषण.............................अपना कार्यकलाप ............
सपने.......सच्चाइयां......भूल.......झूठ.........सच.......................................................................................................................भावत माता की जय.......
रात को चिन्मय पूछता है आप झंडा फहराने कालेज गये........................
भावत...............माता ...................की .........................जय.
किंशुक अभिनय के साथ सारे जहां से अच्छा हमारा गा रहे हैं...........................
भावत माता की जय............

Saturday, January 25, 2014

" मतदाता दिवसः सबको सही मतदाता पहचान पत्र"

नमस्कार!
हालचाल ठीक है बस पता का ठिकाना नहीं है.
चुनाव आयोग चुनाव सुधार और मतदाताओं के पंजी करण के लिये बहुत सा प्रयास करता है. मतदाता पहचान पत्र एक बडी उपलब्धि है.
मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड और निवास प्रमाणपत्र और अब आधार कार्ड तथा पासपोर्ट और तमाम एजेन्सियों द्वारा दिये गये प्रमाण पत्र सब को एक साथ रख दीजिये तो आदमी का फोटो और पता दोनों की जानकारी करना कठिन और श्रमसाद्ध्य है.
आजकल समेकित और समावेशी शब्द बडे ही प्रचलन में हैं. सरकार के विभिन्न विभाग भिन्न भिन्न तरह की योजनायें बनाते हैं कभी भी उनमें समन्वय करने का प्रयास नहीं करते.
मैं अपनी समस्या के माध्यम से इस समस्या को बताने की कोशिश कर रहा हूं.
२१ जनवरी १९९१ को मैं अपने वर्तमान  आवास में रहने के लिये आया. उसके बाद मतदाता पहचान पत्र बनाने की योजना आयी. लम्बी लाइन और तमाम कठिनाइयों को झेलकर फोटो खिंचवाया. पहचान पत्र नहीं मिल पाया. मताधिकार तो मिल गया. कुछ समय बाद मतदाता पहचान मिल गया है लेकिन पता तो चुनाव आयोग ही समझ सकता है. तबसे अबतक मेरा मकान कई वार्डों का सदस्य बनता रहा है. कई बार सर्वेक्षण हो चुका है लेकिन एक सही मतदाता कार्ड अभी तक नहीं मिल पाया. राजद्लों के नेताओं से कहा, अखबारनवीसों से कहा, सरकारी अधिकारियों से सार्वजनिक रूप से कहा. सभी कहते हैं आप मतदान तो कर ही लेते हैं तो चिन्ता किस बात की.
दो बार फारम आठ भी भर चुका हूं. चुनाव आयोग के फेसबुक पर भी लिख चुका हूं.
हर दस साल पर जनगणना होती है. उसके पहले गृह गणना होती है. मकान नं., वार्ड नं., विधान सभाई और लोक सभाई क्षेत्र बदलते रहते हैं किन्तु उनके परिवर्तन अलग अलग समय पर होते हैं परिवर्तन के साथ साथ मतदाता सूची और पता में परिवर्तन नहीं हो पाता है.
देवरिया नगर में अभी कुछ दिनों पहले मकान नं का परिवरतन हुआ है, मतदाता सूची का संशोधन हुआ है. राशन कार्ड का हल्ला है. ये तीनों कार्य एक साथ हो जाते तो ये तीन शुद्ध हो जाते. तीनों के विभाग अलग हैं इनमें तालमेल कौन करेगा?
कोई अधिकारी चाहे तो महाविद्यालओं के राष्ट्रीय सेवा योजना का विशेष शिविर इसी थीम पर आयोजित करवा कर देवरिया नगर की तमाम सम्स्याओं से नगर को मुक्त करा सकता है. देवरिया नगर में तीन महाविद्यालय हैं और कुल मिलाकर आठ सो से अधिक छात्र/छात्रायें हैं.

आशा करें कि इस समस्या का सही समा धान हो जायेगा.
नमस्कार.

Tuesday, January 21, 2014

राजनिति का धरना

नमस्कार!
हालचाल ठंढा है और राजनीति गरम है.
भारत देश में मोहन दास गांधी के नाम पर राजनीति  करने वाले असीमित हैं, अनुगामी बहुत कम. राम, कृष्ण, बुद्ध को भी पूजने वाले बहुत हैं अनुगामी बहुत कम. इस देश में गांधी के रास्ते अपनी बात रखनेवाले को कांग्रेस मार ही देना चाहती है. क्योंकि वह गांधी के नाम पर वोट लेना मात्र चाहती है. नेहरू, फिरोज की विरासत वाले भी गांधी कहलाना चाहते हैं.
जब कोई गांधी के मार्ग पर चलकर भारत के किसी समस्या का समाधान करना चाह्ता है तो भारत की सरकार बहुत तेज विरोध करती है. सरकार मानती है कि इस तरह से जनता कि हर आवाज सुनने से जनता का मन बढ जायेगा और वह उन सारे अधिकारों को मांगने लगेगी जो उसे मिलना चाहिये.
राजा को ईश्वर का रूप मानकर जीनेवाली जनता अभी भी विधायक, सांसद और मंत्री को उसी रूप में देखना चाहती है. आप कल्पना कर सकते हैं कि  भारत के किसी कार्यालय में प्रथम श्रेणी से लेकर चतुर्थ श्रेणी तक के कर्मचारी बैठ कर बात कर सकते हैं. ब्राह्म्णवाद को गाली देनेवाला अधिकारी भी ऐसा नहीं करना चाहता.
ईरोम गांधीवाद में विश्वास करती हैं. शिन्दे लाठीवाद में.
भारत में कितनी और कैसी पुलिस होनी चाहिये इसपर आयोग तो बन जायेंगे, अनुपालन कभी भी नहीं होगा. पुलिस के मारल या उच्चाधिकारियों के माल का सवाल पर जनता को भुगतने के लिये छोड दिया जाना चाहिये.
दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री और मंत्री धरना पर हैं,  चार थानेदारों का निलम्बन/ स्थनान्तरण कराना चाहते थे. दिल्ली के पुलिस कमिश्नर और गृहमंत्री इसके लिये तैयार नही हैं. भारत सरकार के गृहमंत्री इतनी सी बात को न होने देने के लिये कई हजार लोगों को दिल्ली की बरसाती, बर्फीली ठंढ मे रहने के लिये मजबूर कर दिया है. दिल्ली पुलिस के काम काज और प्रणाली को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों के प्रांतीय नेता पहले से ही आवाज उठाते रहे हैं. अभी कुछ दिनों पूर्व दिल्ली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रदर्शन करने गये थे. दिल्ली एक खतरनाक जगह बनती जा रही है. इसके लिये दिल्ली पुलिस को अत्याधुनिक आधारभूत संरचना और जनबल चहिये.
इतनी सी बात को लेकर मुख्यमंत्री को धरना पर बैठना चाहिये या नहीं, केजरीवाल को  सरकार चलाने आता है या नहीं. कांग्रेस ने केजरीवाल को दिल्ली में बांध दिया है केजरीवाल ने कांग्रेस को बौना बना दिया है. एक बात है कि केजरीवाल सत्ता के लोभी नहीं.
केजरीवाल के शपथग्रहण समारोह ने ही उन्हें देश में १०० रैलियों से मिलने वाली प्रसिद्धि दिला दी. यह कबीरपंथी या कहिए अरविन्दपंथी आन्दोलन करते रहना चाहता है. लोकतंत्र और जनाधिकार को नये ढंग से सोचने का समय आ गया है.
गांधीवादी लोगों के लिये सरकार ने जंतर मंतर पर एक सडक को निर्धारित कर दिया है. गांधी के नाम पर दिल्ली में वायसरीगल हाउस को मटियामेट कर गांधी मैदान बना दिया जाना चाहिये जहां देश की जनता रैली धरना और प्रदर्शन कर सके. लोकतंत्र  का हथियार रैली धरना और प्रदर्शन ही है. घेराव और धरना सम्बन्धित व्यक्ति के कार्यालय पर  ही होना चाहिये. दिल्ली के लोग पंचसितारा लाभ लेना चाहते हैं तो धरना प्रदर्शन की आवाज को भी सुनना पडेगा.
देश की पूरी राजनीति इस धरने के इर्द गिर्द घूम रही है. मौसम धरने के साथ नहीं है. कांग्रेस और भाजपा विकल हैं. हरदम अपने प्रतिद्वन्दी का विरोध करना ठीक नहीं. राजनीति जनहित के लिये है. प्रत्येक राजदल को जनहित में जनता को मजबूत करना चाहिये. उसे वह सभी अधिकार मिलना चाहिये जो लोकतंत्र में आवश्यक  है.
काश देश का मीडिया जनता की हर आवाज के साथ खडा रहता तो शायद सब पढ रहे होते. सभी को एक समान चिकित्सा मिल रही होती. सभी को शीघ्र न्याय मिल रहा होता. नीचे से ऊपर को जाती थैलियां रुक जाती. ऊपर से आता भ्रष्टाचार रुक जाता. सेवा आयोगों द्वारा पैसा लेना और अंगूठा काटना रुक जाता.
नमस्कार.

Thursday, January 16, 2014

आपकी आप

नमस्कार!
हालचाल तो बस ठंढक है. दिसम्बर में एक मीडिया चैनल के महान ऐंकर महोदय परेशान थे कि ठंढ को लकवा मार गया है क्या? फिर लोग दिल्ली के चुनाव से परेशान हो गये थे. तमाम लोग आआपा को ललकार रहे थे कि सरकार बनाओ. एक लंगडे राज्य में लंगडी सरकार बन गई है. आआप राजदल के गठन से ही बहुत से लोग इससे एक साफसुथरी लोकतांत्रिक दल के रूप में देखना चाहते थे. दिल्ली की आंशिक सफलता ने लोगों की कल्पना में जान डाल दिया.
केजरीवाल ने सभी अन्य दलों के ईमानदार लोगों को बुलाया. अन्ना के आन्दोलन के तमाम लोग जो देश के नुक्कडों पर जुटते थे उनमें से अधिकाधिक आआप में आ गये. अब तो मारामारी का समय है.
सरकारी गाडी और बंगला तथा मंत्रिपद साथी विधायकों में ईर्ष्या पैदा करती ही है.
तमाम समस्यायें उन कार्यकर्ताओं की होती हैं जो प्रचार करते हैं. चुनाव के बाद जिनके प्रत्याशी विधायक हो जाते हैं वे भी विजयी हो जाते हैं जिस कार्यकर्ता का प्रत्याशी हार जाता है उसे बहुत संतोष करना पडता है. जो राजदल सरकार में हो उसे अपने निर्वाचित तथा अनिर्वाचित दोनों तरह के प्रत्याशियों को समान महत्व देते हुये उनके माध्यम से उस क्षेत्र से सम्पर्क में रहना चाहिये.
आआपा ने अब राजनीति के तालाब के नीचे बैठे कीचड को डबरा बना दिया है. अब लगे रहने की बात है. अभी वास्तव में भ्रष्टाचार के समापन पर सबका मानस अलग-अलग है. इसके एक होने में समय लगेगा. दल के प्रवक्ता,और  शीर्ष सदस्य को अपनी बात सार्वजनिक कहने का कोई अधिकार नहीं होता.
आशा है शीघ्र ही आआप इस तात्कालिक समस्या का हल निकाल लेगी.
केजरीवाल और अन्य मंत्रिओं को प्रत्येक क्षेत्र के सक्रिय कार्यकर्ताओं से भी मिलते रहना होगा. अब समय आ गया है कि देश की सभी इकाइयां सामने आयें और खुलकर सदस्यता अभियान चलायें.
नमस्कार.

Wednesday, January 15, 2014

राजनीति और जीविका

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
मकर संक्रांति ठीक-ठाक बीत गयी. चुनाव का बिगुल बज गया है. टिकट के लिये टिकटार्थी अपना बायोडाटा और समर्थक जुटाने में लगे हैं. सबलोग ऐसे दल से टिकट चाह रहे हैं जिसके चमत्कार से जीत जायें. हर पार्टी की रैली हो रही है. सभी जनसमर्थन के लिये दौड रहे हैं.
लोगों के बीच रहना लोगों के दुख से दुखी होकर उसके निराकरण का प्रयास करना इसके लिये सम्मानित होते रहने की भूख मात्र हो तो जिस किसी राजदल से मन बने उसकी सदस्यता लेकर राजनीति में रहना उचित है. कोई राष्ट्रीय समस्या हो तथा उअसके समाधान के लिये किसी राजदल का सहयोग करना भी उचित है. धन के लोभ और पद के मोह में राजदलों में जाने वाले कूदते रहते हैं. जनहित की बात कहते हुये, जनता को ही ठगने का काम करतए रहते हैं.
राजदलों में काम करनेवाले लोगों की आजीविका का संकट एक गम्भीर संकट है. यही संकट उन्हें भ्रष्टाचार में खींचती है. ईमानदान बने रहने के लिये पहले अपने से लडना पडता है, फिर अपनों से लडना पडता है, फिर चाहने वालों से लडना पडता है. उच्च सिद्धान्त के अनुपालन की राह में पत्थर अपने लोग ही बनते हैं. जीविका के साधन के अभाव में राज-दल के कार्यकर्ता को संकट का सामना करना पडता है ऐसे समय उसके साथ ऐसे लोग हो जाते हैं जिनका उद्देश्य येन-्केन -प्रकारेण अपना स्वार्थ महत्वपूर्ण होता है..
चुनाव के समय प्रत्याशी और राजद्लों को बहुत से लोग चाहिये. अभी भारत में अपनी विचारधारा वाले दल के लिये सामन्य जन न तो धन खर्च  करना चाहता है  न समय. ऐसी परिस्थिति में अवसरवादी लोग सामने आते हैं जो आगे चलकर पार्टी के लिये सरदर्द ही साबित होते हैं. तमाम बेरोजगार नौकरी की लालच में अथक श्रम करते हैं. उनके प्रत्याशी विधायक या सांसद चुनाव जीत जाते हैं तो उनकी आशा हो जाती है कि उन्हें कही न कही नौकरी मिल ही ्जायेगी, वे भी जल्दी ही अपने नेता को मंत्री के रूप में देखना चाहते हैं.
लोकतंत्र में आस्था और विश्वास रखने वाले लोगों को इस समस्या पर विचार करना चाहिये. अब यह जरूरी हो गया है कि हरेक लोकतान्त्रिक संस्था को ्मजबूत बनाया जाय. राजदल इसका आधार है इसलिये सभी राजदलों का पंजीकरण, और उसके संगठनात्मक चुनाव भी निर्वाचन आयोग की देखरेख में ही होने चाहिये. उसे सूचना अधिकार कानून में ले आना आवश्यक है तथा उसे मिले प्रत्येक पैसे का हिसाब होना चाहिये. देश के सबसे महत्वपूर्ण कार्य इन्हें सौप दिया जाता है और ये किसी के प्रति जिम्मेदार नही होते हैं. किसी को भी पत्र लिखना हर तरह की सिफारिश करना इनका सबसे बडा काम हो गया है. इस प्रकार के सभी पत्रो की जांच हो जाय तो पता चलेगा कि हर भ्रष्टाचारी के रक्षक के रूप में कोई राजदलकर्मी साथ है.
राजदल के कार्यकर्ता की जीविका का साधन का सवाल हल नहीं होगा तो भ्रष्टाचार समाप्त ही नहीं होगा.
फिर मिलेंगे.
नमस्कार.

Wednesday, January 8, 2014

शर्म-शर्म

नमस्कार!
हालचाल बहुत खराब है.
भीषण ठंढक है.
यनडीटीवी पर प्राइम टाइम में दिल्ली में दिल्लीवालों के लिये आरक्षण पर बहस चल रही है. अत्यन्त निराशाजनक स्थिति मे टीवी देखना बंद कर दिया. लेकिन सोने भी नहीं जा सका. अब अपनी बात लिख रहा हूं .शायद शान्ति मिल जाय.
कांग्रेस, भाजपा और आआपा तीनों दलों की शिक्षा की नीति का क्या कहना तीनों क्षेत्रीय आरक्षण की वकालत कर रहे हैं. अभी भी समय है तोनों दल भारत की जनता से माफी मांग लें.
दिल्ली से पढकर निकले सारे राजनेता, और अधिकारी जो दिल्ली में हैं उन्हें भी देश से माफी मांगनी चाहिये. यूजीसी के सभी अधिकारी जो ८०% लीकेज वली योजनाओं पर धन व्यय करते हैं उन्हे माफी मांगनी चाहिये.
देश के सभी सांसदों को देश से माफी मांगनी चाहिये.
दिल्ली राज्य  में १५ वर्षों से शासन कर रही कांग्रेस दिल्ली से १२वीं पास छात्रों को उच्च शिक्षा देने में असमर्थ रही है. केन्द्र में शासन कर चुकी भाजपा और कांग्रेस  को यह आवश्यक नहीं लगा कि दिल्ली की उच्च शिक्षा की  हालत में सुधार करें.
देश के तमाम राज्यों को विकास के नाम पर गलियाते पत्रकार, विद्वान और स्तम्भकार इस सत्य और तथ्य को नकारते रहे. दिल्ली और जनेवि के जुझारू नेता कुछ नहीं कर पाये.
एशियाड और कामनवेल्थ खेलों में पानी जैसा पैसा बहाने वालों शिक्षा के लिये क्या कर र्हे थे. देश के नेता शिक्षा के जो आंकडे बताते हैं वे किस बूते पर बताते हैं.
सबसे अधिक तरस आआपा के नीतिकारों और योगेन्द्र यादव पर आ रहा है. आप दिल्ली वालों को आरक्षण की बात कांग्रेस और भाजपा की तौर पर दिया. आआपा कह सकती थी कि दिल्ली से १२वीं  पास हर छात्र को उच्च शिक्षा की व्यवस्था कर दी जायेगी.
आआपा तो ६.५% शिक्षा पर व्यय करने के सपने को पूरा करे.
दिल्ली के सभी आवासीय बडे बंगलों को विद्यालय बना दीजिये. कुछ ही बंगलों में बहुमंजिली इमारतें बनाकर सबको शिफ्ट कर दीजिये.
नमस्कार.

Monday, January 6, 2014

आयकर से टोलटैक्स तक

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
चुनाव के जमाने में कर की चर्चा भी हो ही जाती है. भारत में पत्रकार जगत में 'करदाता' शब्द प्रचलित है. जब हम करदाता कहते हैं तो भारत के कुछ लोग गौरवान्वित महसूस करते है. कर तो भारत का प्रत्येक नागरिक देता है. कर पर चर्चा योगव्यवसायी बाबा रामदेव ने शुरु किया है. बाबा अब हजार रूपये की नोट नहीं बन्द करायेंगे न ही कालाधन को भारत में मंगवायेगे. (अब बाबा भी क्रीम पाउडर बनाने बे्चने लगे हैं तो बात का विषय भी बदल गया है. इनके उत्पादों की दुकानों से भी पक्की रसीद नहीं मिलती. दन्तकांति के लगातार उपयोग से मेरे दांत हिलने लगे हैं. )
मुद्दा तो बिल्कुल ठीक है कि भारत की कर प्रणाली दोषपूर्ण है. इस प्रणाली में हम केन्द्र सरकार, प्रान्त सरकार, नगर , गांव सबको अलग अलग टैक्स देते हैं. जब सुविधाओं की बात आती है तो सब अपना पल्ला झाड लेते हैं.
अप्रत्यक्ष कर उत्पादकर्ता और विपणन कर्ता वसूल करते है. जितनी इच्छा होती है उतनी सरकार को देते हैं बाकी सब रख लेते हैं. आईयमयफ भारत सरकार को सरकारी खर्च कम करने को कहता है तो ये सरकारी विभागों में नियुक्तियों रोककर खर्च बचाने का दिखावा करते हैं, खूब फिजूल्खर्ची करते हैं और अप्रत्यक्ष करों का मात्र दस प्रतिशत ही संग्रह करते हैं.
भारत के नागरिक को जन्म से लेकर मृत्यु तक और उसके बाद भी कितना कर दे देना पडता है उसका हिसाब करना कठिन है.
एक जमाने में दियासलाई पर भी दिये गये कर की रसीद  मिल जाती थी. अब राजदल उत्पादकों, विपणनकर्ताओं और ठीकेदारों से चुनाव चंदा और गिफ्ट ले लेते हैं और उन्हें करचोरी की छूट दे देते हैं.
आम अखबारी जनता और मीडिया आयकर, पेट्रो पदार्थों के दाम,रेल किराया पर खूब चर्चा करते है. रेल किराया बढाने के विवाद पर ममता जी ने मंत्री को हटवा दिया. सेवाकर बढाने पर चुप रहीं. सेवाकर का दायरा बढता जा रहा है जनता झेलती जा रही है.
जब बिक्री कर आया तो कहा गया कि जिसकी बिक्री अधिक है वे लोग सरकार को कुछ कर दे दें. बाद मे सरकार ने इसे ग्राहकों से वसूलने की छूट दे दी.अब जनता कर देती है, उसका एक हिस्सा सरकार पाती है बाकी टैक्स कलेक्टर. अब इसका नाम वैट हो गया है, पहले तो व्यापारियों ने इसका विरोध किया बाद में राजी हो गये. जब सरकार को वैट वसूलना है तो सरकार को हर छोटी या बडी दुकान को अपनी ओर से छपवा कर रसीद देनी चाहिये. साथ मे आधुनिक डिजिटल तकनीक का एक उपकरण देना चाहिये. रसीद पर पूर्ण विवरण होना चाहिये तथा भुगतान किए गये धन की स्लिप डिजिटल मशीन द्वारा भी मिलनी चाहिये यह मशीन हर बिक्री की की सूचना वैट विभाग को दे देगी.
जो सडक या पुल सरकार बनवाती है वह नागरिकों के धन से बनती है. टोल के नाम पर जनता से खूब वसूली होती है. जिसका दस प्रतिशत हिस्सा भी सरकारी कोष में नहीं जाता. इससे केवल ठीकेदार ही कमाते हैं यह उन्ही के लाभ के लिये वसूला भी जाता है. टोल टैक्स की वसूली तत्काल ही बन्द होनी चाहिये.

आयकर  की चक्की में मध्यवर्ग को पीसा जात है. आयकर दाता से दंड के नाम पर कर लिया जाता है तथा उसे कोई सुविधा भी नहीं दी जाती. आयकर के दायरे में आते ही उससे सुविधायें हटाई जाने लगती हैं. आयकर विभाग अपने इस दुधारी गाय को लाठी मारने के सिवा कुछ नहीं करता. उसे आयकर की सूचना तक नहीं देता. आयकर की सीमा बहुत नीचे से शुरु हो जाती है तथा १०,२०, और ३० प्रतिशत तक ही रहती है.
आयकर की सीमा  को फुटकर उपभोक्ता सूचकांक से जोड दिया जाना चहिये.
पचास लाख की सीमा तक २५% आय को बीमा, पीयफ आदि के लिये छूट दिया जाना चाहिये.
प्रत्येक आयकरदाता का समूह बीमा किया जाना चहिये, करदाता द्वारा दिये गये धन का एक प्रतिशत इस हेतु व्यय किया  जाना चाहिये और असामयिक मृत्यु की दशा में तथा अति गम्भीर रोगों की चिकित्सा में दिया जाना चाहिये.
इसे अत्यन्त सरल किया जाना चाहिये और किसी भी संस्था  को छूट किसी भी दशा में नहीं दिया जाना चाहिये.
बाकी फिर कभी.
नमस्कार.

आम आदमी और चुनाव के मुद्दे

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
२०१४ के संसदीय आम चुनाव का प्रचार जोरों पर है. मीडिया और चौपाल सभी जगह एक ही चर्चा कौन जीतेगा. किस राजदल को कौन सी रणनीति अपनानी चाहिये.
भारत के नागरिक को, भोजन, वस्त्र, आवास,शिक्षा, चिकित्सा,न्याय,सुरक्षा कैसे मिल सकेगी? कौन इसे देने की बात कर रहा है? केजरीवाल, मोदी, राहुल, मायावती, मुलायम या कोई और.
भाजपा ने कर्म्चारियों के पेंशन योजना को बिना सोचे समझे समाप्त कर दिया अभी तक उसका पूरा पूरा  समाधान नहीं हो पाया है. मोदी के विकास के माडल में पूंजीवाद ही चलेगा. भले ही उनकी माताजी घरेलू नौकरानी थी वे मजदूरों की बात नही करेंगे आज उनके प्रिय कारपोरेट घराने हैं.वे चाय जब बेचते थे तब बेचते थे अब उनके मन में गरीबों को और गरीब बनाने का सूत्र है.
वे सबको समान और गुणवत्ता पुर्ण शिक्षा देने की बात नहीं कर सकते. ्गुजरात के सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय मानक नहीं हैं. वहां के हर नागरिक को हर स्तर की अत्याधुनिक चिकित्सा की सुविधा नहीं है. वहां पर भी न्याय शीघ्रता से नहीं मिलता है.

आज भारत की जनता मूल्भूत मुद्दों पर राय जानना चाहती है.वह रोजी-रोटी, भोजन-छाजन या रोटी, कपडा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा, न्याय  ौर सुरक्षा की चिन्ता में है. इन समस्याओं का समाधान किस दल के पास है? उसका खाका बताये और जाकर जनता की सेवा करे. सता और कुर्सी केलिये ठीका पर कब्जा के लिये मुखौटा बदल कर विधायिका के रास्ते सता पर कब्जा की नीयत छीड दे.
नमस्कार!


सरकारी आवास की सीमा

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
आम आदमी पार्टी ने हर आम व खास आदमी की पहचान बदल दी है. दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री के परम्परागत आवास को छोडकर  पांच कमरेवाले मकान को रहने के लिये् चुना तथा साथ वाले पांच कमरेवाले आवास को आवासीय कार्यालय बनाने के लिये . उनके इस निर्णय ने हलचल मचा दी है. अरविद के परिवार में छह सदस्य हैं. वे बताते हैं कि  उनका इस समय का घर भी चार कमरे का है. यनडीटीवी के पत्रकार ने सम्भवतः टिप्पडी की थी कि बडे मकान वालों को मुख्यमंत्री का यह निवास बडा लगता है. आम आदमी पार्टी के घोषडा पत्र में है कि वे बंगला और मंहगी गाडी नही लेंगे. एक नामी पत्रकार ने लिखा है कि पहलेवाली मुख्यमंत्री जी का बंगला भी टीवी पर दिखाया जाना चाहिये. इस समय सादगी और केजरीवाल के बंगले पर राष्ट्रीय बहस चल रही है.

इस बहस  ने मेरी स्मृति में बसी बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दशक में ्चर्चित बहस को सामने ला दिया जिसमें राष्ट्रपति भवन, सरकारी तामझाम, तोपों की सलामी आदि पर चर्चा हुआ करती थी. लोकतंत्र की स्थापना के बाद लोगों के दिमाग में  सिंहासन,  राज , सत्ता तख्त आदि अभी तक बसे हुये हैं. इसे समाप्त करने के महात्मा गांधी के सलाह को कोई महत्व न देते हुये दिल्ली में उनकी समाधि बनाकर उस पर इतना व्यय किया जाता है कि बाकी सभी लोगों  पर हुये  व्यय को न्यायपूर्ण सिद्ध किया जा सके.

जब यह बहस चल रही है तो यह तय जाना चाहिये कि भारत के राजनैतिक और प्रशासनिक लोकसेवकों को किस स्तर का कितने क्षेत्रफल का आवास दिया जाना चाहिये. भारत में प्रत्येक स्थान पर इसी मानक का उपयोग किया जाना चाहिये. ऐसा करने पर प्रत्येक स्थान पर भरपूर मात्रा में सरकारी जमीन खाली होगी, जिस पर तमाम कार्यालय, विद्यालय और कर्मचारियों के आवास बनाये जा सकते हैं. जितना बडा शहर हो भवन की ऊंचाई उतनी ही बढाई जाय.इस बात पर  बहुत से लोग यह प्रश्न उठायेंगे कि वर्तमान भवनों का क्या किया जायेगा. सभी जानते हैं कि इनमे से अधिकांश भवन अपनी आयु पूरा कर चुके हैं. जो  काम लायक हैं वे भी साम्राज्यवाद की मानसिकता को ही बनाते हैं. अभी कुछ दिनों पूर्व संसद भवन की आयु को लेकर प्रश्न उथे थे, आज के सरकारी लोगों को इन्हें नष्ट करने का मन नहीं करता. ये लोग अग्रेजों के बनाये भवनों और कानूनों इतर नहीं जाना चाहते हैं.

नई दिल्ली की सरकारी इमारतें जितनी जमीन घेरती हैं उतनी जमीन में आज की तकनीक से भवन और आवास बनाये जाय तो तमाम समस्याओं का समाधान मिल सकता है. सबसे बडी आवश्यकता है कि जनता मैदान की जहां जनता अपनी बात कह सके उसे जंतर मंतर पर सीमित कर दिया गया है. दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के पूरे क्षेत्र में आधुनिक तकनीक से नियोजित बहुमंजिले भवन बना दिये जांय. पूरा लुटियन क्षेत्र बहुमंजिले भवनों का बना दिया जाय तो अनेकानेक समस्याओं का समाधान निकल आयेगा.

नमस्कार.


Saturday, January 4, 2014

आप ही आप

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बन गयी. आम आदमी खुश है. आआप  के रथ को रोकने के कुछ तिकडमी प्रयास किये गये. रथ को २०% पहले रोक भी लिया गया. अभी आम आदमी भीड का हिस्सा ही बना रहना चाहता. अपने मत को हारते देखने से पहले ही रास्ता बदल लेता है. इसका मुख्य कारण निर्णय लेने के लिये आवश्यक मुद्दों का अभाव. बहुमत के अभाव में ही सही भाजपा, कांग्रेस और मीडिया ने हुरपेट कर केजरीवाल को फंदे में लेना चाहा किन्तु उन्होंने जनता से पू्छने का आइडिया लेकर इन तीनों के मंसूबे पर पानी फेरकर सरकार बनाकर बहुमत भी सिद्ध कर दिया.
अब कोठी और कार का कलह उपजा है. प्रशासनिक लोकसेवक भारत में अपना प्रभुत्व बनाने के लिये मंत्रीगण को तमाम सुख सुविधायें उपलब्ध करा देते हैं, प्रलोभन, के तमाम स्वरूपों का उपयोग कर इन्हें जनता से दूर और आरामदेह जिन्दगी जीने का आदती बनाकर अपना काम करा लिया जाता है. करोडों, अरबों के कारोबार में आदर्शों के नशे हिरन हो जाते हैं. इन लोगों पर सभी प्रकार के साम, दान, दण्ड और भेद के हथियार उपयोग में लाये जायेंगे. जनता से संवाद करते रहने और सचेत रहने से तथा निरंतर सुधार करने की आदत रहेगी तो निखार ही आयेगा.
जनसेवा का कार्य वानप्रस्थ आश्रम या सन्यास आश्रम से ही चल सकता है. अर्थात जो भी जनसेवा करना चाहेगा उसे परिवार और परिजन के सुख से वंचित होना पडेगा. विधायक हो मंत्री सबको एक समान ही आवास की आवश्यकता है. आवास को आफिस मत बनाइये. कार्यालय का काम कार्यालय में ही कीजिये. जनता से  कार्यालय या  सचिवालय में ही मिलिये. लेकिन मिलिये अवश्य. प्रेस से भी मिलिये. ऐसी तकनीक बनाइये कि जनता को अपनी बात कहने के लिये आपके पास जाने  की जरूरत ही कम पडे. ईमेल से आवेदन मंगाइये और समस्या का निपटारा कीजिये.
भारत की जनता में त्याग को बडा माना गया है अभी भी उसका महत्व है. आआपा के प्रत्येक सदस्य अब राडार पर है. इसपर आपको सचेत रहना पडेगा. इस समय जो भी दशा चल रही है
भारत के स्वतंत्र होने के बाद से ही चर्चा चलती रही कि साम्राज्यवाद के अवशेषों का समापन कर दिया जाय किंतु हर बार जनता धोखा खा जाती है. बहुत दिनों  तक बहस चली कि राष्ट्रपति भवन से लेकर समस्त तामझाम में लोकतंत्र की आत्मा मर जाती है. एक बार बडा फैसला लेकर लुटियन दिल्ली को तहस नहस कर सभी सांसदों, विधायकों मंत्रियों केलिये बने हुये भवनों कोध्वस्त करना ही होगा.
देश के बहुत से लोग सांस थामे आआप की सफलता चाह्ते हैं तथा यह भी चाह्ते हैं कि मंत्रीगण इत्नी सादगी से रहें कि कोई भी जल्दी मंत्री न बनना चाहे.
नमस्कार.